तो हर कहानी पूरी हो जाएगी
Friday, August 14, 2020
तो हर कहानी पूरी हो जाएगी
बहुत सुन चुका हूं दो दिलों के अधुरी कहानी,
कभी इसकी जुबानी तो कभी उसकी जुबानी।
सुना ये भी है इस जहान में दिल मिले ना मिले,
हर दिल में यहां किसी की याद हमेशा रहती है।।
सोचता हूं इस अधुरेपन की वजह क्या है,
मिलते हैं दो दिल जहां, वो जगह क्या है।
इश्क है अधुरा, प्रेम में भी आखर है ढाई,
देखा जो गौर से तो मोहब्बत भी अधुरी पाई।।
कहीं शब्द अधुरे, तो कहीं जज्बात अधुरे हैं,
कभी रातें है तन्हा, तो कभी दिन अधुरे हैं।
ये खालीपन अक्सर चुभता सा क्यों है,
लगता है फूलों के बिना गुलशन अधुरे हैं।।
कहीं मिलती नहीं मंजिल, तो कहीं रास्ते अधुरे हैं,
टूटे हुए दिलों के यहां हुए मशहूर कई किस्से हैं।
दिल में अरमान है बहुत और मन में कई उमंग हैं,
कलम तो लिख रही है, पर अब भी कई खत अधुरे हैं।।
क्यों बनते-बनते मिट जाती है एक सपनों की दुनियां,
इंसानों की बस्ती बहुत है, फिर भी यहां शहर अधुरे हैं,
टूटे है कई साथ यहां, कई हाथ भी यहां छुटे हैं,
जन्मों की कहानी है, फिर भी यहां कई रिश्ते अधुरे हैं।।
कभी आंखों की आंखों से बातें, कभी खत्म न होती रातें,
कभी महफिल दिल में, तो कभी यहां जश्न अधुरे हैं।
कभी पतझड़ तो कभी बहार, कभी नैंनों से बरसातें हैं,
गिरती भी है बूंदों की लड़ियां, फिर भी मौसम अधुरे हैं।।
ये खालीपन, ये सुनापन, कहीं अल्फाजों की बोली है,
कहीं श्मसान का सन्नाटा, कहीं उल्लासों की होली है।
कहीं सिमटती है दूरियां, कहीं पहलू की गहराई है,
कहीं बाहों की तड़प है, कहीं सीने के अरमान अधुरे हैं।।
प्यार तो पूरा न हुआ, पर दो दिल तो पूरे हैं,
कहानी सच्ची पर शायद शब्द ही अधुरे हैं।
है कोई कहानी, जिससे इनकी कमी पूरी हो जाएगी,
गर पूरे हुए ये शब्द, तो हर कहानी पूरी हो जाएगी।।
बहुत सुन चुका हूं दो दिलों के अधुरी कहानी,
कभी इसकी जुबानी तो कभी उसकी जुबानी।
सुना ये भी है इस जहान में दिल मिले ना मिले,
हर दिल में यहां किसी की याद हमेशा रहती है।।
सोचता हूं इस अधुरेपन की वजह क्या है,
मिलते हैं दो दिल जहां, वो जगह क्या है।
इश्क है अधुरा, प्रेम में भी आखर है ढाई,
देखा जो गौर से तो मोहब्बत भी अधुरी पाई।।
कहीं शब्द अधुरे, तो कहीं जज्बात अधुरे हैं,
कभी रातें है तन्हा, तो कभी दिन अधुरे हैं।
ये खालीपन अक्सर चुभता सा क्यों है,
लगता है फूलों के बिना गुलशन अधुरे हैं।।
कहीं मिलती नहीं मंजिल, तो कहीं रास्ते अधुरे हैं,
टूटे हुए दिलों के यहां हुए मशहूर कई किस्से हैं।
दिल में अरमान है बहुत और मन में कई उमंग हैं,
कलम तो लिख रही है, पर अब भी कई खत अधुरे हैं।।
क्यों बनते-बनते मिट जाती है एक सपनों की दुनियां,
इंसानों की बस्ती बहुत है, फिर भी यहां शहर अधुरे हैं,
टूटे है कई साथ यहां, कई हाथ भी यहां छुटे हैं,
जन्मों की कहानी है, फिर भी यहां कई रिश्ते अधुरे हैं।।
कभी आंखों की आंखों से बातें, कभी खत्म न होती रातें,
कभी महफिल दिल में, तो कभी यहां जश्न अधुरे हैं।
कभी पतझड़ तो कभी बहार, कभी नैंनों से बरसातें हैं,
गिरती भी है बूंदों की लड़ियां, फिर भी मौसम अधुरे हैं।।
ये खालीपन, ये सुनापन, कहीं अल्फाजों की बोली है,
कहीं श्मसान का सन्नाटा, कहीं उल्लासों की होली है।
कहीं सिमटती है दूरियां, कहीं पहलू की गहराई है,
कहीं बाहों की तड़प है, कहीं सीने के अरमान अधुरे हैं।।
प्यार तो पूरा न हुआ, पर दो दिल तो पूरे हैं,
कहानी सच्ची पर शायद शब्द ही अधुरे हैं।
है कोई कहानी, जिससे इनकी कमी पूरी हो जाएगी,
गर पूरे हुए ये शब्द, तो हर कहानी पूरी हो जाएगी।।
लोग क्या कहेंगे ?
Thursday, August 06, 2020लोग क्या कहेंगे ?
जीवन को जीते हुए हमारे आसपास कई सवाल आ खड़े होते हैं। इनमें से कुछ सवालों के जवाब हमें अपने धर्म-शास्त्रों से मिल जाते हैं और कुछ सवालों के जवाब हमें विज्ञान से मिल जाते हैं। इंसान के रूप में हमने सूर्य और पृथ्वी की दूरी का भी पता लगा लिया है। समुद्र की गहराई को नाप लिया है। पर फिर भी कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब हमें अब तक नहीं मिल पाए हैं और शायद निकट भविष्य में मिल भी ना पाए। यू ंतो मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज के कई दायरों में बंधा होता है। सामाजिक प्राणी होते हुए हमें एक सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है और सवाल है लोग क्या कहेंगे? यह एक ऐसी बात है कि इसके कुछ अपवाद भी समाज में हैं, परंतु वे लोग भी इस बात के विपरीत की धारणा को समाज में प्रतिपादित नहीं कर पाए हैं। मानसी भी ऐसी ही एक सामाजिक प्राणी है। घर-परिवार के साथ ही नौकरी भी करती है और घर, समाज और ऑफिस तीनों ही स्थानों पर सामंजस्य बनाकर चलती है। पढ़ी लिखी होने के साथ ही मानसी संस्कारी और अच्छी सुशील लड़की की छवि भी रखती है। अब उसके घर में उसकी शादी की बात प्रारंभ हो गई थी। जल्द ही माता-पिता ने अच्छा परिवार देखकर उसके हाथ पीले कर दिए और उसे उसके ससुराल रवाना कर दिया। शुरूआत में उसके ससुराल में सब कुछ सामान्य था। शादी के कुछ माह बाद तक उसने अपनी नौकरी भी जारी रखी, पर फिर उसके घर के लोगों की रजामंदी नहीं होने के कारण उसे अपनी जॉब छोड़नी पड़ी। जॉब छोड़ने के बाद मानसी अब सारा समय घर में ही बीतता है। घर में रहते हुए उसने नोटिस किया कि अब उसके घर वालों के व्यवहार उसके प्रति बदल रहा है। सास के तानों के साथ ही उसका पति सुहास भी अब उससे ठीक से बात नहीं करता है। कुछ ही दिन और बीते थे कि अब सुहास मानसी के साथ मारपीट भी करने लगा था। छोटी-छोटी बातों पर अब सुहास मानसी के साथ मारपीट करने लगा। अब वो रोज रात को शराब पीकर आता और मानसी के साथ झगड़ा करता और यदि मानसी कुछ बोलती तो उसे पीटने लगता था। तनाव और पीड़ा से दुखी होकर वह अपने माता-पिता से मिलने के लिए गई। वहां उसने उसके साथ हो रहे व्यवहार की पूरी बात अपने माता-पिता को बताई और सुहास को छोड़ने की बात कही। हालांकि यह उसके जीवन का बहुत बड़ा फैसला था, इसलिए उसने अपने माता-पिता की भी राय ली। माता-पिता ने उसकी परेशानी को तो समझा पर उसे सुहास को ना छोड़ने की भी सलाह दे डाली। