apne-paraye

अपने-पराये 

जिंदगी में हमें कई लोग मिलते हैं। कुछ ऐसे में भी होते हैं, जो हमेशा के लिए याद रह जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो मिलने के बाद भी याद नहीं रह पाते हैं। जिंदगी की रफ्तार में कई अपने बिछड़ जाते हैं और कई पराये अपने भी हो जाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे में होते हैं, जो वक्त के अनुसार अपने और पराये तय कर लेते हैं। वैसे मेरी कहानी का शीर्षक अपने पराए अपने आप में ही तीन अर्थ रखता है। पहला- अपने और पराये, दूसरा- कभी जो अपने थे, वो अब पराये हो गए और तीसरा- अपने हो गए, जो कभी पराये थे। कहानी में हो सकता है आपको तीनों अर्थ नजर आए, पर मैं यह आप पर छोड़ता हूं कि आप कहानी में कौन सा अर्थ समझते हैं। 
शहर के बीचों बीच एक मोहल्ले में बड़ा आलीशान से मकान बना हुआ था। इस मकान की एक खिड़की सड़क की ओर खुलती थी और एक बड़ा सा गेट था, जिसके बाहर डोर बेल भी लगी थी। मोहल्ले के कुछ शरारती बच्चे अक्सर इस डोर बेल को बजाकर भाग जाया करते थे और फिर घर के अंदर से अक्सर गालियों की बौछार हुआ करती थी। आवाज से लगता था कि यह किसी बुजुर्ग की आवाज है, जो इन शरारती बच्चों की हरकत से काफी परेशान है। बच्चे भी कम नहीं थे, अक्सर वे डोर बेल बजाकर या तो वहीं खड़े रहते थे या भाग जाया करते थे और अंदर से वे बुजुर्ग अक्सर उन बच्चों को अपशब्द कहते थे। ये कहानी लगभग रोज की ही थी। 
मई-जून की गर्मी का समय था और घड़ी भी समय करीब 2 बजे का बता रही थी। गर्मी अधिक होने के कारण मोहल्ला लगभग सुनसान था। एक या दो व्यक्ति ही सड़क पर घूमते नजर आ रहे थे। मोहल्ले की अधिकतर घर के दरवाजे बंद थे। ऐसे में एक करीब 22 सवाल का नौजवान कंधे पर एक थैला लटकाए कुछ घरों के बाहर रूकता उनका खत वहां डाल देता। कभी किसी घर के सामने वह आवाज भी लगाता, परंतु कोई जवाब न मिलने पर निराश होकर आगे बढ़ जाता था। गर्मी अधिक होने के कारण उसे काफी प्यास लगी थी और वह कुछ घरों में आवाज लगाकर पानी पीने के लिए मांगना चाह रहा था, परंतु अंदर से कोई जवाब न मिलने पर वह आगे बढ़ जाता था। वह उम्मीद कर रहा था कि शायद किसी घर से तो उसे पीने के लिए पानी मिल ही जाएगा। जब वह बेहाल होने लगा तो उसने एक घर की डोर बेल बजा दी। यह वहीं घर था। इस बार भी डोर बेल बजते ही अंदर से अपशब्द सुनाई पड़े। वह नौजवान कुछ डर गया, पर फिर उसे दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह वहीं रूक गया। हालांकि दरवाजा उस खिड़की का खुला था, जो सड़क की ओर खुलती थी। खिड़की खुली और एक 70 वर्षीय बुजुर्ग ने आवाज लगाई कौन है, घंटी बजाकर भाग जाते हो, परेशान कर रखा है। अपने घरों की घंटी क्यों नहीं बजाते हो? वो नौजवाल कुछ आगे बढ़कर खिड़की के पास आया और बुजुर्ग से बोला माफ कीजिएगा बाबाजी, बहुत प्यास लगी थी, इस कारण घंटी बजा दी। अब तक कई घरों में आवाज दी, परंतु कोई बाहर निकलकर नहीं आया। ये बड़ा घर देखा तो घंटी बजा दी। बहुत प्यास लगी है यदि थोड़ा पानी मिल जाता तो आपका उपकार होता। 
उन बुजुर्ग ने कुछ देर नौजवान को यूं ही देखा और फिर पूछा तू है कौन?

