चलो, माना हम लायक नहीं

चलो, माना हम लायक नहीं 



चलो माना कि हम तुम्हारे लायक नहीं,

चलो माना कि हम किसी काबिल नहीं।

हम नाकाबिल है तो कोई गुनाह नहीं, 

तुम कैसे साबित करोगे हम तुम्हारे लायक नहीं।।


कहोगे कि हम तुम्हें बेइंतहा प्यार करते थे, 

तुम सोचते थे और हम कहा करते थे।

जब सोती थी रातें हम जागा करते थे, 

उन रातों में बस तुमसे बातें किया करते थे।।



कहोगे कि हम तुम्हारा ख्याल रखते थे, 

कदम दर कदम तेरे साथ चला करते थे।

तुम्हारी तकलीफ में साथ हुआ करते थे, 

तुम हंसते थे तो हम भी हंसा करते थे।।


कहोगे कि हम तुम्हारे लिए वक्त रखते थे, 

तुम्हें दिल में अपने दिल की तरह रखते थे।

जो तुम रूठ जाते थे कभी हमसे किसी बात पर, 

तुम मान नहीं जाते थे तब तक कोशिश करते थे।।



कहोगे कि तुम्हारे दर्द की हम दवा हुआ करते थे, 

जब कोई ना होता हम तुम्हारे साथ हुआ करते थे।

हम दूर भी होते थे तो तुम्हारा ख्याल हुआ करते थे, 

कभी तपती धूप में तुम्हारा इंतजार किया करते थे।।


कहोगे कि तेरी यादों को सहेज कर रखते थे, 

बस तेरे लिए हम अक्सर गुनगुनाया करते थे।

बात गर जो निकला आए तेरे सुकुन की, 

हम अपना सुकुन भी तुझ पर लुटाया करते थे।।



कहोगे कि तेरी राहों पर हम नजरें बिछाया करते थे,

तेरे वक्त के लिए कभी तुझे लेने भी आया करते थे।

तेरा साथ मिले कुछ इस कदर हमकों,

इसलिए अक्सर सपनों की दुनियां बसाया करते थे।।


कहोगे कि मेरा प्यार तो अब भी वहीं है, 

वक्त के साथ मेरे लिए बदले तो तुम हो।

ये वक्त है फिर कभी तो बदलेगा ही, 

क्योंकि मेरे इंतजार अब भी तुम हो, तुम हो, तुम हो।।


       मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 3 Marichika: The story that will make you think

                     मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 3


वहां से पारूल सीधे अपने घर पहुंचती है। उसके दिमाग में अब भी उस शख्स की बातें घूम रही थी। वह तय नहीं कर पा रही थी कि आखिर उस शख्स की बातों का मतलब वह क्या निकाले, पर फिर वह उन बातों के बारे में ही सोच रही थी। अगले दिन एक बार फिर पारूल उस शख्स के सामने खड़ी होती है। वह शख्स पारूल को देखता है और उसके सामने कुर्सी पर आकर बैठ जाता है। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुसकान आती है और फिर वह पारूल को देखकर कहता है कि लगता है आपने मरीचिका के बारे में पता कर लिया है। पारूल कहती है कि मुझे मरीचिका का मतलब कल भी पता था। पर शायद आपका कल और बात करने का मन नहीं था, इस कारण मैं चली गई थी। वह शख्स एक बार फिर पारूल को देखकर मुस्कुरा देता है। पारूल अपनी बात जारी रखते हुए उससे कहती है कि आप जो कह रहे हैं उन बातों के बहुत अर्थ हो सकते हैं। मरीचिका जीवन में हो या रेगिस्तान में हो वह हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती ही है। उसमें फंसने या छूट जाने का मतलब नहीं निकलता है। यह सिर्फ व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है कि मरीचिका के बारे में क्या सोच रहा है। वैसे मैं सबसे पहले आपका नाम जानना चाहूंगी और आपके बारे में भी कुछ जानकारी चाहती हूं। श्लोक, श्लोक नाम है मेरा। एक छोटे शहर से वास्ता रखता हूं। अब इस दुनियां में अकेला हूं। पारूल फिर उससे एक सवाल करती है तो आपकी तीन साल की इस चुप्पी का कारण ? मुझसे पहले पांच लोग आपसे मिलने आ चुके हैं, परंतु आपने उनसे कुछ नहीं कहा कि परंतु मेरे सामने न सिर्फ आप बता कर रहे हैं, बल्कि अपने बारे में भी बता रहे हैं, तो मैं जानना चाहती हूं कि आपने ऐसा क्यों किया। पारूल के इन सवालों के जवाब में श्लोक एक बार हंसता है और फिर कहता है कि जब चुप था तब भी कई सवाल आज बोल रहा हूं तब भी कई सवाल है। ये सवाल ही तो है जो मनुष्य को भ्रम में ले जाते हैं। 