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बेठी तू सुहास को छोड़ तो देगी, यहां आकर रह भी लेगी। फिर से जॉब भी शुरू कर देगी, पर पति से अलग रहेगी तो लोग क्या कहेंगे। किस किस को जवाब देते रहेंगे। इससे अच्छा है कि सुहास को बदलने का प्रयास करो, उसकी कोई परेशानी है तो उसे दूर करो। मानसी अपने माता-पिता की बात को मानकर बुझे मन से फिर से अपने ससुराल चली जाती है। उसके कई प्रयास किए कि उसके सुहास और उसके माता-पिता के व्यवहार में परिवर्तन आए पर वह असफल रही। वक्त के साथ उसके घर वालों के ताने और मारपीट का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा था। अब उसे किसी से बात करने की भी इजाजत नहीं थी। उसके हमेशा एक कमरे में बंद रखा जाता। घर में एक नौकरानी की तरह हमेशा उसे काम कराया जाता और काम में जरा भी देरी होने या गड़बड़ होने पर उसके साथ जानवरों से जैसा सलूक किया जाता था। इन सबसे मानसी अब हार चुकी थी। एक बार घर में जब कोई नहीं था, तब उसने फिर अपनी मां को फोन कर अपनी बात बताई और सुहास को छोड़ने के लिए कहा कि परंतु इस बार फिर मां ने लोग क्या कहेंगे बेटी कहकर उसे वही रहने का मजबूर कर दिया।
मानसी ने यह पूरी बात अपनी एक सहेली को बताई। उसकी सहेली शिखा का कहना था कि वह चाहे तो पुलिस की मदद ले सकती है। पुलिस न सिर्फ सुहास को बल्कि सास और ससुर को भी सबक सिखा देगी। शिखा की बात सुनने के बाद मानसी ने हिम्मत तो की थी, परंतु फिर उसे उसकी मां की बात याद आ गई कि लोग क्या कहेंगे। क्योंकि यह तो तय था कि यदि वह पुलिस में शिकायत करेगी तो वह उस घर में नहीं रह पाएगी। काफी सोच विचार कर एक बार उसने खुद से समझौता कर लिया। दिन ऐसे ही गुजरते रहे। एक दिन मानसी के सब्र का बांध टूट गया था। उसने एक दिन अपने घर में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पुलिस के साथ ही मानसी के माता-पिता को भी इसकी जानकारी मिल गई थी। पुलिस जहां अपनी कार्रवाई कर रही थी, वहीं उसके माता-पिता अपनी बेटी की हत्या का दोष उसके ससुराल वालों पर लगा रहे थे। पुलिस ने भी एक्शन लिया और उसके ससुरालजनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। पुलिस को एक लेटर भी मिला था, जो कि उसने अपनी मांके नाम लिखा था।
मां, आपके दिए संस्कारों के बल पर मैंने यहां मिलने वाले हर दुख और तकलीफ को सहने की रह संभव कोशिश की है। पर आखिर मैं भी इंसान हूं। दर्द मुझे भी होता है। इसलिए अब सहन नहीं कर पा रही हूं। इसलिए हमेशा के लिए इस दर्द से छुटकारा पा रही हूं। दर्द है तो सिर्फ इस बात का कि मैं अब भी जीना चाहती हूं, मैं फिर से पैरों पर खड़े होना चहाती हूं। अपनी जिंदगी को फिर से बनाना चाहती हूं। पर लोग क्या कहेंगे वाली आपकी बात मुझे ये सब नहीं करने दे रही है। अब मैं जा रही हूं अब लोग क्या कहेंगे यह तुम देख लेना मां। क्योंकि मैं तो रहूंगी नहीं यह सुनने के लिए कि लोग क्या कह रहे हैं। लोग क्या कहेंगे कि एक बात को लेकर आपने मुझे मेरी जिंदगी जीने से रोक दिया मां। गलती आपकी भी नहीं है मां, क्योंकि आप, मैं या हम जैसे कई लोग समाज की इस परिपाटी को कभी तोड़ ही नहीं पाए हैं। लोग क्या कहेंगे ये सोचकर ही हम कभी स्वच्छंद होकर अपने फैसले नहीं ले पाए हैं। लोग क्या कहेंगे क्यों क्योंकि लड़की शादी के बाद घर आ गई है, लोग क्या कहेंगे इसलिए सब कुछ होना के बाद भी हम लड़कियों की खुशियों की बली चढ़ा देते हैं। लोग क्या कहेंगे इसलिए कई बार प्रेम सफल नहीं हो पाता है। लोग आखिर ये लोग कौन है मां। वैसे आप अपनी जगह सही भी हो मां। क्योंकि जब भगवान श्रीराम को लोकलाज के कारण माता सीता का त्याग करना पड़ गया था तो मैं तो एक मामूली इंसान हूं। जब वो भगवान होकर भी इस लोग क्या कहेंगे कि बात का विरोध नहीं कर सके तो मैं या आप कैंसे कर सकते हैं। वैसे मां हो सकता है कि लोग अब भी कुछ कहेंगे। कुछ क्या बहुत कुछ कहेंगे, पर मां मेरी आपसे विनती है कि अब आप लोगों की इन बातों को अनसुना कर देना क्योकि लोग क्या कहेंगे के डर से आप अपनी बेटी को तो खो चुके हो, अब इस बात के डर से कुछ और न खो देना। मां, आज जब मैंने खुद को खत्म करने का तय कर लिया है तो मेरे मन से लोग क्या कहेंगे का डर भी जा चुका है। क्योंकि ये जो लोग हैं ना ये हर हाल में कुछ न कुछ कहेंगे ही। इनके डर से मैंने जीना तो छोड़ दिया पर अब इन लोगों के डर से मैं मरना नहीं छोड़ सकती। क्योंकि जिंदा रहूंगी तब भी ये लोग कुछ ना कुछ बोलेंगे ही और ना रहूंगी तब भी ये कुछ ना कुछ बोलेंगे ही। इसलिए फैसला मुझे करना है इसलिए मैंने फैसला कर लिया है।
मानसी का ये, खत न सिर्फ उसकी मां ने पढ़ा बल्कि उसके पिता और उसकी दोस्त शिखा ने भी पढ़ा था। शिखा अब मानसी की मां से सवाल कर रही थी कि आंटी कहां है वो लोग जो कुछ कहते हैं। आज यहां इस समय कुछ बोलने के लिए नहीं आएंगे। बोलेंगे पर यहां नहीं, तब बोलेंगे जब आप सुन न पाओ। लोग क्या कहेंगे के डर ने आपने अपनी बेटी को खो दिया। आंटी अब समय बदल रहा है, आप अपने आप को भी बदलो। काश आपने मानसी का साथ देकर इन लोगों को जवाब देने का फैसला किया होता तो आज मानसी हमारे साथ होती। लोग.... लोग तो अब भी कहेंगे आंटी, लोग तो अब भी कहेंगे.....। ये सवाल बिल्कुल ऐसा ही एक फंदा है आंटी जैसा फंदा मानसी ने अपने गले में डाला था। जानते हैं क्यों? क्योंकि वो लोग क्या कहेंगे के फंदे से आजाद नहीं हो सकी। वो आजाद होना चाहती थी, पर उसे आजाद नहीं होने दिया गया। वो लोगों के फंदे को नहीं निकाल सकी, इसलिए उसने एक ओर फंदा अपने गले में लगा लिया। आंटी लोग अब भी कहेंगे.... लोग अब भी कहेंगे....।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार Final पार्ट Immense hate and true love Final part
Wednesday, August 05, 2020बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार
Final पार्ट
अगले ही दिन सुहानी नागपुर पहुंच जाती है। काफी मुश्किल से वह स्वाती का पता लगाती है और उसके घर पहुंच जाती है। स्वाती आज भी घर पर अकेली ही थी। स्वाती हालांकि सुहानी को पहचानती नहीं है, इसलिए स्वाती उसे अपना परिचय देती है। हालांकि उसने अब तक स्वाती को यह नहीं बताया है कि वह विवान को जानती है और उसके कारण ही यहां तक आई है। स्वाती उसे घर में बुलाती है और फिर दोनों बात करने लगते हैं।
स्वाती- वैसे मैंने आपको पहचाना नहीं। क्या हम पहले कहीं मिले हैं?