नौजवान ने उत्तर दिया, बाबूजी आपके क्षेत्र का डाकिया हूं। कुछ दिन से ही आ रहा हूं।ठीक है बड़ा दरवाजा खोलकर अंदर आ जा। ला रहा हूं तेरे लिए पानी। नौजवान भी दरवाजा खोलकर अंदर चला जाता है और बाबूजी का इंतजार करता है। मन नही मन सोच रहा था कि कैसे हे ये मोहल्ले वाले एक गिलास पानी भी नहीं पिला सके। और एक ये बुजुर्ग है, जो पानी लेने के लिए खुद चले गए। घर में कितने ही नौकर होंगे, चाहते तो किसी को भी आवाज लगा देते तो वो ही पानी दे जाता। नौजवान बड़ा घर देखकर घर में कई लोगों के होने और घर में नौकर होने का अंदाजा लगा रहा था। 
नौजवान बस सोच ही रहा था कि अंदर कुछ गिरने की आवाज आई। इसके बाद शायद उन बुजुर्ग के कराहने की आवाज आ रही थी। घर के दरवाजे के बाहर खड़ा नौजवान कुछ देर के विचलित हो गया। परंतु काफी देर तक वे बुजुर्ग कराहते रहे और घर से किसी शोर की आवाज नहीं आई तो वह नौजवान हिम्मत कर दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। जैसे ही वह अंदर पहुंचा तो देखा वह बुजुर्ग वहां गिरे पड़े हैं और वहां पानी भी फैला है और गिलास लुढ़ककर एक टेबल के नीचे चला गया है।
नौजवान ने अपना डाक का थैला एक ओर रखा और सहारा देकर बुजुर्ग को उठाने का प्रयास किया। पर बुजुर्ग उठने में असमर्थ थे और दर्द के कारण काफी करार रहे थे। नौजवान ने उन्हें गोद में उठाया और उनके एक एकमरे में बिस्तर पर जाकर लेटा दिया। फिर वह भागकर बाहर आया और पास ही एक डॉक्टर को बुलाकर घर ले आया। डॉक्टर ने पहले तो घर आने से मना कर दिया, परंतु नौजवान के बार-बार कहने पर डॉक्टर भी घर आ गया। डॉक्टर ने बुजुर्ग को देखकर बताया कि पै की हड्डी टूट गई है इन्हें हॉस्पिटल में भर्ती करना होगा। नौजवान ने हां कहा और कुछ ही देर बाद वह बुजुर्ग को लेकर अस्पताल आ गया। डॉक्टर ने अपना इलाज प्रारंभ किया। कुछ देर बाद बुजुर्ग को वार्ड में शिफ्ट भी कर दिया गया। नौजवान अब इस बात की चिंता कर रहा था कि अब वह हॉस्पिटल का बिल कैसे देगा? उसकी जेब में तो कुछ ही रूप्ए पड़े हैं। उस डॉक्टर ने भी नौजवान से बिल को लेकर कोई बात नहीं की। परंतु यह जरूर कहा कि इनका बहुत ध्यान रखना, उम्र अधिक होने के कारण हड्डी को जुड़ने में समय लग सकता है। नौजवान ने हामी भरी और फिर बुजुर्ग के पास आ गया। 
नौजवान ने बुजुर्ग से कहा मुझे माफ करिएगा बाबूजी, मेरे कारण आपको यह सब सहना पड़ रहा है। ना मैं आपसे पानी मांगता और ना ही आप ऐसे गिरते। मुझे माफ करना बाबूजी। 
बुजुर्ग ने कहा अरे कोई बात नहीं। शायद मेरी किस्मत में ही लिखा था गिरना, सो गिर गया। तू नहीं आता तो कोई आकर परेशान करता है और मैं उसके पीछे भागता और शायद गिर जाता। नौजवान ने कहा अच्छा बाबूजी अभी तो मैं जाता हूं, कुछ और खत बाकि रह गए हैं, वो बांटकर शाम को आता हूं। आप यहां आराम करें, मैं रोज सुबह और शाम को यहां आकर आपका ध्यान रखूंगा। बुजुर्ग ने भी बस हां में सिर हिलाया और नौजवान वहां से चला गया।

शाम को ठीक 6 बजे नौजवान हॉस्पिटल आ गया। इस बार वह बुजुर्ग के लिए कुछ फल साथ लेकर आया था। आते ही उसने वो फल उन बुजुर्ग को खिलाए। वह बुजुर्ग फल खाने के बाद नौजवान से बोले। पहले तुझे कभी इस मोहल्ले में देखा नहीं, कौन है तू? 
बाबूजी हमारा नाम सुधीर है, पास के ही गांव में रहते हैं। हमारे बापू पहले यहां डाकिया थे, अचानक वे चल बसे तो उनकी जगह हमें यह नौकरी मिल गई है। अभी चार ही दिन हुए हैं नौकरी पर आए। अच्छा-अच्छा, बुजुर्ग ने कहा। चल अब तू घर जा और आराम कर। यहां रोज-रोज आने की जरूरत नहीं है। यहां का डॉक्टर मेरा परिचित है वो मेरा ध्यान रख लेगा। 
नहीं, बाबूजी हम तो आएंगे। आप चाहे मना करें। हमारी वजह से आपको चोट लगी है तो हम आपका ध्यान रखेंगे। इतना कहकर सुधीर वहां से चला जाता है। रास्ते में ही उसे डॉक्टर मिलते हैं, और वे सुधीर से कहते हैं कि पांच दिन बाद हम इनकी छुट्टी कर देंगे बस इतना ध्यान रखना कि ये घर पर पूरी तरह से आराम करें। सुधीर डॉक्टर की बात सुनकर थोड़ा परेशान हो गया, फिर मन ही मन कुछ तय कर मुस्कुरा दिया। उसने डॉक्टर से पूछा कि आप इन्हें जानते है? डॉक्टर ने कहा अरे, भाई तुम शहर में नए हो क्या? इन्हें कौन नहीं जानता। ये अपने जमाने के बहुत बड़े डॉक्टर है, इनका नाम है डॉ. समर्थ अग्निहोत्री। आज भी नए डॉक्टर कहीं फंस जाते हैं तो इन्हीं से सलाह लेते हैं। बस वक्त ने इनके साथ बहुत बुरा किया है। पत्नी इन्हें छोड़कर चल बसी और एक बेटा है जो अमेरिका जाकर बस और 10 साल हो गए अपने पिता की कभी खबर भी नहीं ली। इतना कहकर डॉक्टर वहां से चला गया।