पारूल जी चलिए मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा, पर क्या आप अपने उन सवालों के जवाबों पर यकीन करेंगी? पारूल एक बार उसे अचरज भरी निगाह से देखती है, फिर कहती है पहले आप जवाब तो दीजिए। मेरी चुप्पी के कारण थे वो चार कत्ल, जो मैंने किए थे। पारूल श्लोक की बात को सुनकर एकदम चौंक जाती है और फिर कुछ संभलते हुए सवाल करती है कि पर क्यों और किन लोगों के कत्ल। मेरे ही परिवार के लोग थे, उनके कत्ल कर मैंने उन्हें अपने ही घर में दफन कर दिया और फिर भाग गया। भागते हुए यहां आ गया। कत्ल के बाद से मेरे होंठों पर चुप्पी थी, जो आपके कारण टूट गई। पर आपने अपने ही परिवार का ही कत्ल क्यों किया? श्लोक ने कहा कि मैं आपके इस सवाल का जवाब भी दूंगा, पर क्या आपने मेरी बात पर यकीन कर लिया? पारूल उसे एकबार फिर असमंजस भरी नजरों से देखती है। इस पर श्लोक कहता है कि इसलिए मैंने आपसे पहले सवाल किया था कि क्या आप मेरे जवाबों पर यकीन करेंगी। मैं सच कह रहा हूं या झूठ यह कौन और कैसे तय करेगा। मैंने कहा कत्ल किए और एक मिनट के लिए ही सही पर आपने उसे सच मान लिया। पारूल जी यही बातें है जो मनुष्य को एक मरीचिका का भ्रम देती है। हालांकि मरीचिका खुद एक भ्रम पर मनुष्य एक भ्रम के भी भ्रम में फंस जाता है। 


क्या आप मुझे बता सकती है कि दुनियां में सच क्या है और झूठ क्या है? दुनियां में कई सच है और कई झूठ है। पारूल ने कहा। जी, मैं भी तो वहीं जानना चाहता हूं कि आखिर सच क्या है और झूठ क्या। क्या झूठ कभी सच था, या सच कभी झूठ हो सकता है। सच आखिर है क्या। जो परखा गया हो? जो मान्य हो? या जिस पर यकीन हो जाए बस वही सच है? जी, नहीं सच को कभी परखने की जरूरत नहीं होती है, पारूल ने कहा। यदि सच को परखने की जरूरत नहीं होती है तो माता सीता को अग्नि परीक्षा क्यों देना पड़ी थी। वहां भी तो सच की परख हुई थी। श्लोक की इस बात पर पारूल लगभग निरूत्तर हो जाती है, वह बस उसे एकटक देखती रहती है। पारूल अगर मैं कहूं कि झूठ कि बुनियाद ही सच की परख है तो क्या आप मानेंगी। पारूल ने कहा कि श्लोक सच और झूठ के अपने अपने पैमाने हैं। यह निर्भर करता है कि बोला क्या जा रहा है सच या झूठ फिर उस पर निर्णय लिया जाता है कि सच क्या है और झूठ क्या है? जो आप कह रहे हैं वह भी सही है, परंतु यह कैसे कह सकते हैं कि झूठ की बुनियाद सच की परख है। श्लोक ने पारूल की बात के जवाब में कहा कि जब बार बार सच को परखा जाएगा तो कभी तो उसके बदले कोई ऐसी बात आएगी ही जो सच को छुपा दे और सच की परख करने वाले को सच की परख ही न करने दे। यानि कि सच को परख से बचाने के लिए उस सच के बदले एक झूठ। हर बार ही सच की परख नहीं होती हैं, पारूल ने कहा। पर हर बात सच हो ये भी तो जरूरी नहीं है ना? कोई बात सच है या झूठ उसे कैसे तय किया जा सकता है। मतलब साफ है कि अगर बात सच है तो उसे भी और अगर बात गलत है या झूठ है तो उसे भी परखा तो जाएगा ही। अगर झूठ है और फिर उसे परखा गया और वह झूठ झूठ साबित हुआ तो कोई बात नहीं परंतु यदि वह बात सच है और फिर भी उसे परखा गया तो फिर बात वहीं आ जाती है कि सच को हमेशा परखा ही जाता है। श्लोक की इन बातों से पारूल को उलझन में डाल दिया था। वह कहती है कि मतलब यह कि आपने अभी झूठ कहा था कि आपने अपने परिवार का कत्ल किया है? तो फिर आपकी वह खामोशी ? श्लोक ने फिर कहा कि मैंने अपने पूछा था कि क्या आप मेरी बात पर यकीन करेंगी? मैंने अपनी एक बात कही थी, वह सच है या झूठ यह तो आपके मानने पर निर्भर करता है। मैंने कहा कि मैंने अपने परिवार का कत्ल किया और आपने मान लिया। अब आप उसे झूठ मान रही है। तो फिर आप ही बताए कि मेरी बात सच है या झूठ। खैर रही बात मेरी खामोशी की तो अब तो मेरी खामोशी रही ही नहीं तो उस पर सवाल क्यों? मैं खामोशी पर कुछ कहूं भी तो फिर वही बात कि क्या आप उस पर यकीन करेंगी? इस बार आप और भी ज्यादा संशय में रहेगी कि मेरी बात सच है या झूठ। फिर आप उसे या तो सच मानेगी या फिर झूठ। अगर सच मान लिया तो फिर आपका कोई सवाल नहीं होगा, पर झूठ माना तो फिर एक अगला सवाल। पारूल जी जिस मरीचिका की बात मैं कर रहा था वह यही तो है। आप, मैं और हमारे जैसे न जाने कितने ही लोग इस मरीचिका में उलझे हैं और सच और झूठ के इसी भ्रम में जी रहे हैं। हमें असलियत में पता ही नहीं है कि आखिर सच क्या और झूठ क्या है? कुछ लोग कहते है कि हम अपनी आंखों देखी पर यकीन करते हैं और वह सच होता है पर रेगिस्तान में दूर एक पानी की झील भी तो आप ही देखते हैं और जब वहां पहुंचते हैं तो वहां कुछ नहीं होता। तब क्या सच होता है और क्या झूठ होता है। 


             मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 2 Marichika: The story that will make you think

                   मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 2


अगले दिन पारूल फाइल लेकर डॉक्टर मिहिर से मिलती है और उन्हें बताती है कि फाइल में उस व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है। खास बात बस यह लिखी है कि वह पिछले तीन साल से एक भी शब्द नहीं बोला है। पहले के डॉक्टर भी उसके लिए कुछ नहीं कर सके क्योंकि जब वे उसके साथ होते थे, तब भी वह कुछ नहीं बोला और हमेशा खामोश ही रहा है। डॉक्टर मिहिर ने कहा कि फाइल वह भी देख चुके हैं, इस कारण उन्होंने इस केस को एक चैलेंज के रूप में लिया है और यह केस उसे सौंपा है। मिहिर ने कहा कि पारूल हमें ये केस हर हाल में सॉल्व करना है, हमें उसकी सच्चाई, उसकी पहचान, उसका अतीत, उसकी खामोशी का राज चाहिए। ये तुम कैसे करती हो, यह तुम जानो, पर मुझे इसका रिजल्ट चाहिए और वो भी पॉजिटिव। पारूल ने एक बार फिर मिहिर से कहा कि वह अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगी। इतना करने के बाद वह वहां से चली जाती है। अगले दिन पारूल उस व्यक्ति की फाइल लेकर हॉस्पिटल पहुंचती है और वहां अपना परिचय देने के बाद उस व्यक्ति से मिलने की बात कहती है। कुछ ही देर में उसे एक कमरे की ओर भेज दिया जाता है। कमरे की ओर जाते हुए उसका दिल जोर से धड़क रहा था। वह थोड़ा नर्वस हो रही थी और थोड़ी घबराहट भी थी। वह कमरे तक पहुंचती है, दरवाजा खोलकर अंदर देखती है उसे एक व्यक्ति खिड़की की ओर मुंह किए खड़ा नजर आता है। वह खुद को नॉर्मल करने का प्रयास करती है और एक गहरी सांस लेकर कमरे के अंदर चली जाती है। उसके कमरे में आने और दरवाजा बंद होने की आवाज होने के बाद भी खिड़की के पास खड़ा व्यक्ति पलटकर नहीं देखता है। पारूल उसे हैलो कहती है, पर इसके बाद भी वह उसे पलटकर नहीं देखता है। पारूल कहती है वह एक डॉक्टर है और उससे बात करने के लिए यहां आई है। इस बार वह व्यक्ति एक बार उसे पलटकर देखता है और फिर से उसी मुद्रा में खड़ा हो जाता है। 


पारूल फिर अपनी बात आगे बढ़ाती है और कहती है कि लगता है कि आप किसी बात से बहुत ज्यादा नाराज है। यहां सभी कह रहे थे कि आप यहां तीन साल है और इन तीन सालों में आपने किसी से कोई बात नहीं की? इस पर भी वह व्यक्ति पहले की तरह ही खड़ा रहता है। उसकी ओर से कोई पतिक्रिया न देखकर पारूल एक बार फिर उसे कहती है कि यदि आपकी कोई नाराजगी है तो मुझे बताए, हो सकता है कि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं? इस बात एक बार फिर वह व्यक्ति उसकी ओर पलटकर देखता है। इस बार पारूल की नजर उससे मिलती है और वह एकदम अवाक सी रह जाती है। वह बिना कुछ बोले वहां से चली जाती है। अस्पताल से वह सीधे मिहिर के पास जाती है और उससे कहती है कि वह इस केस पर काम नहीं कर सकती। हालांकि मिहिर उसे साफ मना कर देता है और वह केस पारूल के पास ही रहता है। अगले दिन पारूल फिर अस्पताल जाती है औ कमरे में जाकर उस व्यक्ति से कहती है कि अब ना मैं कुछ कहूंगी ना ही शायद आप, पर आप जब तक कुछ नहीं कहेंगे मैं यहां रोज आउंगी और बैठी रहूंगी। देखती हूं कि आप कब तक कुछ नहीं बोलते। इतना कहने के बाद पारूल वहीं बैठ जाती है और वह व्यक्ति पूरे समय खिड़की ओर मुंह करके खड़ा रहता है। 