सुहानी- नहीं, हम पहले कभी नहीं मिले। आप मुझे नहीं जानती, पर मैं आपको बहुत अच्छे से जानती हूं।
स्वाती- ओह... बताए यहां कैसे आना हुआ?
सुहानी- मैं सिर्फ एक सवाल का जवाब लेने के लिए आई हूं।
स्वाती- कौन सा सवाल?
सुहानी- आपने विवान के साथ ऐसा क्यों किया?
स्वाती- ओह तो तुमको विवान ने यहां भेजा है।
सुहानी- जी, नहीं उन्होंने यहां नहीं भेजा। मैं यहां खुद अपनी मर्जी से आई हूं। और मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए।
स्वाती- तो सुनो जवाब। मैं किसी अपाहिज की बीवी बनकर पूरी जिंदगी उसकी गुलामी नहीं कर सकती थी। मेरे भी कुछ सपने थे, मेरी भी जिंदगी है। हां, एक समय उसका भविष्य अच्छा था, पर एक्सीडेंट के बाद लगभग सब खत्म हो गया था। इस कारण मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा।
सुहानी- पर बाद में तो तुम्हें पता चल गया था कि वह एक्सीडेंट के बाद पूरी तरह से ठीक है। जब वो तुमसे मिलने के लिए आया था, तब तो तुम उसे सॉरी कह सकती थी। पर तुमने तो ऐसा कुछ नहीं किया, बल्कि उसे और चोट पहुंचा दी।
स्वाती- मुझे जो ठीक लगा वो मैंने किया।
सुहानी- तुमने जो विवान के साथ किया वहीं अगर तुम्हारे साथ होता तो? तुम्हारे अपाहिज होने की झूठी खबर सुनने के बाद वो भी किसी ओर से शादी कर लेता तो कया तब भी तुम यही कहती कि उसने जो किया वो अच्छा किया।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 2 यहां पढ़े
इतना कहने के बाद सुहानी वहां से चली जाती है। सुहानी के जाने के बाद स्वाती सुहानी की बातों को सोचती है और फिर विवान को फोन लगाती है। फोन पर वह विवान को अपने किए केलिए सॉरी बोलती है और उससे कहती भी है कि वो अपनी जिंदगी फिर से शुरू करें। आज उसे बुरा लग रहा है कि वह उसके साथ नहीं है।
अगले दिन सुहानी फिर उसी जगह पहुंच जाती है, जहां विवान अक्सर होता है। आज भी विवान वहां अकेला घूम रहा था और सुहानी उसे देख रही थी। फिर सुहानी विवान की ओर जाती है। दोनों एक दूसरे को देखते हैं।
विवान- आप फिर आ गई?
सुहानी- जी, हां।
विवान- मैंने कहा कि आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें। मुझे आपसे कोई बात नहीं करना है।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 3 यहां पढ़े
सुहानी- हां, गई थी। क्योंकि मुझसे आपकी यह हालत नहीं देखी जा रही थी। सोचा शायद उसके कहने से आप मान जाए। क्योंकि प्यार तो आपने भी किया था उससे।
विवान- हां, किया था, पर वो तो निभा नहीं सकी। बस यही कह भी रही थी। अब सलाह दे रही है कि मैं अपनी जिंदगी फिर से शुरू करूं।
सुहानी- जी, मैं भी आपसे यही कहना चाहती हूं, जो हुआ अब उससे आगे निकलिए। जो होना था वो हो गया।
विवान- जी, नहीं आप सभी के लिए यह सब कहना बहुत आसान है। जब आप मेरी स्थिति से गुजरेगी तब कहूंगा मैं ये बात। दर्द का अहसास उसे ही होता है, जिसे चोट लगी हो। वरना दर्द को दूर करने की सलाह देने के लिए तो हजारों लोग आ जाते हैं। कभी उस दर्द को महसूस करके देखा, तब पता चलेगा।
सुहानी- पर....
विवान- मैं आपसे आखिरी बार कह रहा हूं मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। वैसे भी आपका और मेरा कोई रिश्ता भी नहीं है।
सुहानी- मैं आपसे प्यार करती हूं।
विवान- प्लीज, मुझे इस शब्द से नफरत है। इसलिए ये बात अब कभी भी मेरे सामने मत कहना। और बात क्या कहना, आप भी मेरे सामने कभी मत आना।
सुहानी- आप मेरा यकीन कीजिए मैं आपसे सच में प्यार करती हूं। और हमेशा आपके साथ ही रहना चाहती हूं।
विवान- मुझे किसी के साथ नहीं रहना है। आप यहां से जा सकती है।
सुहानी- तो फिर ठीक है, मैं देखूंगी कि कब तक आपकी नफरत खत्म नहीं होती है। मैं अपने प्यार से आपको बदलकर रहूंगी।
विवान- ठीक है आप मुझे प्यार करते रहिए और मैं अपनी नफरत के साथ खुश हूं। देखते है कि आपका प्यार मुझे बदल पाता है, या मेरी नफरत हमेशा कायम रहती है।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 4 यहां पढ़े
स्वाती- वैसे मैंने आपको पहचाना नहीं। क्या हम पहले कहीं मिले हैं?
सुहानी- नहीं, हम पहले कभी नहीं मिले। आप मुझे नहीं जानती, पर मैं आपको बहुत अच्छे से जानती हूं।
स्वाती- ओह... बताए यहां कैसे आना हुआ?
सुहानी- मैं सिर्फ एक सवाल का जवाब लेने के लिए आई हूं।
स्वाती- कौन सा सवाल?
सुहानी- आपने विवान के साथ ऐसा क्यों किया?