पांच दिन बाद डॉक्टर ने डॉ. अग्निहोत्री को छुट्टी दे दी और सुधीर में डॉक्टर अग्निहोत्री को उनके घर ले आया। यहां बैड पर लिटाकर उसने कहा बाबूजी आप चिंता मत करिए आप बस आराम कीजिए। मैं रोज सुबह और शाम को आ जाया करूंगा और आपको नहलाना, नाश्ता कराना, खाना खिलाना, घर का झाडू-पोंछा सब कर दिया करूंगा। इस पर डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा झल्लाकर कहा, तू क्यों करेगा। अरे बाबूजी आप कितना भी गुस्सा हो जाए, मैंने आपसे कहा है ना कि मेरे कारण आपको दर्द हुआ है तो मैं ही आपका ध्यान रखूंगा। इसके बाद सुधीर डॉ. अग्निहोत्री के लिए कुछ फल लेकर आ जाता है और उन्हें काटकर देता है। इसके बाद कमरे में झाडू-पोंछा करि बाबूजी के लिए खाना बना देता है। उन्हें खाना खिलाने के बाद सुधीर ने कहा कि अब आप सो जाइए बाबूजी, मैं सुबह आता हूं, फिर गरमा-गरम नाश्ता करा दूंगा। ये दवा और पानी पास में ही रखी है, करीब एक घंटे बाद ये दवा ले लेना। रात को नींद न आए तो ये दवा लेकर सो जाना। अब मैं सुबह आउंगा। इतना कहकर सुधीर चला जाता है। डॉ. अग्निहोत्री भी कुछ देर बाद दवा लेकर सो जाते हैं। 
अगले दिन फिर सुबह सुधीर आता है, घर की साफ-सफाई के बाद बाबूजी को भी तैयार कर उन्हें नाश्ता कराकर अपने काम पर चला जाता है। दिन में एक बार फिर वह आता है और डॉक्टर अग्निहोत्री को खाना खिलाकर चला जाता है। इसी तरह कई दिन बीत जाते हैं और डॉक्टर अग्निहोत्री की भी हालत में सुधार आने लगता है। अब वे धीरे-धीरे सुधीर के सहारे से चलने का प्रयास भी करने लगते हैं। इन कुछ दिनों में डॉक्टर अग्निहोत्री और सुधीर के बीच बातचीत भी शुरू हो जाती है। 
ऐसे ही एक दिन सुधीर की छुट्टी थी तो वह दिन भर डॉक्टर अग्निहोत्री के पास ही था। इस दौरान डॉक्टर ने उससे कहा कि तू बहुत अच्छा है रे। इतना ध्यान तो शायद मेरा बेटा भी नहीं रखता है। इस पर सुधीर ने कहा कि मुझे अपना बेटा ही समझ लिजिए बाबूजी। बड़े भईया नहीं है तो क्या? आपका ये बेटा है ना आपका ध्यान रखने के लिए। आप तो बस जल्दी से अच्छे हो जाइए। क्यों थक गया क्या मेरी सेवा करते हुए? बाबूजी ने मजाकिया अंदाज में कहा। सुधीर ने थोड़ा रूठते हुए कहा कि अरे, बाबूजी आपकी सेवा से हम थक गए आपको ऐसा लगता है? हम तो जिंदगी भर आपकी सेवा कर सकते है। और अब ऐसी बात मत करिएगा। एक तो हमारी वजह से आपको चोट आ गई और इस नौकरी के कारण हम आपकी सेवा भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। अरे, और कितनी सेवा करेगा। अच्छा ये बता कि तेरे घर-घर में कौन-कौन है? अब कहां कोई बचा बाबूजी, हम तो इस दुनियां में अकेले हैं। 8 साल पहले मां गुजर गई और करीब 2 माह पहले बापू भी। बापू की नौकरी हमें मिल गई, बस उसी से गुजर-बसर कर रहे हैं। 

बाबूजी अगर बुरा ना माने तो हम भी एक बात पूछे। हां, हां पूछ? अब तेरी किसी बात का बुरा नहीं लगता। इतना बड़ा घर है, हम तो सोचे थे, बहुत सारे लोग रहते होंगे और घर में नौकर-चाकर होंगे, पर आप तो यहां अकेले रहते हैं। डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा उदासी भरे स्वर में कहा- तेरे और मेरे हालात में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। 12 साल पहले तेरी अम्माजी हमें छोड़कर चली गई और एक बेटा था वो भी 11 साल पहले अमेरिका गया था, सो अब तक नहीं लौटा। पहले एक साल तो बहुत फोन आते थे, उसके बाद फोन भी बंद हो गए हैं। पिछले 10 साल से यहां अकेला रह रहा हूं और मौत का इंतजार कर रहा हूं। अरे, मरे आपके दुश्मन बाबूजी। अब हम आ गए हैं ना, अब आप अकेले नहीं रहेंगे। सुधीर ने बड़े ही जोश के साथ कहा। वक्त लगातार बीत रहा था। डॉक्टर अग्निहोत्री भी अब पूरी तरह से ठीक हो गए थे। इसके बाद भी सुधीर प्रतिदिन घर पर आता और पहले की तरह रोज झाडू-पोंछा कर नाश्ता और खाना बनाता। डॉक्टर अग्निहोत्री के कहने से अब वो भी यही खाना खाता था। कभी भी कुछ सामान की जरूरत होती तो डॉक्टर अग्निहोत्री सुधीर को रूपए देते और वह सामान लेकर आ जाता था। 
एक दिन सुधीर दोपहर के समय घर पहुंचा। डॉक्टर अग्निहोत्री ने कहा अरे, तू इस समय यहां कैसे आ गया। आज नौकरी नहीं करना है क्या? 
सुधीर ने कहा- बाबूजी नौकरी ही तो कर रहा हूं। आपके नाम का एक खत आया था, वहीं देने आया हूं। आपकी सेवा के लिए तो शाम को आउंगा। 
डॉक्टर अग्निहोत्री ने खत लिया और पढ़ने लगे। खत पढ़कर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बाबूजी को रोता देख सुधीर ने कहा कि क्या हुआ बाबूजी, किसका खत है और आप रो क्यों रहे हैं? 
