भूख 

 

कहने को तो अभी शाम ढली ही थी और रात शुरू हुई थी। शहर की पॉश कॉलोनी में एक बड़े से बंगले के सामने शहर के कई रास्तों से होते हुए बड़ी-बड़ी गाड़ियां आकर रूक रही थी। सूट-बूट में सले धजे लोग वहां अकड़कर उतर रहे थे और फिर उस बंगले में जा रहे थे। बंगला भी पूरी तरह से रोशनी से नहाया हुआ था। 10 दरबान वहां आने वाले लोगों के स्वागत के लिए झुक-झुककर सलाम कर रहे थे। आने वाले लोग उन्हें बिना देखे या बिना उनके सलाम का जवाब दिए आगे बढ़ रहे थे। उस बंगले का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा हो जहां रोशनी ना हो। कुछ ही समय में तो हाल यह हो गया था कि अब बाहर गाड़ियों को खड़ी करने के लिए लोगों को इधर-उधर देखना पड़ रहा था। कुछ ही वक्त और बीता था कि बंगले के अंदर से संगीत की धुन भी सुनाई पड़ने लगी थी। वहीं लोगों का शोर भी अब बंगले के बाहर तक आने लगा था। हवाओं में खाने की सुंगध के साथ शराब की महक आने लगी थी। यह पार्टी थी शहर के सबसे बड़े उद्योगपति को एक अवार्ड मिलने की खुशी में थी। जिसमें शहर का हर बड़ा और छोटा उद्योगपति आमंत्रित किया गया था। शराब, खाना, बेहुदे संगीत पर थिरकते लोग और अमीरी का चेहरे पर रौब। बस ऐसे ही लोग वहां नजर आ रहे थे। इन सभी में एक चीज कॉमन थी वह थी भूख। भूख खुद को अन्य लोगों से बेहतर और अन्य लोगों से ज्यादा अमीर बताने और खुद को और से बेहतर बनाने की भूख। ये भूख जो इन लोगों की कभी खत्म नहीं होने वाली है। यह भूख इनकी रोज बढ़ती है और लगातार बढ़ती जा रही है। दिखावे में कई लोग कर्ज तले दबे हैं, पर इनकी यह भूख कभी खत्म न होने वाली भूख है, जैसे कि पेट की भूख। यह भूख भी कभी खत्म नहीं होती है। 

बंगले के अंदर के हाल के अलावा बंगले के बाहर एक फटे, पुराने कपड़े पहना एक 8 साल का बच्चा अपनी मां के साथ खड़ा था। वह अपनी मां को देख रहा था और कह रहा था कि मां उसे भूख लगी है। उसकी मां इस बंगले में सफाई करने के लिए आती है। आज बंगले में पार्टी होने के कारण उसे उम्मीद है कि आज उसे और उसके बेटे को भर पेट खाना मिल जाएगा। 8 से 10 बज गए थे, 10 से 12 बज गए थे। बच्चा अब भी मां से खाने की जिद कर रहा था और मां उसे सांत्वना देते हुए कह रही थी, बस बेटा पार्टी खत्म होने वाली है और फिर हमें भी खाना मिल जाएगा। हालांकि उसे ये भी पता है कि उसने और उसके बच्चे ने तीन दिन से कुछ भी खाया-पिया नहीं है, इस कारण उसका बच्चा खाने की इतनी जिद कर रहा है। गलती उसकी भी है कि उसने अपने बेटे से कह दिया था कि आज बंगले पर साहब के यहां पार्टी है तो हमें वहां से खाना मिल जाएगा। बच्चा खाने के आस में मां के साथ बंगले तक आ गया था। बच्चे की हालत देखकर मां ने दो से तीन बार बंगले में जाने का प्रयास भी किया, परंतु बंगले पर खड़े दरबान ने उसकी हालत देखकर उसे भगा दिया था। उसने दरबान ने कई बार कहा कि वह इस बंगले में काम करती है, पर दरबान ने उसे अंदर नहीं जाने दिया। फिर उसने दरबान से कहा कि वो ही उसे कुछ खाने के लिए जाकर दे दे। उसका बच्चा तीन दिन से भूखा है, पर दरबान वहां से हिला तक नहीं। 12 से अब 2 बज गए थे, परंतु बंगले के अंदर से बेहुदा संगीत और शराब की महक और खाने की सुंगध अब भी जारी थी। बंगले के बाहर बच्चा जमीन पर लेट गया था। मां भी कभी बच्चे को तो कभी बंगले की ओर देख रही थी कि अब ये लोग जाए और वह अंदर जाकर बच्चे के लिए खाना लेकर आए। सोते हुए भी उस बच्चे के गालों पर आंसूओं से बने निषान साफ नजर आ रहे थे। पेट पर रखा उसका हाथ शायद बता रहा था कि उसकी भूख कितनी बड़ी होगी वह मासूम भी अपने हाथ से अपने पेट को एक सांत्वना दे रहा था कि बस कुछ देर में हमें खाना मिल जाएगा। उसके चेहरे पर एक इंतजार की झलक अब भी साफ दिखाई दे रही थी। वक्त बीता और सुबह करीब 4 बजे लोगों का उस बंगले से बाहर आना शुरू हुआ। लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ लोग अपनी कार की ओर जा रहे थे और वो मां आते-जाते लोगों को बस नमस्ते कर रही थी। बंगले से निकले एक सज्जन शायद शराब के नशे में कुछ ज्यादा ही चूर थे और अपनी कार से वो उस औरत को टक्कर मारते हुए वहां से निकल गए थे। कार की उस टक्कर ने उस औरत को बहुत चोट तो नहीं पहुंचाई थी, पर उसे इतनी टक्कर जरूर मारी थी कि वह अपने बच्चे के पास ही गिरी थी। उसने बच्चे को हिलाया कि बेटा उठ पार्टी खत्म हो गई है, अब हम अंदर चलते हैं, तुझे अब खाना खिलाती हूं। पर शायद बच्चा मां के ये शब्द सुन ही नहीं पा रहा था। क्योंकि भूख ने उसे मौत का ग्रास बना दिया था। एक निवाले के इंतजार में करीब 8 घंटे तक इंतजार करने के बाद उस बच्चे का पेट किसी निवाले के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था। उस औरत को समझ आ गया था कि भूख ने उसके बच्चे को लील लिया है। 