स्वाती- ओह तो तुमको विवान ने यहां भेजा है।
सुहानी- जी, नहीं उन्होंने यहां नहीं भेजा। मैं यहां खुद अपनी मर्जी से आई हूं। और मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए।
स्वाती- तो सुनो जवाब। मैं किसी अपाहिज की बीवी बनकर पूरी जिंदगी उसकी गुलामी नहीं कर सकती थी। मेरे भी कुछ सपने थे, मेरी भी जिंदगी है। हां, एक समय उसका भविष्य अच्छा था, पर एक्सीडेंट के बाद लगभग सब खत्म हो गया था। इस कारण मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा।
सुहानी- पर बाद में तो तुम्हें पता चल गया था कि वह एक्सीडेंट के बाद पूरी तरह से ठीक है। जब वो तुमसे मिलने के लिए आया था, तब तो तुम उसे सॉरी कह सकती थी। पर तुमने तो ऐसा कुछ नहीं किया, बल्कि उसे और चोट पहुंचा दी।
स्वाती- मुझे जो ठीक लगा वो मैंने किया।
सुहानी- तुमने जो विवान के साथ किया वहीं अगर तुम्हारे साथ होता तो? तुम्हारे अपाहिज होने की झूठी खबर सुनने के बाद वो भी किसी ओर से शादी कर लेता तो कया तब भी तुम यही कहती कि उसने जो किया वो अच्छा किया।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 2 यहां पढ़े
स्वाती- वो सब मुझे नहीं पता। और जो हुआ नहीं उसके बारे में मैं नहीं सोचती।
सुहानी- यही तो स्वाती कि जो हुआ नहीं उसका हमें अहसास नहीं होता। पर सिर्फ एक बार सोचकर देखों कि तुम विवान से प्यार करती रहती और वह तुम्हें नजर अंदाज करता रहता। तब तुम्हारे दिल पर क्या गुजरती। और जब तुम मिले थे तब क्या तुमने ऐसी कोई शर्त रखी थी कि अच्छे वक्त में ही हम साथ होंगे। प्यार और दोस्ती बुरे वक्त में ही सबसे अधिक काम आते हैं स्वाती। प्यार का विश्वास ही किसी भी इंसान को लड़ने की शक्ति देता है। पर तुमने विवान का साथ छोड़ा और आज वह किस हाल में है, वह तुम सोच भी नहीं सकती। विवान की खुशी, उसके चेहरे पर रहने वाली मुस्कान, उसका विश्वास तुमने सब कुछ छीन लिया है। पता है वह रेज एक तालाब के पास बैठा रहता है और अपने बीते दिनों को और तुम्हारे किए को याद कर रोता रहता है। तुम उसे एक अच्छी जिंदगी तो नहीं दे सकी, उसका साथ नहीं दे सकी, पर तुमने उसे तोड़कर रख दिया है। आज उसे प्यार के नाम से नफरत है। उसके दोस्त नहीं है। वह एक दम तन्हा हो गया है। हो सके तो अपने किए को एक बार सोचना और हो सके तो उससे बात कर सॉरी कर देना। इतना कहने के बाद सुहानी वहां से चली जाती है। सुहानी के जाने के बाद स्वाती सुहानी की बातों को सोचती है और फिर विवान को फोन लगाती है। फोन पर वह विवान को अपने किए केलिए सॉरी बोलती है और उससे कहती भी है कि वो अपनी जिंदगी फिर से शुरू करें। आज उसे बुरा लग रहा है कि वह उसके साथ नहीं है।
अगले दिन सुहानी फिर उसी जगह पहुंच जाती है, जहां विवान अक्सर होता है। आज भी विवान वहां अकेला घूम रहा था और सुहानी उसे देख रही थी। फिर सुहानी विवान की ओर जाती है। दोनों एक दूसरे को देखते हैं।
विवान- आप फिर आ गई?
सुहानी- जी, हां।
विवान- मैंने कहा कि आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें। मुझे आपसे कोई बात नहीं करना है।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 3 यहां पढ़े
सुहानी- मैं तो सिर्फ यह पूछने आई हूं कि स्वाती ने क्या कहा?
विवान- एकदम चौंकते हुए तो आप स्वाती के पास गई थी? सुहानी- हां, गई थी। क्योंकि मुझसे आपकी यह हालत नहीं देखी जा रही थी। सोचा शायद उसके कहने से आप मान जाए। क्योंकि प्यार तो आपने भी किया था उससे।
विवान- हां, किया था, पर वो तो निभा नहीं सकी। बस यही कह भी रही थी। अब सलाह दे रही है कि मैं अपनी जिंदगी फिर से शुरू करूं।
सुहानी- जी, मैं भी आपसे यही कहना चाहती हूं, जो हुआ अब उससे आगे निकलिए। जो होना था वो हो गया।
विवान- जी, नहीं आप सभी के लिए यह सब कहना बहुत आसान है। जब आप मेरी स्थिति से गुजरेगी तब कहूंगा मैं ये बात। दर्द का अहसास उसे ही होता है, जिसे चोट लगी हो। वरना दर्द को दूर करने की सलाह देने के लिए तो हजारों लोग आ जाते हैं। कभी उस दर्द को महसूस करके देखा, तब पता चलेगा।
सुहानी- पर....
विवान- मैं आपसे आखिरी बार कह रहा हूं मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। वैसे भी आपका और मेरा कोई रिश्ता भी नहीं है।
सुहानी- मैं आपसे प्यार करती हूं।
विवान- प्लीज, मुझे इस शब्द से नफरत है। इसलिए ये बात अब कभी भी मेरे सामने मत कहना। और बात क्या कहना, आप भी मेरे सामने कभी मत आना।
सुहानी- आप मेरा यकीन कीजिए मैं आपसे सच में प्यार करती हूं। और हमेशा आपके साथ ही रहना चाहती हूं।
विवान- मुझे किसी के साथ नहीं रहना है। आप यहां से जा सकती है।
सुहानी- तो फिर ठीक है, मैं देखूंगी कि कब तक आपकी नफरत खत्म नहीं होती है। मैं अपने प्यार से आपको बदलकर रहूंगी।
विवान- ठीक है आप मुझे प्यार करते रहिए और मैं अपनी नफरत के साथ खुश हूं। देखते है कि आपका प्यार मुझे बदल पाता है, या मेरी नफरत हमेशा कायम रहती है।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 4 यहां पढ़े
यह इन दोनों की आखिरी मुलाकात थी। हालांकि कॉलेज में हरते हुए दोनों कई बार एक-दूसरे के आमने-सामने आए थे, पर दोनों ने ही किसी से बात नहीं की थी। तालाब के पास की उनकी मुलाकात को आज तीन साल हो गए हैं। सुहानी अब भी विवान से प्यार करती है और वह विवान को बदलने के लिए उसे प्यार का अहसास कराना चाहती है। पिछले कुछ समय से वह रोज एक फूल विवान के घर के बाहर रखकर आती है। विवान भी उस फूल को देखता है और उसके पास से गुजर जाता है। वह यह भी जानता है कि यह फूल सुहानी ने ही रखा है, पर वह कभी उस फूल को उठाता नहीं है। सुहानी को इंतजार है कि विवान वह फूल उठाए और विवान सोचता है कि यह फूल आना बंद हो। विवान अब भी प्यार से उतनी ही नफरत करता है, जितनी कि तीन साल पहले करता था, वहीं सुहानी अब भी विवान से प्यार करती है और उसके आने का इंतजार कर रही है।
भूख
Tuesday, August 04, 2020भूख
कहने को तो अभी शाम ढली ही थी और रात शुरू हुई थी। शहर की पॉश कॉलोनी में एक बड़े से बंगले के सामने शहर के कई रास्तों से होते हुए बड़ी-बड़ी गाड़ियां आकर रूक रही थी। सूट-बूट में सले धजे लोग वहां अकड़कर उतर रहे थे और फिर उस बंगले में जा रहे थे। बंगला भी पूरी तरह से रोशनी से नहाया हुआ था। 10 दरबान वहां आने वाले लोगों के स्वागत के लिए झुक-झुककर सलाम कर रहे थे। आने वाले लोग उन्हें बिना देखे या बिना उनके सलाम का जवाब दिए आगे बढ़ रहे थे। उस बंगले का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा हो जहां रोशनी ना हो। कुछ ही समय में तो हाल यह हो गया था कि अब बाहर गाड़ियों को खड़ी करने के लिए लोगों को इधर-उधर देखना पड़ रहा था। कुछ ही वक्त और बीता था कि बंगले के अंदर से संगीत की धुन भी सुनाई पड़ने लगी थी। वहीं लोगों का शोर भी अब बंगले के बाहर तक आने लगा था। हवाओं में खाने की सुंगध के साथ शराब की महक आने लगी थी। यह पार्टी थी शहर के सबसे बड़े उद्योगपति को एक अवार्ड मिलने की खुशी में थी। जिसमें शहर का हर बड़ा और छोटा उद्योगपति आमंत्रित किया गया था। शराब, खाना, बेहुदे संगीत पर थिरकते लोग और अमीरी का चेहरे पर रौब। बस ऐसे ही लोग वहां नजर आ रहे थे। इन सभी में एक चीज कॉमन थी वह थी भूख। भूख खुद को अन्य लोगों से बेहतर और अन्य लोगों से ज्यादा अमीर बताने और खुद को और से बेहतर बनाने की भूख। ये भूख जो इन लोगों की कभी खत्म नहीं होने वाली है। यह भूख इनकी रोज बढ़ती है और लगातार बढ़ती जा रही है। दिखावे में कई लोग कर्ज तले दबे हैं, पर इनकी यह भूख कभी खत्म न होने वाली भूख है, जैसे कि पेट की भूख। यह भूख भी कभी खत्म नहीं होती है।