डॉक्टर अग्निहोत्री ने सुधीर को देखा और कहा कि मेरा बेटा आ रहा है। अपनी पत्नी और मेरे पोते के साथ। 10 साल बाद उसे देखूंगा। मुझे तो यकी नही नहीं हो रहा है। 
अरे, वाह से तो बहुत बड़ी खुशखबरी है बाबूजी। भईयो और भौजी आ रहे हैं, साथ में उनका लल्ला भी आ रहे हैं। वहां बाबूजी, हम तो कह रहे हैं इस बार आप भी उनके साथ चले जाइए। आपको भी अच्छा लगेगा।  सुधीर ने भी डॉ. अग्निहोत्री की खुशी में शामिल होते हुए कहा। 
अरे, पहले उसे आ तो जाने दे। एक काम कर शाम को आते हुए कुछ अच्छा सा लेकर आना। पैसे ले जा। आज बहुत दिन बाद कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है। बाबूजी ने कहा। 
सुधीर ने जी बाबूजी कहा और फिर बोला, अच्छा बाबूजी अभी तो हम जाते है, शाम को आते है। ठीक है- बाबूजी ने कहा। 
शाम को जब सुधीर घर पहुंचा तो डॉक्टर अग्निहोत्री अपनी पुरानी यादों में खोए उसे अपनी हर बात बताने लगे। इस तरह रात का काफी समय हो चला था। इसके बाद सुधीर ने उन्हें सुला दिया। बाबूजी के कहने पर वो आज अपने घर नहीं गया और बाहर के हॉल में ही सो गया। इस तरह सुधीर अब रोज ही बाबूजी के घर आता और उनकी सेवा करता रहता। 
एक दिन सुधीर बहुत ही गुमसुम सा घर पर आकर बैठ गया। डॉक्टर अग्निहोत्री ने उससे पूछा अरे क्या हुआ सुधीर आज तू इतना चुप क्यों है? सुधीर ने अब भी कुछ नहीं कहा। बाबूजी ने उसे लताड़ते हुए कहा कि अरे, बताता है या बजाउं ये लाठी। इस पर सुधीर ने कहा कि बाबूजी हम ये नौकरी छोड़ रहे हैं। डॉक्टर अग्निहोत्री ने आश्चर्य के साथ पूछा अरे, क्यों ऐसा क्या हो गया? बाबूजी बड़े साहब ने हमारी बदली कर दी है और कह रहे हैं कि पास के शहर में जाओ। 
अरे, ये तो अच्छी बात है ना, इसमें नौकरी छोड़ने की बात कहां से आ गई? 
बाबूजी हम कह रहे हैं, हम आपको छोड़कर नहीं जाएंगे बस। सुधीर ने जिद भरे लहजे में कहा। 
बाबूजी न उसे कई बार समझाने का प्रयास किया परंतु सुधीर मानने का तैयार नहीं था। इस पर डॉ. अग्निहोत्री भड़क जाते हैं और उसे कहते है- अरे, तू कौन सा मेरा सगा है रे, जो पूरी जिंदगी यही रहेगा। यहां फ्री में खाने को मिल रहा है, इसलिए रहना चाहता है। चल जा यहां से। इतना कहकर बाबूजी अपने कमरे में चले जाते हैं। इधर सुधीर को डॉक्टर अग्निहोत्री की यह बात सुनकर बड़ा झटका लगता है और फिर वह भी अपने कमरे की ओर चला जाता है। 
अगले दिन सुबह सुधीर फिर घर आता है और बाबूजी से कहता है हमें फ्री में खाने का शौक नहीं है बाबूजी हम तो बस आपकी सेवा करना चाहते थे। आप गुस्सा न हो, अब हम जा रहे हैं। बाबूजी भी उसे जाने के लिए कह देते हैं। 

सुधीर पास के शहर में जाकर अपना काम शुरू कर देता है। परंतु वह अपने बाबूजी की चिंता में लगा रहता है। इस तरह से करीब 8 महीने बीत जाते हैं। इस दौरान सुधीर ने कई बार बाबूजी के पास जाने का सोचा, परंतु काम के कारण वह कभी छुट्टी नहीं ले सका। एक दिन वह ऑफिस में ही था कि उसके नाम का एक बड़ा सा लिफाफा आता है। वह उसे अपने घर ले जाकर खोलने का सोचता है और फिर काम में लग जाता है।
घर पहुंचकर वह लिफाफा खोलता है, तो देखता है उसमें कुछ कागजात है और एक खत भी है। पहले तो वह समझ नहीं पाता कि उसे इतना बड़ा लिफाफा किसने भेज दिया। वह खत पढ़ना शुरू करता है। 
प्यारे बेटा सुधीर, 
तू नए शहर जाकर अपने बाबूजी को भूल ही गया। पर तू मुझे रोज याद आता था। वैसे बेटा मुझे माफ करना, मैंने तुझे उस दिन खाने वाली बात कही। पर ये तू भी जानता है कि अगर मैं ऐसा नहीं कहता तो तू नए शहर में नहीं जाता। वहां तेरी तरक्की जल्दी से हो सकती है, इसलिए मैंने तुझे वहां भेजा था। उम्मीद करता हूं तू अब खुश होगा, मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है। वैसे तुझे याद है तू एक खत लेकर आया था, जिसमें मेरे बेटे के आने की सूचना थी। मुझे पता है कि वो खत तुने लिखा था। ताकि मैं खुश हो सकूं। क्योंकि मैं जानता हूं पिछले 10 सालों में जिसने एक फोन नहीं किया, वो खत क्या लिखेगा और क्या अपने पिता से मिलने के लिए आएगा। वैसे तेरे उस झूठ की खुशी का मौल तो मैं नहीं चुका सकता, पर तेरा बाबूजी होने के नाते मेरा जो कुछ भी है वो आज से तेरा हो गया है। तुझे अपने आशीर्वाद के रूप में फिलहाल मेरे पास देने के लिए यही है, पर जो तूने दिया है, उसके बदले तो मैं तुझे कुछ नहीं दे रहा हूं। वो खुशी भले ही झूठी थी, पर 10 सालों बाद तेरे झूठ ने मुझे हंसने का मौका दिया था, जो तेरा एक कर्ज है मेरे पर, बस वहीं चुकाने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूं। हो सके तो अपने बाबूजी को माफ कर देना और ये छोटी से भेंट अपने बाबूजी का प्यार समझ कर स्वीकार कर लेना। तुझे ये खत मिले तब तक शायद मैं इस दुनियां में ना रहूं, तो ये समझ ले कि यहीं तेरे बाबूजी की आखिरी इच्छा भी है, जिसे तुझे पूरा करना है। 