अब हर रोज पारूल वहां आती और आकर बैठ जाती और वह शख्स रोज की तरह खिड़की की ओर देखता रहता। ऐसे ही करीब 15 दिन बीत जाते हैं, पर वह व्यक्ति कोई बात नहीं करता। आखिर 16वें दिन पारूल उससे एक बार फिर कहती है कि 15 दिन हो गए हैं, मैं रोज आती हूं और सोचती हूं कि आप आज कुछ बोलेंगे, पर आप कुछ कहते ही नहीं है। आखिर ऐसी कौन सी बात है जो आपके होंठों पर इतनी गहरी खामोशी को छोड़ दिया है। डॉक्टर न सही अपनी एक दोस्त समझकर ही मुझे कुछ बताएं। वह व्यक्ति एक बार फिर उसे पलटकर देखता है, पर इस बार भी वह कुछ नहीं कहता। पारूल फिर चुप हो जाती है। ऐसे ही 15 दिन और बीत जाते हैं। एक दिन पारूल ऐसे ही उस कमरे में बैठी थी और वह शख्स हमेशा की तरह खिड़की की ओर देख रहा था। तब पारूल उससे कहती है कि हो सकता है कि अब मैं यहां न आउं। क्योंकि एक महीना हो गया है, आप कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है और मेरा पहला केस ही मुझे सफलता नहीं दिला सका है। अब मेरा कैरियर भी खत्म हो जाएगा। इसलिए कल मैं आपकी फाइल फिर से अपने सीनियर को देकर चली जाउंगी। मुझे नहीं पता कि आप किस बात पर नाराज है, पर मुझे ये पता है कि आपके कारण मेरा एक सपना हमेशा के लिए टूट जाएगा। पारूल की यह बात सुनने के बाद वह शख्स फिर उसे पलटकर देखता है। पारूल की उसकी नजरों में देखती है, पर उस शख्स पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह फिर खिड़की की ओर देखने लगता है। अगले दिन पारूल मिहिर के पास जाती है और पूरी बात उसे बताती है। पर मिहिर केस को छोड़ने से मना कर देता है। पारूल फिर अगले दिन वहां पहुंच जाती है। इस बा रवह उस शख्स के लिए फूल लेकर भी जाती है, पर इस बात का भी उस शख्स पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह रोज की ही तरह व्यवहार करता है। इधर पारूल का धैर्य अब जवाब देने लगता है। वह उस शख्स पर चिल्लाती है कि आखिर आप अपने आप को समझते क्या हो? एक महीने से ज्यादा समय हो गया है मुझे यहां आते हुए। मैं यहां रोज आपसे बात करने के लिए आती हूं। आप है कि बस खिड़की की ओर देखते रहते हैं, आखिर है क्या उस खिड़की में जो आपको दिखता है मुझे या किसी ओर को नहीं। आखिर किस बात का अहंकार है आपको कि आप किसी से कोई बात नहीं करते। आखिर ऐसी कौन सी बात है जो आपको इतने लंबे समय से खामोश रखे हुए हैं। आप खुद से ही नाराज है या किसी और से नाराज है। आखिर आप कब तक नहीं बोलेंगे। कभी तो आपको बोलना ही होगा, और अगर बोला ही है तो फिर आ ही क्यों नहीं। प्लीज कुछ बोलिए। 


कुछ देर के लिए रूम में खामोशी छा जाती है। वह शख्स एक बार फिर पलटता है और पारूल को देखता है। इस बार वह पारूल को कुछ देर तक देखता रहता है और फिर उसकी ओर बढ़ता है। पारूल की नजर भी उस पर ठहर जाती है। वह पारूल के पास आता है और उसके सामने रखी कुर्सी पर बैठ जाता है। अपने हाथ से उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा करता है। पारूल भी कुर्सी पर बैठ जाती है। कुछ देर तक ऐसे ही बैठे रहने के बाद वह शख्स जो पिछले तीन सालों से एक शब्द नहीं बोला था तीन साल बाद पहला शब्द बोला मरीचिका....। पारूल एकटक उसे देखती रहती है। फिर वह उसका शब्द दोहराती है मरीचिका? ये क्या है? वह शख्स बोला एक भ्रम, एक माया, एक धोखा। मरीचिका सिर्फ रेगिस्तान में ही नहीं दिखती है यह आपकी, मेरी, हम सभी की जिंदगी में शामिल है। कुछ लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं और कुछ लोग इसके जाल में फंस जाते हैं। जो लोग इसके जाल में फंस जाते हैं वे फिर कभी इससे बाहर नहीं आ पाते, क्योंकि फिर उन्हें इस धोखे के साथ जीने में ही मजा आता है। हंसते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं, पर इस मरीचिका में उलझे रहते हैं। जिंदगी की मरीचिका को देखने और समझने के लिए जिंदगी को एक नए नजरिए से देखने की जरूरत होती है, जो हर कोई नहीं देख पाता। देखता भी है तो उसे स्वीकार नहीं कर पाता। कुछ अगर उसे स्वीकार भी कर ले तो भी उस भ्रम से बाहर निकलना नहीं चाहते हैं। कभी कभी ये मरीचिका आपको खामोश कर देती है और कभी आपको इतने लोगों के बीच ले जाकर खड़ा कर देती है, जहां आप अपनी ही आवाज को सुन नहीं पाते हैं। पारूल एकटक उसे देखते हुए उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। हालांकि यह भी तय था कि वह शख्स क्या कह रहा है उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर फिर भी वह उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। मरीचिका, मरीचिका, मरीचिका। इतना कहने के बाद वह शख्स एक बार फिर से खामोश हो जाता है। कुछ देर चुप रहने के बाद पारूल उससे कहती है कि आपकी खामोशी का राज ये मरीचिका है? आपका नाम क्या है?, आप कहां से है? आपके परिवार में कौन है और कहां है? पारूल के इन सवालों जवाब में एक बार फिर वह शख्स खड़ा होता है और फिर उसी खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता है। वह बाहर को देखता है और पारूल से पूछता है कि क्या आप मरीचिका का मतलब जानती है? अगर हां तो ही आप मेरी बात को समझ सकती है और यदि नहीं तो पहले आप मरीचिका का मतलब समझकर आना उसके बाद हम बात करेंगे। इतना कहने के बाद वह शख्स एक बार फिर खिड़की की ओर देखने लगता है। इसके बाद पारूल वहां से अपना बैग, किताबें और फाइल लेकर वहां से चली जाती है। 