बंगले के अंदर के हाल के अलावा बंगले के बाहर एक फटे, पुराने कपड़े पहना एक 8 साल का बच्चा अपनी मां के साथ खड़ा था। वह अपनी मां को देख रहा था और कह रहा था कि मां उसे भूख लगी है। उसकी मां इस बंगले में सफाई करने के लिए आती है। आज बंगले में पार्टी होने के कारण उसे उम्मीद है कि आज उसे और उसके बेटे को भर पेट खाना मिल जाएगा। 8 से 10 बज गए थे, 10 से 12 बज गए थे। बच्चा अब भी मां से खाने की जिद कर रहा था और मां उसे सांत्वना देते हुए कह रही थी, बस बेटा पार्टी खत्म होने वाली है और फिर हमें भी खाना मिल जाएगा। हालांकि उसे ये भी पता है कि उसने और उसके बच्चे ने तीन दिन से कुछ भी खाया-पिया नहीं है, इस कारण उसका बच्चा खाने की इतनी जिद कर रहा है। गलती उसकी भी है कि उसने अपने बेटे से कह दिया था कि आज बंगले पर साहब के यहां पार्टी है तो हमें वहां से खाना मिल जाएगा। बच्चा खाने के आस में मां के साथ बंगले तक आ गया था। बच्चे की हालत देखकर मां ने दो से तीन बार बंगले में जाने का प्रयास भी किया, परंतु बंगले पर खड़े दरबान ने उसकी हालत देखकर उसे भगा दिया था। उसने दरबान ने कई बार कहा कि वह इस बंगले में काम करती है, पर दरबान ने उसे अंदर नहीं जाने दिया। फिर उसने दरबान से कहा कि वो ही उसे कुछ खाने के लिए जाकर दे दे। उसका बच्चा तीन दिन से भूखा है, पर दरबान वहां से हिला तक नहीं। 12 से अब 2 बज गए थे, परंतु बंगले के अंदर से बेहुदा संगीत और शराब की महक और खाने की सुंगध अब भी जारी थी। बंगले के बाहर बच्चा जमीन पर लेट गया था। मां भी कभी बच्चे को तो कभी बंगले की ओर देख रही थी कि अब ये लोग जाए और वह अंदर जाकर बच्चे के लिए खाना लेकर आए। सोते हुए भी उस बच्चे के गालों पर आंसूओं से बने निषान साफ नजर आ रहे थे। पेट पर रखा उसका हाथ शायद बता रहा था कि उसकी भूख कितनी बड़ी होगी वह मासूम भी अपने हाथ से अपने पेट को एक सांत्वना दे रहा था कि बस कुछ देर में हमें खाना मिल जाएगा। उसके चेहरे पर एक इंतजार की झलक अब भी साफ दिखाई दे रही थी। वक्त बीता और सुबह करीब 4 बजे लोगों का उस बंगले से बाहर आना शुरू हुआ। लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ लोग अपनी कार की ओर जा रहे थे और वो मां आते-जाते लोगों को बस नमस्ते कर रही थी। बंगले से निकले एक सज्जन शायद शराब के नशे में कुछ ज्यादा ही चूर थे और अपनी कार से वो उस औरत को टक्कर मारते हुए वहां से निकल गए थे। कार की उस टक्कर ने उस औरत को बहुत चोट तो नहीं पहुंचाई थी, पर उसे इतनी टक्कर जरूर मारी थी कि वह अपने बच्चे के पास ही गिरी थी। उसने बच्चे को हिलाया कि बेटा उठ पार्टी खत्म हो गई है, अब हम अंदर चलते हैं, तुझे अब खाना खिलाती हूं। पर शायद बच्चा मां के ये शब्द सुन ही नहीं पा रहा था। क्योंकि भूख ने उसे मौत का ग्रास बना दिया था। एक निवाले के इंतजार में करीब 8 घंटे तक इंतजार करने के बाद उस बच्चे का पेट किसी निवाले के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था। उस औरत को समझ आ गया था कि भूख ने उसके बच्चे को लील लिया है।
उस मां की एक जोर की चित्कार के साथ बंगले के आसपास का माहौल भी रो पड़ा था। मां की वो करूण चीख ने बंगले से बाहर आने वाले लोगों का ध्यान खींचा था। लोगों ने उसके चारों और घेरा बना लिया था, दरबार ने बताया कि शायद उसका बच्चा भूखा था, वह अंदर जाकर बच्चे के लिए खाना लाना चाहती थी पर उसने उसे रोका था कि क्योंकि साहब ने ऐसा करने के लिए कहा था। दरबान की बात सुनने के बाद शराब और अपनी दौलत और रूतबे के नशे में चूर लोगों के मुंह से बात निकलने लगी थी, ओह, बेचारी का बच्चा नहीं रहा। अब सिलसिला चल पड़ा था कि सरकार कोई काम नहीं करती है, लोग भूख से मर रहे है और नेता आराम से अपने बंगलों में बैठे हैं। वहीं कुछ लोग कह रहे थ कि ऐसे लोगों के लिए लोगों को मदद के लिए आगे आना चाहिए। शहर में इतनी सामाजिक संस्थाएं वो क्या करती है। वो ऐसे लोगों के लिए कुछ क्यों नहीं करती है। वहीं कुछ लोगों ने दरबान को भी बुरा-भला कहना शुरू कर दिया था कि तुम उसे कुछ लाकर दे देते तो कम से कम बच्चा कुछ खा तो लेता। लोगों की ऐसी बातें उस मां के कानों में पड़ रही थी, उसकी आंखों से आंसू निकल कर उस बच्चे के चेहरे पर गिर रहे थे। लोग वहां खड़े होकर अब भी बस बच्चे की मौत पर अफसोस व्यक्त कर रहे थे। कुछ ही देर में लोग वहां से अपनी कार में सवार हुए और वहां निकल गए थे। क्योंकि अब भी उनमें उनकी भूख बाकि थी, खुद को औरों से बेहतर बताने, खुद को औरों से अमीर बताने की। फिर कल एक सुबह होगी और वे सभी लोग फिर उस भूख को मिटाने में लग जाएंगे। उन्हें ना कभी याद आई है ना शायद कभी याद आएगी उस गरीब बच्चे की भूख और उस भूख का वो अहसास जो उस मां को है जिसने भूख के कारण अपने दिल का टूकड़ा उन लोगों के बीच खो दिया था, जिनके लिए उस बच्चे की भूख मिटाना शायद बहुत मुश्किल नहीं था। कम से कम उतना मुश्किल तो नहीं जितना की उनकी खुद की भूख को मिटाना है। पर शायद ये दोनों ही भूख कभी खत्म नहीं होने वाली है। जब सब लोग जा चुके थे, तो दरबार ने उस औरत को एक थाली में खाना लकर दिया, मां ने उस थाली को देखा और फिर अपने बच्चे के सीने पर गिर पड़ी थी। शायद अब तक तो वह भूख से लड़ रही थी, पर अब उससे भूख से अपने कलेजे के टूकड़े की मौत सहन नहीं हो सकी थी।
इंतजार
Monday, August 03, 2020इंतजार
अंकल... अंकल... अंकल रूको ना... एक छह साल की छोटी सी शुभिता पैरों में बिना चप्पल के सड़क पर दौड़ती जा रही थी। उसके घर के सामने से आज बहुत दिन बाद एक पोस्टमैन गुजरा था। उसे देखते ही वो दौड़कर अपने कमरे में गई थी और अपना स्कूल बैग उठाकर उसमें से एक कागल निकालकर फिर दौड़ते हुए बाहर आई थी। उसने इधर-उधर देखा तो पोस्टमैन कहीं नजर नहीं आया था। वह कुछ दूर घर से बाहर निकल आई थी। तभी उसे वह साइकिल नजर आई, जिसके साथ वह पोस्टमैन जा रहा था। उसने फिर से उस ओर दौड़ लगा दी थी। वह पोस्टमैन तक पहुंचती उसके पहले ही वह पोस्टमैन फिर अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ गया था। तेज धूप में शुभिता नंगे पैर ही पोस्टमैन के पीछे दौड़ते हुए उसे आवाज लगाकर रोकने का असफल सा प्रयास कर रही थी। वह अब अपने घर से ओर भी ज्यादा दूर आ गई थी। एक बार उसे पीछे की ओर देखा तो उसे अपना घर नजर नहीं आ रहा था। उसने फिर उस ओर देखा जिस ओर वह पोस्टमैन अंकल गए थे। उसकी आंखों में एक बार फिर से चमक आ गई थी। उसे एक बार फिर से पोस्टमैन अंकल की साइकिल नजर आई थी। इस बार वह पूरी ताकत से दौड़ते हुए साइकिल तक पहुंच गई थी। वह साइकिल के पास खड़ी होकर हाफ रही थी। तभी पोस्टमैन भी वहां आ पहुंचा। वह शुभिता को पहचानता था तो उसे देखते ही उसने कहा कि अरे... शुभिता बिटिया तुम यहां? यहां क्या कर रही हो वो भी इतनी धूप में। फिर उसकी नजर उसके पैरों की ओर गई तो शुभिता नंगे पैर ही थी। उसे इस हाल में देखकर पोस्टमैन को एक दम उस पर लाड़ आया और उसने अपना बैग साइकिल पर टांगा और उसे गोद में उठा लिया। उसे दुलार करते हुए पूछा अरे शुभिता बिटिया, तुम यहां क्या कर रही हो?