तेरा बाबूजी। 
खत को पढ़ने के बाद सुधीर स्तब्ध भी था, कि बाबूजी अब इस दुनियां में नहीं रहे। खत को सीने से लगाए सुधीर की आंखों से बस आंसू बह रहे थे और उसके मुंह से बस बाबूजी, बाबूजी ही निकल रहा था। 

गलती - द मिस्टेक    Final part



                गलती - द मिस्टेक

                                Final part


रात बढ़ती जा रही थी, परंतु भौमिक नींद नहीं आ रही थी। अब उसने फिर घड़ी की ओर देखा तो घड़ी में 2.30 का समय हो रहा था। अचानक ही भौमिक को पता नहीं क्या हुआ और वह सीधे बाहर की ओर गया और अपनी कार लेकर सीधे हवेली पहुंच गया। हवेली में वह काफी देर तक घूमता रहा। हर तरफ वह कुछ तलाश करने की कोशिश करता रहा। फिर वह उस हाॅल में भी पहुंचा, जहां उन चारों लोगों की हत्या की गई थी। वह हवेली में सुबह 9 बजे तक रहा और फिर सीधे अपने ऑफिस के लिए निकल गया। उसके हालात देखकर कोई भी कह सकता था कि वह रात भर सोया नहीं है। वह सीधे अपने केबिन में गया और बैठकर कुछ सोचने लगा। फिर उसने परमार को फोन लगाया। 
भौमिक- हेलो, परमार कहां हो
परमार- सर, अभी तो घर पर ही था, बस ऑफिस के लिए निकल रहा हूं। आप बताए, कुछ जरूरी काम हो तो आपके घर आ जाता हूं। 
भौमिक- परमार मैं घर पर नहीं ऑफिस में हूं। तुम एक काम करो, जितनी जल्दी हो सके ऑफिस आ जाओ। 
परमार- जी, सर। बस अभी आया। 
इधर परमार सोच रहा था कि ऐसा क्या हुआ जो सर इतनी जल्दी ऑफिस पहुंच गए और मुझे में जल्दी आने का कह रहे हैं। वहीं दूसरी ओर ऑफिस में भौमिक अपनी चेयर पर बैठकर मुस्कुरा रहा था। उसके चेहरे को देखकर लग रहा था कि उसे हवेली में हत्या से जुड़ा कोई बड़ा सुराग हाथ लगा है। अब वह केस में आगे बढ़ सकता है। कुछ ही देर में परमार भी ऑफिस पहुंच गया। परमार को देखकर भौमिक ने उसे बैठने के लिए कहा। 
भौमिक- परमार, कितनी देर करते हो? मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। एक काम करो जल्दी से दो काॅफी बोलो। आज हम साथ में काॅफी पीते हैं। 
परमार- जी, सर। अभी बोल देता हूं। 
परमार काॅफी का बोलकर फिर से केबिन में आ जाता है। 
परमार- क्या बात है सर? काफी खुश नजर आ रहे हैं। केस में कोई सुराग हाथ लग गया है क्या
भौमिक- परमार वो सब तो तुम्हें बाद में बताउंगा। फिलहाल एक काम करो। अपनी कस्टडी में वो जो आठों बच्चे हैं, उन्हें छोड़ दो। या उनके माता-पिता को फोन कर कह दो कि वे यहां आए और अपने बच्चों को ले जाए। 
परमार- पर सर अभी तो हमने केवल तीन से ही पूछताछ की है, पांच से तो बाकि है। हालांकि तीन से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली है, पर हो सकता हे कि बाकि पांच में से कोई कुछ सुराग तक हमें पहुंचा दें। 


भौमिक- परमार, मैं कह रहा हूं ना, उन्हें छोड़ दो। 
परमार- जी, सर। मैं अभी सभी के माता-पिता को फोन कर देता हूं कि वे आकर बच्चों को ले जाए। 
भौमिक- हां परमार। उसके बाद तुम्हें एक काम और करना है। 
परमार- वो क्या सर
भौमिक- मीडिया को बुला लेना। उन्हें केस के संबंध में जानकारी देते हैं। 
परमार- क्या जानकारी सर? अभी तो हमारे पास ही कोई सुराग हाथ नहीं लगा है। 
भौमिक- परमार, आज तुम्हें क्या हो गया है? आज तुम इतने सवाल क्यों कर रहे हो
परमार- साॅरी सर। मैं तो बस पूछ रहा था। 
भौमिक- पूछना भी तो सवाल ही है परमार। 
परमार- साॅरी सर। 
भौमिक- अब तुमसे जो कह रहा हूं वो करते जाओ। और देखों अपने सर का कमाल। 
परमार- सर अब मुझे लग रहा है कि आपने केस साॅल्व कर लिया है। तभी आप इतने खुश भी नजर आ रहे हैं। 
भौमिक- कुछ ऐसा ही समझ लो परमार। 
परमार- तो सर किसने की थी ये हत्या? कौन है कातिल? और आपकों कैसे उसके बारे में पता चला। क्या सुराग हाथ लग गया सर जो आप कातिल तक पहुंच गए
भौमिक- अरे, अरे परमार। एक बार में इतने सवाल। तुम्हें भी जवाब मिल जाएगा। तुम बस मीडिया को बुला लो। और हां मीडिया को बुलाने से पहले बच्चों को रवाना करा देना। 
परमार- जी, सर। मैं अभी उनके माता-पिता को फोन कर देता हूं कि वे जल्द से जल्द आए और अपने बच्चों को ले जाए। 