 

मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 1 Marichika: The story that will make you think

        मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 1



गर्मी के दिनों में रेगिस्तान में लोगों को पानी होने का भ्रम होता है, जिसे मरीचिका कहते हैं। ये भ्रम ऐसा होता है कि रेगिस्तान में खड़ा व्यक्ति स्वतः ही उस भ्रमित झील की ओर चल पड़ता है, परंतु ज बवह उस स्थान पर पहुंचता है तो उसे वहां रेत के सिवाय कुछ नहीं मिलता। मिलता है तो एक और भ्रम। फिर कुछ दूरी पर उसे पानी होने का आभास होता है और वह इस भ्रम में ही रह जाता है कि रेगिस्तान में उसे पानी मिलेगा, पर वो इस भ्रम से निकल नहीं पाता है। ऐसा ही भ्रम मेरी इस कहानी में भी है, जिसमें कई लोग फंसे है और निकल नहीं पाते। इस कहानी में मेरे कुछ तर्क ऐसे भी है जो आप सभी पाठकों को विरोधाभासी लगे, परंतु कहानी के पात्रों के कारण मैं उन तर्कों का प्रयोग कहानी में कर रहा हूं, परंतु मेरा उद्देश्य उन तर्कों को उचित ठहराना या जिन विषयों पर वो तर्क कर रहा हूं उनका विरोध करना बिल्कुल भी नहीं है। इस कहानी में मैं एक नया प्रयोग करने जा रहा हूं, जो संभवतः आपको पसंद आए यह कहानी में वर्तमान से फ्लैश बैक में प्रस्तुत करूंगा। तो आइए शुरू करते है कहानी मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर। 


पारूल के कपड़ों पर खून ही खून ही लगा था। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा रूकने का नाम नहीं ले रही थी। वह उस अस्पताल के एक कोने में बैठी बस एकटक एक कमरे को देखकर रोए जा रही थी। उसे इतना भी आभास नहीं था कि अस्पताल परिसर में इस समय हडकंप सा मचा हुआ है। पुलिस से लेकर अस्पताल के कर्मचारी डॉक्टर इधर-उधर दौड़ रहे हैं। अस्पताल में मौजूद अन्य मरीज शोर कर रहे हैं। मीडिया के लोग अपना काम कर रहे हैं। इन सबके बीच भी पारूल जैसे शून्य में थी और उसकी नजरें उस अस्पताल के उस खास कमरे पर ही टिकी हुई थी। अस्पताल के कुछ कर्मचारी एक स्ट्रेचर लेकर उस कमरे से बाहर निकले उस पर एक लाश थी, जो कि एक सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। उस चादर का एक हिस्सा खून से लाल हो चुका था। जैसे वे कर्मचारी उस लाश को स्ट्रेचर पर लेकर बाहर निकले, कोने में बैठी पारूल जो से चीख पड़ी। अस्पताल की कुछ नर्सों ने उसे पकड़ा और संभालने की कोशिश की। वहीं पुलिस की कुछ महिलाकर्मियों ने भी उसे संभालने का प्रयास किया। अस्पताल के लोगों ने उस स्ट्रेचर को लाश के साथ ही वहां खउ़ी एक एबूंलेंस में रख दिया और फिर वह एबूंलेस वहां से रवाना हो गई। करीब एक घंटे के बाद अस्पताल में एकदम शांति छा गई थी। पारूल अब भी उसी कोने में बैठी उस कमरे को लगातार देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर आंसूओं के दाम साफ देखे जा सकते थे। तभी कंधे पर रखे एक हाथ ने उसे शून्य से फिर से वर्तमान में खींच लिया था। कंधे पर रखा हाथ एक 7 साल की बच्ची का था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने पारूल को देखा और कहा आंटी, आप क्यों रो रही हो, क्या आपको भी चोट लगी है? आप रो मत मैं भगवान जी से कहूंगी कि वो आपकी चोट भी जल्दी ठीक कर दें। इतना कहकर वो लड़की एक बार फिर मुस्कुराई और पारूल के गालों पर आंसूओं की कुछ बुंदे थी उन्हें अपने नन्हें से हाथों से पोछते हुए वहां से चली गई। पारूल उस लड़की को जाते हुए देख रही थी, वो छोटी लड़की भी पारूल को जाते-जाते देख रही थी और मुस्कुरा रही थी। पारूल के कंधे में उस नन्हें हाथ के स्पर्श ने उसे संभलने का मौका दिया और फिर पारूल अपना बैग, कुछ किताबें, अपना मोबाइल समेटकर खड़ी हुई भारी कदमों से उस अस्पताल से बाहर आ गई। 