मैं आपके पास ही आई हूं अंकल। अचरज के साथ पोस्टमैन ने सवाल किया मेरे पास? हमारी बिटिया को आज हमसे क्या काम आ पड़ा? दादी कह रही थी आप सभी लोगों को खत पहुंचाते हो? बहुत ही मासूमियत से शुभिता ने पोस्टमैन से सवाल किया था। हां, बेटा, यही तो हमारा काम है। पर हमारी बिटिया रानी किसको खत पहुंचाना चाहती है। एक दम से उदास होते हुए शुभिता ने एक बार फिर उसी मासूमियत से जवाब दिया मम्मी को। इतना कहने के साथ ही उसके हाथ में जो कागज था वह उसने पोस्टमैन की ओर बढ़ा दिया। फिर कहा प्लीज अंकल मेरा ये खत मेरी मम्मी को दे दो। उनसे कहना कि अब शुभिता अच्छी बेटी बन गई है, इसलिए वो भी वापस आ जाए। दादी ने कहा था कि मैं अगर अच्छी बेटी बन जाउंगी तो मेरी मम्मी वापस आ जाएगी। पोस्टमैन शुभिता को चेहरा देख रहा था और उसकी मासूमियत भरी बातों का कोई जवाब नहीं दे पा रहा था। आज से करीब एक साल पहले शुभिता की मम्मी पल्लवी की मौत हो गई थी। शुभिता अब अपने दादा-दादी और पापा के साथ रहती है। वह अपनी मम्मी को हमेशा याद करती है। उसकी मां की जब मौत हुई तब वह पांच साल की थी और पिछले एक साल से वह अपनी मम्मी का रोज इंतजार कर रही है। पोस्टमैन उससे वो लेटर ले लेता है और उसे अपनी जेब में रख लेता है। उसे फिर साइकिल पर बैठता है और फिर उसे घर छोड़ने के लिए चल देता है। उसके घर के बाहर उसकी दादी खड़ी थी, उनके चेहरे पर चिंता साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने जैसे ही शुभिता को पोस्टमैन के साथ देखा तो वह दौड़कर आई और शुभिता को गोद में उठाकर दुलार करने लगी। फिर कहने लगी ऐसे कहां चली गई थी रे बिटिया। पोस्टमैन ने कहा माजी यह हमारे पास ही आई थी। आप चिंता ना करे, बिटिया बिल्कुल ठीक है। दादी भी पोस्टमैन का शुक्रिया अदा कर शुभिता को अंदर लेकर चली जाती है। पोस्टमैन भी अपनी साइकिल उठाकर फिर से अपने काम के लिए निकल जाता है।
शाम को पोस्टमैन अपना सारा काम खत्म कर अपने घर पहुंचता है। अपनी पत्नी से पानी पिलाने के लिए कहता है और फिर पानी पीकर हाथ-पैर धोने के लिए चला जाता है। इस बीच उसकी पत्नी उसके लिए चाय भी बना देती है। चाय का कप उसके हाथ में पकड़ा कर वह कहती है बाजार से सामान खरीदने के लिए जा रही है। इतना कहकर वह घर के बाहर चली जाती है। फिर पोस्टमैन उठता है और शुभिता का वह लेटर निकालकर फिर से कुर्सी पर बैठ जाता है। वह उस लेटर को पढ़ना शुरू करता है।
मेरी प्यारी मम्मी,
आप कहां हो, मुझे आपकी बहुत याद आती है। आप अब जल्दी से घर आ जाओ ना। दादी कहती है कि आप भगवान के पास गई हो। अब तो बहुत दिन हो गए हैं, इसलिए अब आप भगवान से कहो कि आपको शुभिता के पास जाना है और जल्दी से घर आ जाओ। मम्मी मुझे आपके हाथ से खाना खाना है। दादी कहती है कि आप तब तक नहीं आओगी जब तक मैं खुद अपने हाथ से खाना नहीं खाउंगी। आजकल मैं अपने हाथ से खाना खाती हूं। इसलिए अब आप आ जाओ। मम्मी अब मैं अपना होमवर्क भी कर लेती हूं। अब मैं आपको होमवर्क के लिए भी परेशान नहीं करूंगी। अब तो आप आ जाओगी ना मम्मी?