इतना कहकर परमार केबिन से बाहर चला जाता है और भौमिक अपनी कुर्सी पर बैठकर टेबल पर रखे पेपपरवेट को घुमाने लगता है। ऐसा उसकी आदत में था, जब भी वह कोई केस साॅल्व कर लेता था, तो कुछ देर अपने केबिन में अकेला बैठा रहता था और टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमाता था। आज भी वह ऐसा ही कर रहा था, इसका मतलब कुछ घंटों पहले तक जो केस उसे उलझा रहा था और उसकी नींद उड़ा चुका था, वह अब उसे साॅल्व कर चुका था। पर आखिर एक ही रात में उसके हाथ ऐसा क्या लग गया, जो केस साॅल्व हो गया। उसने एक बार फिर काॅफी मंगाई और पीने लगा। काॅफी पीते हुए उसके चेहरे में खास मुस्कार बिखरी हुई थी। अधिकारियों और मीडिया का जो प्रेशर उस पर था, वह अब हट चुका था। कुछ ही देर में परमार फिर से उसके केबिन में आता है। 
परमार- सर, मैंने सभी बच्चों के घर पर फोन कर दिया है वे बस आते ही होंगे। 
भौमिक- ओके परमार। 
परमार- और सर मीडिया को 2 बजे की सूचना दे दी है। 
भौमिक- गुड परमार। 
परमार- सर, अब तो बताइए कि आखिर कातिल कौन है? और आपकों उसके बारे में कैसे सुराग हाथ लगा
भौमिक- बताता हूं परमार, सब बताता हूं। दो बजे मीडिया के सामने सब बताउंगा, तब तुम भी तो वहीं रहोंगे। तब ही सारी कहानी सुन लेना। 
परमार- जी, सर। 
कुछ ही देर में मीडिया भौमिक के ऑफिस तक पहुंच गई थी। शहर में हुए हाईप्रोफाइल मर्डर केस के बारे में जानने के लिए उत्सुक था। हालांकि मीडिया को भी अंदाजा नहीं था कि पुलिस उन्हें क्या बताने वाली है? भौमिक के ऑफिस में पहुंचे मीडियाकर्मी आपस में यही बात करने में लगे थे कि अचानक क्यों बुला लिया है और पुलिस क्या बताना चाह रही है। इस बीच भौमिक परमार के साथ वहां पहंुच जाता है। साथ पुलिस कमिश्नर भी मीडिया के सामने आ जाते हैं। 
कमिश्नर- मीडिया के सभी साथियों का मैं स्वागत करता हूं। 
मीडिया पर्सन 1- सर, अचानक बुलाने की वजह ? क्या आपने मर्डर में कुछ खास कर दिखाया है। 
कमिश्नर- कुछ खास नहीं किया होता तो आपको यहां तक बुलाने की तकलीफ क्यों देते? आप बस हमें पांच मिनट दीजिए, आपके सभी सवालों का जवाब मिल जाएगा। 
इसके बाद कमिश्नर भौमिक की ओर इशारा करता है और भौमिक मीडिया से मुखातिब होता है। 
भौमिक- साथियों मैं जानता हूं आपके मन में कई सवाल उठ रहे हैं। पहले मैं आपको कुछ बता देना चाहता हूं, उसके बाद आपके जो भी सवाल होंगे हम उसका जवाब आपको देंगे। 
इसके बाद भौमिक अपनी बात कहना शुरू करता है। इस दौरान कमिश्नर, मीडिया के लोग और खासकर परमान बड़े गौर से उसकी बात सुनने को तैयार हो जाते हैं। भौमिक भी अपनी बात कहना शुरू करता है। 

भौमिक- जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आज से करीब 20 दिन पहले गोवा-मुंबई हाइवे पर एक हवेली में शहर के नामी डाॅक्टर अविनाश सक्सेना और उनके परिवार की किसी ने हत्या कर दी थी। मामले में शहर के कुछ बड़े बिजनेस मैन और कुछ मंत्रियों के बच्चों के नाम भी सामने आए थे, इस कारण यह केस हाईप्रोफाइल बन गया था। मेरे अधिकारियों ने इस केस की जिम्मेदारी मुझे दी थी। केस को जल्द सॉल्व करने का प्रेशर मुझ पर था और आप लोगों ने भी प्रेशर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 
मीडिया पर्सन 2- तो क्या आपने केस साॅल्व कर लिया है
भौमिक- जैसे कि मैंने कहा कि पहले मुझे मेरी बात कह लेने दीजिए, फिर हम आपके हर सवाल का जवाब देंगे। वैसे आपके सवाल का जवाब दिए देता हूं कि हां, मैंने केस साॅल्व कर लिया है। 
मीडिया पर्सन 3- पर कल दिन तक तो आपने कोई अपडेट नहीं दी थी। एक रात में अचानक कोई कातिल आपके हाथ कैसे लग गया
भौमिक- जी, कल दिन तक मैंने इस केस के संबंध में कोई अपडेट नहीं दी थी, क्योंकि उस समय मेरे पास भी कोई अपडेट नहीं थी। जो कुछ भी हुआ है वह शाम के बाद हुआ है। 
मीडिया पर्सन 4 - तो फिर बताइए कौन है कातिल? किसने डाॅक्टर और उसकी फैमिली को मारा और क्यों मारा
भौमिक- जी, वहीं बताने के लिए मैं यहां खड़ा हूं। 
भौमिक की बात सुनकर हाॅल में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। भौमिक ने फिर बोलना शुरू किया। 
भौमिक- डाॅ. सक्सेना और उनके परिवार की हत्या खुद डाॅ. अविनाश सक्सेना ने ही की है। 
भौमिक की यह बात सुनकर हर कोई आश्चर्य में पड़ गया था। खासकर कमिश्नर और परमार को मानों झटका लगा हो। वहीं मीडिया के लोग भी भौमिक की इस बात को सुनकर हैरान रह गए थे। 