कुछ ही देर में पारूल अपने घर पर आ गई थी। वह अब भी मायूस थी अपना सामान एक टेबल पर रखने के बाद वह अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसके चेहरे पर उदासी साफ नजर आ रही थी। कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद पारूल उठी और बाथरूम में चली गई और नहाकर फिर बाहर आ गई। अब पारूल कुछ हद तक संभल चुकी थी। फिर उसने पानी पिया और फिर से उसकी कुर्सी पर आकर बैठ गई। ऐसे ही बैठे बैठे पारूल अपने बीते दिनों की यादों में खो गई थी, जो कि आज से करीब चार साल पहले शुरू हुई थी। तब पारूल एक छोटे शहर से साइकलॉजी का कोर्स खत्म कर आई थी और करीब छह महीने से एक डॉक्टर मिहिर रस्तोगी के साथ काम कर रही थी। एक दिन मिहिर ने पारूल को अपने केबिन में बुलाया और पारूल कुछ ही देर में उनके केबिन में पहुंच गई थी। पारूल के केबिन में पहुंचने के बाद डॉक्टर मिहिर ने अपनी बात कहना शुरू की। पारूल आज मैं तुम्हें एक केस देना चाहता हूं। इस केस में हो सकता है तुम्हें काफी मेहनत करना पड़े और यह भी हो सकता है कि तुम बहुत ही जल्दी इस केस को सॉल्व भी कर दो। वैसे ये केस हम दोनों के लिए एक चैलेंज है। पारूल ने कहा कि ऐसा क्या केस है सर, कि जो हमारे लिए चैलेंज है? मिहिर ने पारूल से कहा कि चैलेंज इसलिए कह रहा हूं पारूल क्योंकि हमसे पहले करीब पांच डॉक्टर इस केस पर काम कर चुके हैं, पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है। अब यह केस हमारे पास आया है और मैं चाहता हूं कि तुम इस केस को अकेले हैंडल करो। इससे तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा और साथ ही तुम्हें एक नया अनुभव भी मिलेगा। अगर देखा जाए तो साइकलॉजी के क्षेत्र में यह केस अपने अपने आप में एक अनुठा केस है, जहां देश के पांच बड़े साइकलॉजिस्ट इस केस में सफल नहीं हो सके हैं और अब यह केस हमारे पास है, यानि कि छठवे डॉक्टर के पास। मैं चाहता हूं कि अब इस केस में कोई सातवां डॉक्टर न आए और तुम इस केस को सॉल्व करो। पारूल ने कहा कि जी, सर मैं पूरी कोशिश करूंगी। इसके बाद डॉक्टर मिहिर ने पारूल को एक फाइल दी और कहा कि ये केस की पूरी जानकारी है। इसके साथ ही उन पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट भी जो तुमसे पहले इस केस पर काम कर चुके हैं। इसे बहुत ध्यान से पढ़ना, इससे तुम्हें केस में मदद मिल सकती है। अगर कोई परेशानी आती है तो मैं तो हूं कि, पर फिर भी यह केस सिर्फ तुम्हारा है। तुम्हें यह केस हर हाल में सॉल्व करना है। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा यकीन है कि तुम इसमें जरूर सफल रहोगी। पारूल ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए कहा कि जी, सर मैं हर संभव कोशिश करूंगी कि आपको मैं निराश न करूं। ओके तो अब तुम जा सकती हो पारूल। तुम फाइन की स्टडी करने के बाद मुझे बता देना कि तुम कब से इस केस पर काम शुरू करोगी तो मैं बाकि अरजमेंट कर दूंगा। जी, सर। इतना कहकर पारूल वह फाइल लेकर मिहिर के केबिन से चली गई। 


घर पहुंचकर पारूल ने वह फाइल खोली और उसे पढ़ना शुरू किया। फाइल में जो लिखा था उसके अनुसार एक लड़का 32 या 34 साल का था। पिछले तीन सालों से वह एक मनोरोगी चिकित्सालय में रह रहा था। उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं मिली थी। पुलिस ने अपनी ओर से कई प्रयास किए थे कि उसका कोई परिचित, कोई रिश्तेदार, परिवार के संबंध में कोई जानकारी मिले, परंतु वह भी हासिल नहीं हो सकी थी। फाइल में इस बात का खास तौर पर उल्लेख किया गया था कि जबसे वह हॉस्पिटल में आया है, तब से उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला है। वह हमेशा ही चुप रहता है। हमेशा शांत बना रहता है, अन्य मरीजों के तरह वह कभी भी हाईपर नहीं हुआ है। हॉस्पिटल स्टॉफ द्वारा उससे जो कहा जाता है वह उसे कर देता है। उसका दिमाग स्थिर है, परंतु जिस तरह से वह रहता था वह लोगों को परेशान करता था। तीन साल तक उसके मुंह से किसी ने कोई शब्द नहीं सुना था। फाइल में जो पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट थी उसमें भी यही एक बात विशेष तौर पर लिखी थी कि उसका इलाज तब ही संभव हो सकता है कि जब वह कुछ बोले और अपने बारे में बताए। किसी बात का अंदाजा लगाने भर से उसका इलाज किया जाना असंभव है। जब तक उसकी परेशानी या मानसिक स्थिति के बारे में कुछ पता नहीं चलेगा तो उसका इलाज कैसे किया जा सकता है। किसी डॉक्टर ने छह माह, किसी ने एक साल तक उससे बात कर उससे कुछ बोलने के लिए मेहनत की परंतु उसके मुंह से कभी कुछ नहीं निकला। पारूल उस फाइल को पढ़ते हुए थोड़ा अचरज में थी कि कैसे कोई व्यक्ति 3 साल से चुप है? पारूल की उस व्यक्ति से मिलने की इच्छा तीव्र हो रही थी। हालांकि उसने फाइल को एक बार फिर ध्यान से पढ़ा, परंतु इस बार भी उसे कुछ खास जानकारी नहीं मिली थी। अब पारूल ने तय कर लिया था कि वह उस व्यक्ति से मिलने के बाद ही उसके इलाज के बारे में तय करेगी कि क्या और कैसे करना है। 


Not good, be a very bad...  अच्छे नहीं बहुत बुरे बनों...