दादी कह रही थी कि भगवान बच्चों की बात जरूर सुनते हैं आप मेरी तरफ से भगवान से कहो ना कि मैं आपको बहुत याद करती हूं, फिर वो आपको मेरे पास आने देंगे। मम्मी मेरे स्कूल में मेरी एक फ्रेंड है उसकी मम्मी भी भगवान के पास ही है। उनसे कहना कि मेरी फ्रेंड की मम्मी को भी भेज दे। मुझे पता है कि वो भी अपनी मम्मी को बहुत मिस करती है, जैसे मैं करती हूं। मम्मी पापा भी आपको याद करते हैं। पूरा दिन पापा ऑफिस में रहते है और रात को देर से आते हैं। आप थे तो पापा शाम को जल्दी आ जाते थे, और फिर हम लोग घूमने के लिए जाते थे। अब तो पापा मुझे कहीं घूमाने भी नहीं ले जाते हैं। मैं दादी से कहती हूं तो वह कहती है कि वह मुझे गोद में उठाकर नहीं चल सकती है क्योंकि उनके घुटने में दर्द होता है। मम्मी मैं बहुत दिन से कहीं घूमने भी नहीं गई हूं, आप आ जाओ तो हम घूमने चलेंगे। मैं प्रॉमिस करती हूं कि जब हम घूमने जाएंगे तो मैं आइसक्रिम भी नहीं मांगूंगी। पर आप आ जाओ ना मम्मी। पता है मम्मी अब मुझे स्कूल बस तक लेने के लिए भी कोई नहीं आता है, पहले तो आप मुझे हमेशा लेने आती थी। अब मैं अपनी गली से घर तक अकेली ही आती हूं। दादी मेरे टिफिन में रोज एक जैसा ही ब्रेकफास्ट रख देती है, आप तो रोज अलग-अलग ब्रेकफास्ट रखते थे। मैं दादी से कहती हूं तो वह कहती है कि उन्हें अलग-अलग नाश्ता बनाना नहीं आता है। रात को सोते समय मुझे अब डर भी नहीं लगता है मम्मी। क्योंकि दादी मेरे पास नहीं सोती है और पापा तो बहुत देर से आते हैं तो मुझे तो पता ही नहीं होता है। दादी आपकी तरह मुझे कहानी भी नहीं सुनाती है। मम्मी मैं अब अच्छी बेटी बन गई हूं इसलिए अब आप जल्दी से आ जाओ मैं आपको अब कभी परेशान करूंगी। मैंने दादी से आपका पता भी पूछा था, पर दादी ने नहीं बताया। इसलिए मैं यह लेटर पोस्टमैन अंकल को दे दूंगी। दादी बता रही थी कि वो सभी का पता जानते हैं। इसलिए वो मेरा ये लेटर मैं उनको दे दूंगी। और वो मेरा ये लेटर आपको भी पहुंचा देंगे। मम्मी लेटर पढ़कर जल्दी से आ जाना, मैं आपका इंतजार करूंगी।
आपकी शुभिता
लेटर पढ़ते हुए पोस्टमैन की आंखों में आंसू आ गए थे। वह सोच नहीं पा रहा था कि वह इस लेटर का क्या करें। लेटर में शुभिता के लिखे हर शब्द को उसके कोमल मन की भावना को वह इस समय महसूस कर पा रहा था। कैसे एक छोटी सी बच्ची अपनी मां का इंतजार कर रही है। बड़े उसे जो भी कह रहे हैं, वह कर रही है, सिर्फ यह सोचकर कि एक दिन उसकी मम्मी आ जाएगी।
दूसरी ओर शाम के गहरा जाने के बाद आसमान में तारे नजर आने लगे थे। शुभिता अपने घर की खिड़की में बैठकर आसमान की ओर ही देख रही थी और मन ही मन कह रही थी मम्मी आ जाओ ना, मुझे आपकी बहुत याद आती है। उसकी आंखों में कहीं आंसूओ की एक झलक थी, वहीं उसकी निगाहे कभी आसमान पर तो कभी घर के दरवाजे की ओर जा रही थी, इस इंतजार में उसकी मम्मी आसमान से नीचे आएगी और फिर घर का दरवाजा खोलकर उसके पास आ जाएगी। पोस्टमैन हाथ में लेटर लिए उस लेटर के जवाब का इंतजार कर रहा था। वह सोच रहा था कि इसका क्या और कैसे जवाब दे। एक छोटी सी बेटी की अपनी मां से मिलने की आस और उसके इंतजार का क्या जवाब हो सकता है। जबकि वह जानता है कि शुभिता की मां अब कभी नहीं आएगी, पर शायद ये उस लेटर का ही असर था कि वह खुद भी एक छह साल की शुभिता बन गया था और मन ही मन दुआ कर रहा था कि काश इस लेटर का हर शब्द असर कर जाए और शुभिता की मां लौट आए। पर क्या शुभिता का ये इंतजार कभी खत्म होगा। क्योंकि शुभिता की निगाहें अब भी आसमान की ओर थी और होंठों पर शब्द थे कि मम्मी तुम जल्दी से आ जाओ, मुझे आपकी बहुत याद आती है।
शाम को पोस्टमैन अपना सारा काम खत्म कर अपने घर पहुंचता है। अपनी पत्नी से पानी पिलाने के लिए कहता है और फिर पानी पीकर हाथ-पैर धोने के लिए चला जाता है। इस बीच उसकी पत्नी उसके लिए चाय भी बना देती है। चाय का कप उसके हाथ में पकड़ा कर वह कहती है बाजार से सामान खरीदने के लिए जा रही है। इतना कहकर वह घर के बाहर चली जाती है। फिर पोस्टमैन उठता है और शुभिता का वह लेटर निकालकर फिर से कुर्सी पर बैठ जाता है। वह उस लेटर को पढ़ना शुरू करता है।
मेरी प्यारी मम्मी,
आप कहां हो, मुझे आपकी बहुत याद आती है। आप अब जल्दी से घर आ जाओ ना। दादी कहती है कि आप भगवान के पास गई हो। अब तो बहुत दिन हो गए हैं, इसलिए अब आप भगवान से कहो कि आपको शुभिता के पास जाना है और जल्दी से घर आ जाओ। मम्मी मुझे आपके हाथ से खाना खाना है। दादी कहती है कि आप तब तक नहीं आओगी जब तक मैं खुद अपने हाथ से खाना नहीं खाउंगी। आजकल मैं अपने हाथ से खाना खाती हूं। इसलिए अब आप आ जाओ। मम्मी अब मैं अपना होमवर्क भी कर लेती हूं। अब मैं आपको होमवर्क के लिए भी परेशान नहीं करूंगी। अब तो आप आ जाओगी ना मम्मी?
दादी कह रही थी कि भगवान बच्चों की बात जरूर सुनते हैं आप मेरी तरफ से भगवान से कहो ना कि मैं आपको बहुत याद करती हूं, फिर वो आपको मेरे पास आने देंगे। मम्मी मेरे स्कूल में मेरी एक फ्रेंड है उसकी मम्मी भी भगवान के पास ही है। उनसे कहना कि मेरी फ्रेंड की मम्मी को भी भेज दे। मुझे पता है कि वो भी अपनी मम्मी को बहुत मिस करती है, जैसे मैं करती हूं। मम्मी पापा भी आपको याद करते हैं। पूरा दिन पापा ऑफिस में रहते है और रात को देर से आते हैं। आप थे तो पापा शाम को जल्दी आ जाते थे, और फिर हम लोग घूमने के लिए जाते थे। अब तो पापा मुझे कहीं घूमाने भी नहीं ले जाते हैं। मैं दादी से कहती हूं तो वह कहती है कि वह मुझे गोद में उठाकर नहीं चल सकती है क्योंकि उनके घुटने में दर्द होता है। मम्मी मैं बहुत दिन से कहीं घूमने भी नहीं गई हूं, आप आ जाओ तो हम घूमने चलेंगे। मैं प्रॉमिस करती हूं कि जब हम घूमने जाएंगे तो मैं आइसक्रिम भी नहीं मांगूंगी। पर आप आ जाओ ना मम्मी। पता है मम्मी अब मुझे स्कूल बस तक लेने के लिए भी कोई नहीं आता है, पहले तो आप मुझे हमेशा लेने आती थी। अब मैं अपनी गली से घर तक अकेली ही आती हूं। दादी मेरे टिफिन में रोज एक जैसा ही ब्रेकफास्ट रख देती है, आप तो रोज अलग-अलग ब्रेकफास्ट रखते थे। मैं दादी से कहती हूं तो वह कहती है कि उन्हें अलग-अलग नाश्ता बनाना नहीं आता है। रात को सोते समय मुझे अब डर भी नहीं लगता है मम्मी। क्योंकि दादी मेरे पास नहीं सोती है और पापा तो बहुत देर से आते हैं तो मुझे तो पता ही नहीं होता है। दादी आपकी तरह मुझे कहानी भी नहीं सुनाती है। मम्मी मैं अब अच्छी बेटी बन गई हूं इसलिए अब आप जल्दी से आ जाओ मैं आपको अब कभी परेशान करूंगी। मैंने दादी से आपका पता भी पूछा था, पर दादी ने नहीं बताया। इसलिए मैं यह लेटर पोस्टमैन अंकल को दे दूंगी। दादी बता रही थी कि वो सभी का पता जानते हैं। इसलिए वो मेरा ये लेटर मैं उनको दे दूंगी। और वो मेरा ये लेटर आपको भी पहुंचा देंगे। मम्मी लेटर पढ़कर जल्दी से आ जाना, मैं आपका इंतजार करूंगी।