भौमिक- मैं जानता हूं कि फिलहाल आप सभी को मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है, परंतु हमारे पास ऐसे सबूत है, जिससे यह साबित होता है कि पूरे परिवार की हत्या करने के बाद डाॅ. अविनाश ने भी आत्महत्या कर ली। उन्होंने परिवार की हत्या क्यों की यह राज उस परिवार की मौत के साथ ही दफन हो गया है। 
मीडिया पर्सन 1- कैसे सबूत है आपके पास
भौमिक- हमारे पास कुछ फोटोग्राफ है, जिसमें डाॅ. सक्सेना एक-एक कर अपने परिवार के सदस्यों की हत्या करते हुए साफ नजर आ रहे हैं। 
मीडिया पर्सन 3- ये फोटोग्राफ आपको कहां और कैसे मिले
भौमिक- कल रात को मैं हवेली में गया था, वहीं मुझे ये फोटोग्राफ मिले है। 
मीडिया पर्सन 2- पहले भी तो आप कई बार हवेली में गए हैं, तो पहले आपको ये फोटोग्राफ क्यों नहीं मिले
भौमिक- हम भी इंसान है, हमसे भी चूक हो जाती है। कल रात को एक बार फिर मैंने हवेली का मुआयना किया तो मुझे यह फोटोग्राफ मुझे मिल गए। 
मीडिया पर्सन 4- ये फोटोग्राफ किसने खीेंचे थे
भौमिक- कुछ देर तक चुप रहने के बाद - मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। 
मीडिया पर्सन 1- इसका मतलब है कि ये केस अब बंद हो चुका है
भौमिक- मेरे हिसाब से तो अब इस केस में कुछ बचा नहीं है। क्योंकि लाशों से तो नहीं पूछ सकता कि डाॅक्टर ने अपने पूरे परिवार की हत्या क्यों की थी
इसके बाद सभी मीडिया के लोग वहां से चले जाते हैं और उनके बाद कमिश्नर भी भौमिक से केस के संबंध में कुछ बात करके चले जाते हैं। इसके बाद भौमिक और परमार एक बार फिर भौमिक के केबिन में आज जाते हैं। भौमिक एक बार फिर अपनी आदत के अनुसार अपनी चेयर पर बैठकर टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमाने लगता है। परमार अभी खड़ा था। भौमिक उसे बैठने का इशारा करता है और परमार वहीं रखी दूसरी चेयर पर बैठ जाता है। भौमिक उसे देखकर मुस्कुराता है। 
भौमिक- मैं जानता हूं परमार अब भी तुम्हारे मन में कई सवाल उठ रहे हैं। और तुम चाहते हो कि मैं जल्दी से पूरी बात तुम्हें बता दूं। 
परमार- जी, सर। 
भौमिक- वैसे भी तुम इस केस से शुरू से जुड़े हो तो तुम्हें हर बात जानने का हक भी है। 
परमार- जी, सर। अब बताइए ना कि सिर्फ एक रात में ही आपने केस कैसे साॅल्व कर लिया
भौमिक- देखा जाए तो बहुत कुछ खास नहीं हुआ, पर सोचा जाए तो यह बहुत आश्चर्यजनक था। 
परमार- मतलब सर। 
भौमिक- मतलब ये परमार कि कल यहां से जाने के बाद भी मेरे दिमाग में इस केस को लेकर बातें चल रही थी, जो हम कई दिनों से सोच रहे हैं। ऐसे ही मैं कल भी सोच रहा था। मुझे रात को नींद नहीं आ रही थी, इस कारण गाड़ी उठाई और रात को करीब 2.30 बजे मैं हवेली पहुंच गया।

परमार- अकेले ही सर? मुझे काॅल कर देते तो मैं भी आपके साथ आ जाता। 
भौमिक- पहले मैंने सोचा था परमार कि तुम्हें काॅल करूं, पर रात ज्यादा हो गई थी, इसलिए मैंने काॅल नहीं किया और अकेले ही हवेली पहुंच गया।
परमार- फिर क्या हुआ सर
भौमिक- हवेली तो पहुंच ही गया था, तो हमेशा की तरह सुराग की खोज में लग गया, ये सोचकर कि शायद हर बार कि तरह हमारी नजर से कुछ चूक तो नहीं गया। मैंने हवेली के हर कमरे को बड़े गौर से देखा, पर मुझे कुछ नहीं मिला। इसके बाद मैं उस हाॅल में आया, जहां हमें सारी लाशें मिली थी। 
परमार- फिर सर
भौमिक- हाॅल को भी मैंने बड़े गौर से देखा पर मुझे कुछ नजर नहीं आया। मुझे उस वक्त बहुत गुस्सा आ रहा था, मैंने गुस्से में हाॅल की एक दीवार पर मुक्का मारा। 
परमार- ओह, सर ये क्या किया आपने
भौमिक- परमार वो एक मुक्का इतने काम का रहा कि केस चुटकी बजाते हुए साॅल्व हो गया। 
परमार- क्या मतलब सर? आपके मुक्के ने ऐसा क्या दिखा दिया आपको
भौमिक- मुझे क्या दिखा दिया वो तुम खुद भी देख लो। 
भौमिक अपने टेबल की दराज से एक कैमरा निकालकर टेबल पर रख देता है। 
परमार- ये तो कोई कैमरा लगता है सर
भौमिक- हां, परमार ये कैमरा ही है। और इसी कैमरे ने बस चुटकी बजाते हुए इस अनसुलझे से लग रह केस को साॅल्व कर दिया। 
परमार- अरे वाह सर। 
भौमिक- इसके बाद जब मैंने इसे देखा तो मुझे पूरा केस समझ आ गया। 
परमार- तो मामला क्या था सर? डाॅक्टर ने परिवार की हत्या क्यों की
भौमिक- वहीं बता रहा हूं परमार। और सबसे चौंकाने वाली बात भी इस केस की यही है। मैं मीडिया को भी कारण बता सकता था, पर उसके बाद लोगों का मेडिकल और फिर डाॅक्टरी पेशे से भरोसा उठ जाता, इसलिए मैंने कह दिया कि यह राज तो डाॅक्टर के साथ ही खत्म हो गया। 
परमार- ओके, सर। वैसे आपको क्या पता चला कि उसने क्यों मारा?