 अच्छे नहीं बहुत बुरे बनों...



शीर्षक को पढ़कर आप सभी आश्चर्य कर रहे होंगे कि ये कैसा विषय है और या क्या सलाह दी जा रही है। घर परिवार के लोगों के साथ ही दुनियां भर के लोग जहां अच्छा बनने की बात कहते हैं वहीं मैं बुरा और बहुत बुरा बनने के लिए कह रहा हूं या सलाह दे रहा हूं। पर शायद आज की आवश्यकता ही यही है कि हम अच्छे नहीं बहुत बुरे बनें। अच्छा बनने में कोई नुकसान नहीं है, परंतु बहुत बुरा बनने में फायदे बहुत ज्यादा है। अगर आप बुरे बनते हो तो कोई आपका इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। क्योंकि अगर आप अच्छे हैं तो आपका इस्तेमाल होना तय है। इसके साथ ही आपका इतना इस्तेमाल किया जाएगा कि आप अपने लायक ही नहीं रहेंगे। अगर बुरे हैं तो लोग आपका इस्तेमाल करने से पहले डरेंगे। तो फिर बुरा बनना ही अच्छा है ना। 

आज के माहौल में अच्छा होना एक तरह से अपशब्द है खासकर उसके लिए जो सच में अच्छा इंसान है। वह जो दूसरों की तकलीफ को समझकर उनके साथ खड़ा होता है, वह जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता है। वह जो किसी का दिल दुखाने से डरता है, वह जो किसी को चोट देने से पहले उस चोट के दर्द को महसूस करता है। ऐसा इंसान उन लोगों को न्यौता देता है कि मैं इस्तेमाल होने के लिए तैयार हूं, आप मेरा इस्तेमाल कर सकते हैं। आज की दुनिया की भाषा में ऐसे इंसान को अच्छा इंसान नहीं बल्कि मुर्ख कहा जाता है और उसका भरपूर इस्तेमाल करने के बाद उसे इस तरह से फेंक दिया जाता है, जैसे कि दूध में पड़ी मक्खी को निकालकर फेंक दिया जाता है। इसलिए बुरे बनों, दूसरों की तकलीफ को देखो, उस पर बात करो, उसकी तकलीफ के लिए उसे ही दोष दो, पर जब मदद करने की बात आए तो इतने बुरे बन जाओं कि कोई भी आपसे मदद मांगने से पहले दो बार तो सोचे। 

बुरा बनने का मतलब मैं यह नहीं करता कि आप अपराध करने लग जाओ। मीठा बोलों, अपना काम निकलवाओ, कोई अच्छा इंसान मिला है तो उसका भरूपर इस्तेमाल करो, अपना काम निकलवाओ और फिर चल दो। छोड़ दो उसे उसके हाल पर। उसे भी तो अहसास होने दो कि अच्छे इंसान के साथ क्या होता है, अगर समझ गया तो वह भी आपकी जमात में शामिल हो जाएगा, नहीं एक बार फिर किसी ओर को मौका देगा अपना इस्तेमाल करने के लिए। चापलूसी, जलन रखना, शिकायत करना, तरक्की करने वाले की टांग खिंचना ये एक समय तक अवगुण थे, परंतु आज के समय में ये आपकी विशेष कला है, जिनके बल पर आप तरक्की का आसमान छू सकते हैं। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति अपने ऑफिस में लगातार आठ घंटे काम करता है। वह अपना काम ईमानदारी और बहुत अच्छे से करता है ताकि उसकी तरक्की हो और वह खुश रह सके। उसी ऑफिस में एक और व्यक्ति है जो कि काम न करने के बहाने खोजता है, टाइम पास करता है फिर भी तरक्की कर जाता है। क्योंकि उस काम करने वाले व्यक्ति के आठ घंटे के बेहतर काम पर उस काम न करने वाले के आठ सेंकड भारी पड़ जाते हैं। ऑफिस के बॉस आते हैं काम करने वाला व्यक्ति अपने काम में व्यस्त था और काम न करने वाले व्यक्ति ने बॉस की शर्ट की तारिफ कर दी तो वह आठ घंटे बेकार हो जाते हैं। उसके ये आठ सेंकड काम करने वाले व्यक्ति पर हमेशा भारी रहेंगे क्योंकि वह अपनी चापलूसी से एक दिन तरक्की पर होगा और काम करने वाला व्यक्ति ईमानदारी से कार्य करता ही रहेगा, इस उम्मीद में कि एक दिन उसे भी तरक्की मिलेगी। 