उस मां की एक जोर की चित्कार के साथ बंगले के आसपास का माहौल भी रो पड़ा था। मां की वो करूण चीख ने बंगले से बाहर आने वाले लोगों का ध्यान खींचा था। लोगों ने उसके चारों और घेरा बना लिया था, दरबार ने बताया कि शायद उसका बच्चा भूखा था, वह अंदर जाकर बच्चे के लिए खाना लाना चाहती थी पर उसने उसे रोका था कि क्योंकि साहब ने ऐसा करने के लिए कहा था। दरबान की बात सुनने के बाद शराब और अपनी दौलत और रूतबे के नशे में चूर लोगों के मुंह से बात निकलने लगी थी, ओह, बेचारी का बच्चा नहीं रहा। अब सिलसिला चल पड़ा था कि सरकार कोई काम नहीं करती है, लोग भूख से मर रहे है और नेता आराम से अपने बंगलों में बैठे हैं। वहीं कुछ लोग कह रहे थ कि ऐसे लोगों के लिए लोगों को मदद के लिए आगे आना चाहिए। शहर में इतनी सामाजिक संस्थाएं वो क्या करती है। वो ऐसे लोगों के लिए कुछ क्यों नहीं करती है। वहीं कुछ लोगों ने दरबान को भी बुरा-भला कहना शुरू कर दिया था कि तुम उसे कुछ लाकर दे देते तो कम से कम बच्चा कुछ खा तो लेता। लोगों की ऐसी बातें उस मां के कानों में पड़ रही थी, उसकी आंखों से आंसू निकल कर उस बच्चे के चेहरे पर गिर रहे थे। लोग वहां खड़े होकर अब भी बस बच्चे की मौत पर अफसोस व्यक्त कर रहे थे। कुछ ही देर में लोग वहां से अपनी कार में सवार हुए और वहां निकल गए थे। क्योंकि अब भी उनमें उनकी भूख बाकि थी, खुद को औरों से बेहतर बताने, खुद को औरों से अमीर बताने की। फिर कल एक सुबह होगी और वे सभी लोग फिर उस भूख को मिटाने में लग जाएंगे। उन्हें ना कभी याद आई है ना शायद कभी याद आएगी उस गरीब बच्चे की भूख और उस भूख का वो अहसास जो उस मां को है जिसने भूख के कारण अपने दिल का टूकड़ा उन लोगों के बीच खो दिया था, जिनके लिए उस बच्चे की भूख मिटाना शायद बहुत मुश्किल नहीं था। कम से कम उतना मुश्किल तो नहीं जितना की उनकी खुद की भूख को मिटाना है। पर शायद ये दोनों ही भूख कभी खत्म नहीं होने वाली है। जब सब लोग जा चुके थे, तो दरबार ने उस औरत को एक थाली में खाना लकर दिया, मां ने उस थाली को देखा और फिर अपने बच्चे के सीने पर गिर पड़ी थी। शायद अब तक तो वह भूख से लड़ रही थी, पर अब उससे भूख से अपने कलेजे के टूकड़े की मौत सहन नहीं हो सकी थी।


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