भौमिक- जैसा कि हम जानते हैं परमार कि डाॅक्टर सक्सेना मनो विज्ञान में भी रूचि रखते थे। लंदन में उन्होंने इसकी डिग्री भी ली है और वे कुछ प्रयोग भी कर रहे थे। 
परमार- जी, सर। 
भौमिक- मुझे लगता है परमार कि ये डाॅक्टर अपने प्रयोग को लेकर कुछ ज्यादा ही जुनूनी हो गया था।

परमार- मतलब सर
भौमिक- मतलब ये परमार कि ये डाॅक्टर अपने प्रयोग को सही करने के लिए कुछ भी कर सकता था और उसने वहीं किया भी। इस डाॅक्टर ने अपने मनोविज्ञान को सहीं साबित करने के लिए हवेली में पहुंचे आठों बच्चों को हिप्नोटाइज यानि कि सम्मोहित किया। इसके साथ ही उसने इनके सम्मोहन में हवेली की पूरी दास्तां याद ना रहे इसके लिए कुछ की वर्ड भी दिए, जिससे की जब भी कोई उन शब्दों को उनके सामने दोहराए या कहे तो ये जैसा रिएक्शन यहां कर रहे थे, वैसा ही करें। इसके साथ ही उन सब के दिमाग में यह भी बैठा दिया कि कत्ल उन्हीं लोगों ने किया है। 
परमार- ओह, ये तो बहुत खतरनाक प्रयोग था डाॅक्टर का। 
भौमिक- नहीं परमार। ये तो कुछ नहीं। डाॅक्टर ने इसके बाद जो किया वो इससे भी ज्यादा खतरनाक था। 
परमार- इससे ज्यादा क्या किया डाॅक्टर ने
भौमिक- इससे ज्यादा ये किया उसने कि पहले उसने अपने परविार के हर व्यक्ति को और फिर खुद को भी सम्मोहित किया। सम्मोहन भी ऐसा कि सम्मोहन के दौरान उन्हें दर्द महसूस न हो। शायद वह यही प्रयोग करना चाह रहा था। ताकि ऑपरेशन के समय किसी मरीज को बेहोश ना करना पड़े। 
परमार- ये कैसा प्रयोग है सर
भौमिक- जो भी है परमार। पर मुझे लगता है कि ये डाॅक्टर अपने प्रयोग के लिए पागल हो गया था। उसने सभी को सम्मोहित करने के बाद ये देखने के लिए कि उन्हें दर्द हो रहा है या नहीं सब पर चाकू से वार किए। उसने सभी पर चार से पांच बार वार किए। जिससे सभी की मौत हो गई। इसके बाद उसने खुद पर भी यही प्रयोग किया और खुद पर भी वार किए, ज्यादा खून बह जाने के कारण वह बेहोश हो गया और फिर उसकी भी मौत हो गई। चुंकि वो डाॅक्टर था, इस कारण उसने गल्ब्स पहले हुए थे, इस कारण हमें चाकू पर किसी की उंगलियों के निशान नहीं मिले। और कोई चीखा या चिल्लाया भी इसलिए नहीं कि वे सभी सम्मोहित थे। एक तरह से यूं कह सकते हैं कि डाॅक्टर का प्रयोग सफल हो गया था। 
परमार- ओह, ये डाॅक्टर तो सचमूच ही पागल था सर। 
भौमिक- हां परमार। 
परमार- पर सर ये कैमरा कैसे था
भौमिक- मैंने इसका भी पता लगाया है परमार। ये सब एक गलती द मिस्टेक के कारण हुआ है।परमार- मतलब सर। 
भौमिक- तुम्हें याद है कि शाह ने बताया कि वो हवेली को एक रिसोर्ट के रूप में तैयार कर रहा था
परमार- जी, सर। 
भौमिक- इस दौरान वही रिसोर्ट या यूं कहे कि हवेली की दीवारों पर लाइट और कुछ खास जगहों पर कैमरे लगवा रहा था। दोनों काम एक साथ चल रहे थे। इस दौरान लाइट वाला लाइट लगाकर चला गया था और कैमरे वाला अपना काम कर रहा था। उनमें से एक ने कैमरा ठीक से काम कर रहा है या नहीं यह देखने के लिए उसका कनेक्शन किया था। जो वह बाद में निकालना भूल गया। उसकी यहीं गलती हमारे केस के लिए सबसे बड़ा प्लस प्वांइट साबित हुई है। 
परमार- क्या किसी की एक गलती ने इस अद्भूत केस को साॅल्व कर दिया सर
भौमिक- हां, परमार अद्भूत केस एक अद्भूत तरीके से ही साॅल्व हुआ है। 
परमार- हां, सर आपने बिल्कुल सही कहा। 
इसके बाद दोनों एक बार फिर साथ ऑफिस से बाहर निकलते हैं और अपने घरों की ओर चल देते हैं। भौमिक को संतोष था कि उसके पास जो केस आया वो आखिर साॅल्व हो गया। वो मन ही मन उसे कैमरे वाले को एक गलती करने के लिए धन्यवाद दे रहा था। वहीं परमार यह सोच रहा था कि भौमिक के पास जो भी केस आता है वह कभी अधुरा नहीं रहता। 
गलती द मिस्टेक कहानी आपको कैसी लगी आप कमेंट बाॅक्स में जाकर जरूर बताइगा। आपके शब्द मेरे लिए अनमोल है और मेरी लेखनी को और भी आगे जाने के लिए प्रेरित करेंगे। 
आप सभी का धन्यवाद 
                                                        प्रशांत शर्मा