अच्छा इंसान कभी दोस्ती में, कभी रिश्तेदारी में तो कभी प्यार में इस्तेमाल ही होता रहेगा। इसलिए बहुत बुरे बनो और अपना अपना इस्तेमाल होने से पहले ही सबका इस्तेमाल कर सुकुन की जिंदगी जिओ। अच्छे इंसान हो तो भी लोग बोलेंगे ही और बुरे इंसान रहोंगे तो भी बोलेंगे ही। एक हिंदी फिल्म का गीत भी है कि कुछ तो लोग कहेंगे... लोगों का काम है कहना...। तो फिर ऐसे लोगों की बातों पर क्या गौर करना, जो हर हाल में कुछ न कुछ कहेंगे ही। पर बुरा बनने का फायदा यह होगा कि कोई आपका इस्तेमाल नहीं कर पाएगा, चाहे वह आपका दोस्त हो, रिश्तेदार हो या प्यार हो। आपकी बुराई उन्हें कुछ तो डराकर रखेगी ही। बुरा बनने से एक फायदा और है कि इस्तेमाल होने के बाद आपको पछतावा, मायूसी, अकेलापन, शर्मिंदगी, डिप्रेशन जैसी परेशानियां भी नहीं होगी, क्योंकि अच्छा होकर अगर आप इस्तेमाल होते हैं तो ये बातें कहीं न कहीं आप पर हावी हो ही जाती है। हो सकता है कि आपको एक बार में इन सभी का अनुभव न हो पाए, परंतु जब आप बार बार लगातार इस्तेमाल होते रहेंगे तो आप इनको अनुभव करने लगेंगे। इसलिए बुरे बनिये और बहुत बुरे बनिये। छल, कपट, धोखा, मक्कारी, चालाकी ये वो बातें है जो आपको आज के समय में होशियार बनाते हैं। इनके बिना आज का इंसान इंसान नहीं बल्कि मुर्ख है। ये सभी विशेषताएं एक तरह से श्रंगार है, जो कि आपको परिपक्व बनाते हैं। इनके बिना आपके अस्तित्व की कोई व्याख्या नहीं है। ये सभी बातें ही बुरे इंसान की विशेष पहचान होती है और इनके बिना अप बुरे होने का सोच भी सकते हैं। 



फिर भी अगर आपको लगता है कि नहीं आप बुरे नहीं है और न ही बन सकते हैं और आपको धैर्य, संयम, सहनशीलता रखना होगी। क्योंकि अच्छा होने का एक फायदा जरूर है कि एक न एक दिन आपकी अच्छाई सभी के सामने आएगी ही। जैसे एक फूल को कितना भी दबा लिया जाए पर ज बवह खिलता है तो उसकी खुशबू और उसकी सुंदरता चारों और नजर आती है। आपका इस्तेमाल करने वाले लोग ही एक दिन आपकी अच्छाई की कीमत को समझेंगे और तब वह समझेंगे कि गलत आप नहीं वो थे जो कि अपने अच्छे साथी को पहचान नहीं सकें। ऑफिस में काम न करने वाला व्यक्ति काम न करने की आदत के कारण एक दिन बॉस की नजर में आएगा ही फिर उसकी वो तरक्की भी किसी काम की नहीं होगी और आपकी आठ घंटे की मेहनत और आपका अच्छा कार्य आपको आपकी तरक्की पर ले जाएगा। फिर यह तरक्की आपकी सफलता की सीढ़ी होगी और खुशियों का आसमान होगा, जो सिर्फ आपका होगा। पर तब तक आपको धैर्य रखना ही होगा, विचलित नहीं होगा, अपने आपको हमेशा अच्छा रखना होगा, कई बार खुद का इस्तेमाल भी होते रहने देना होगा। लोगों की बातों को सुनकर अनसुना करना होगा। अगर आप ये सब कर सकते हैं तो अप अच्छे बनिये, नहीं तो....। 


कौन है मेरे अंर्त में...

कौन है मेरे अंर्त में... 


शोर कितना भी हो, 

फिर भी एक आवाज बड़े जोर से आती है।

मेरे अंदर की आवाज, 

अक्सर मेरे कान तक पहुंच जाती है।।


कभी दिल, कभी मन, कभी अंर्त मन होता है, 

कभी गुम, तो कभी आसपास रहता है।

कौन है जो मेरे अंदर ही रहता है,

कभी खामोश कभी बहुत कुछ मुझसे कहता है।।



उसकी कही गई बातें, 

कभी सही तो कभी गलत लगती है।

कभी वो कुछ ऐसा कहता है, 

कि अक्सर चुभन सी लगती है।।


आज फिर शायद उस दिल ने, 

मुझे एक ताना मारा है।

पूछ रहा है कहां है मेरे अपने, 

तू तो कहता था ये जहां तेरा सारा है।।


आज पूछ रहा है वो मुझसे, 

क्या हासिल मेरी मिल्कियत है।

अश्कों से भरी आंखे,

और कुछ उदासी मेरी तबीयत है।।


ले जाकर मुझे यादों के गहरे समंदर में, 

वो अक्सर मुझसे मेरी ही बातें करता है।

करके कुछ सवाल मुझसे अजब से, 

अक्सर मेरी रातें जागती करता है।।


करना चाहता हूं उसे जितना खामोश, 

वह उतना ही मेरे अंदर शोर करता है।

कभी रोता है, कभी हंसता है, 

और कभी कभी मुझ पर ही जोर करता है।।


कभी बदतमीज, कभी तहजीबदार होता है, 

कभी चंचल भी जैसे कई रूप अख्तियार करता है।

मेरे अपनों के असली चेहरे दिखाकर, 

वो मुझे अक्सर तैयार करता है।।


जो मैं अकेला हूं तो बात उससे हो जाती है, 

अब रोज ही उससे मेरी मुलाकात हो जाती है।

कभी मेरी तो कभी अपनों की बातें वो करता है, 

ये शायद मैं ही हूं अंर्त में, जो खुद से बातें करता हैं।।