आपकी शुभिता
लेटर पढ़ते हुए पोस्टमैन की आंखों में आंसू आ गए थे। वह सोच नहीं पा रहा था कि वह इस लेटर का क्या करें। लेटर में शुभिता के लिखे हर शब्द को उसके कोमल मन की भावना को वह इस समय महसूस कर पा रहा था। कैसे एक छोटी सी बच्ची अपनी मां का इंतजार कर रही है। बड़े उसे जो भी कह रहे हैं, वह कर रही है, सिर्फ यह सोचकर कि एक दिन उसकी मम्मी आ जाएगी।
दूसरी ओर शाम के गहरा जाने के बाद आसमान में तारे नजर आने लगे थे। शुभिता अपने घर की खिड़की में बैठकर आसमान की ओर ही देख रही थी और मन ही मन कह रही थी मम्मी आ जाओ ना, मुझे आपकी बहुत याद आती है। उसकी आंखों में कहीं आंसूओ की एक झलक थी, वहीं उसकी निगाहे कभी आसमान पर तो कभी घर के दरवाजे की ओर जा रही थी, इस इंतजार में उसकी मम्मी आसमान से नीचे आएगी और फिर घर का दरवाजा खोलकर उसके पास आ जाएगी। पोस्टमैन हाथ में लेटर लिए उस लेटर के जवाब का इंतजार कर रहा था। वह सोच रहा था कि इसका क्या और कैसे जवाब दे। एक छोटी सी बेटी की अपनी मां से मिलने की आस और उसके इंतजार का क्या जवाब हो सकता है। जबकि वह जानता है कि शुभिता की मां अब कभी नहीं आएगी, पर शायद ये उस लेटर का ही असर था कि वह खुद भी एक छह साल की शुभिता बन गया था और मन ही मन दुआ कर रहा था कि काश इस लेटर का हर शब्द असर कर जाए और शुभिता की मां लौट आए। पर क्या शुभिता का ये इंतजार कभी खत्म होगा। क्योंकि शुभिता की निगाहें अब भी आसमान की ओर थी और होंठों पर शब्द थे कि मम्मी तुम जल्दी से आ जाओ, मुझे आपकी बहुत याद आती है।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार पार्ट 4 Immense hate and true love part 4
Saturday, August 01, 2020बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार
पार्ट 4
विवान- मेरे अपाहिज होने की एक झुठी खबर ने उससे उसका प्यार भुला दिया। प्यार में वो फायदा और नुकसान देखने लगी।
सुहानी- मैं मानती हूं कि स्वाती ने जो किया वो गलत था। कम से कम उसे आपसे मिलकर सच को जानना चाहिए था। पर उसने ऐसा नहीं किया। पर उसकी गलती की सजा आप न सिर्फ अपने आप को बल्कि आप से जुड़े लोगों को भी दे रहे हैं। यह भी गलत है।
विवान- मेरे लिए अब कुछ गलत और सही मायने नहीं रखता। कोई भी व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है या मेरे लिए क्या राय बनाता है मुझे इस बात से कोई लेना-देना नहीं है।
सुहानी- पर ऐसा कब तक करेंगे। आप फिर से एक शुरूआत कर सकते हैं।
विवान- प्यार को लेकर हमेशा से लड़कों को बदनाम किया जाता रहा है। कि लड़के धोखेबाज होते हैं। लड़कियों का फायदा उठाते हैं और फिर छोड़कर चले जाते हैं। हमेशा ये बुराई लड़कों के हिस्सों में ही आई है। प्यार की शुरूआत में इस बात को लेकर ही उसे जज भी किया जाता है। फिर पता चलता है कि धोखेबाज लड़का नहीं लड़की थी। उसके बाद भी दोष लड़के को ही दिया जाता है और कहा जाता है कि तुम्हारी ही कुछ कमी रही होगी, लड़कियां कभी साथ नहीं छोड़ती। पर सब गलत है। रिश्ता शुरू होने के साथ शर्ते लागू कर दी जाती है। फिर जब साथ निभाने की बारी आती है तो लड़कियों का परिवार, लड़के की हैसियत, अच्छा घर, सुखी जीवन की इच्छा, तुमसे अच्छा और भी कई कारण निकल आते हैं लड़कियों की ओर से और फिर एक रिश्ता टूट जाता है। रिश्ते की शुरूआत में यह सब चीजें नजर नहीं आती हैं पर बाद में सब कुछ इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि रिश्ता खत्म हो जाता है। यहां लड़कियां मतलब के लिए प्यार का दिखावा करती है, करती वही है जो उन्हें करना होता है। बातें करेगी सच्चे प्यार की, पर जब प्यार निभाने की बारी आती है तो सैकड़ों बहाने बनाकर चल देती है। क्या कभी सोचती है कि जिस इंसान के साथ उन्होंने इतना लंबा समय बिताया है उसके दिल पर क्या गुजरेगी। क्या लड़के इंसान नहीं होते है? मानता हूं कि कुछ लड़के गलत हो सकते हैं, पर हर लड़का गलत होगा ये तो नहीं कर सकते। अगर कुछ लड़के लड़कियों का फायदा उठाते हैं तो कुछ प्यार करना और निभाना भी जानते हैं। लड़कियों की चंद खोखली बातों के कारण उस इंसान का दिल तो हमेशा के लिए टूट जाता है ना। कुछ रिश्ते भगवान बनाकर भेजता है और उनसे जोड़ता है। पर प्यार का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता होता है, जिसे हम खुद अपनी पसंद और मर्जी से चुनते है। भगवान के बने रिश्ते तो हम जिंदगी भर निभाते हैं, पर खुद के बने रिश्तों को क्यों तोड़कर चले जाते हैं। भगवान के बने रिश्तों में कोई दरार आ जाए या कोई गलतफहमी बन जाए तो पुरजोर कोशिश करते हैं कि वह गलतफहमी दूर हो जाए, पर अपने बनाए रिश्तों को तोड़ने में एक मिनट की भी देरी नहीं करते हैं। ये रिश्ता था या कोई सौदा कि बात नहीं बनी तो सौदा खत्म। कभी जिस इंसान के साथ हमेशा जीने मरने की कसमें खाते हो, हर सुख-दुख में उसका साथ देने का वादा करते हो, उस इंसान को तब जब खासकर उसे आपी जरूरत हो अपनी फायदे के लिए छोड़कर चले जाते हो? बस यही होता है लड़कियों का प्यार?
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 2 यहां पढ़े
इतना बोलने के बाद विवान एक बार फिर चुप हो जाता है। कुछ देर के लिए दोनों के बीच खामोशी छा जाती है। एक ओर जहां सुहानी के दिमाग में विवान की अब तक सारी बातें घूम रही थी, वहीं विवान एक बार फिर अपनी पुरानी यादों में खो चुका था। दोनों अब तक खामोश थे।
सुहानी- आप सही कह रहे हैं। पर मैं फिर भी कहूंगी कि आप अब भी गलत कर रहे हैं। स्वाती ने गलत किया है, पर सजा आप खुद को दे रहे हैं।
विवान- सुहानी जी मै। एक खिलौना हूं। और खिलौन की मर्जी नहीं होती है कि उसे किसी का दिल बहलाना है या नहीं। कोई भी, कभी भी खिलौने से खेलकर अपना दिल बहला सकता है और जब दिल बहल जाए तो छोड़कर जा सकता है। जैसा कि स्वाती ने किया है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसके इस व्यवहार के कारण मुझे कितना बुरा लगा होगा। क्योंकि रिश्ते के उस समय को मैंने भी पूरी ईमानदारी से निभाया था। मैंने तो प्यार ही किया था। मुझसे जो हो सकता था वो मैंने किया था। हां, वक्त और परिस्थितियों पर मेरा वश नहीं है, कभी अच्छा तो कभी बुरा हो सकता है, पर रिश्तें को बनाए रखना तो हमारे बस में था। बुरे वक्त में अच्छे की ओर चल देना ये सिर्फ लड़कियां ही कर सकती हैं। उसे जो अच्छा लगा उसने वो किया, मुझे जो अच्छा लग रहा है वो मैं कर रहा हूं।
सुहानी- पर ये ठीक नहीं है विवान जी।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 3 यहां पढ़े
विवान- क्या सही और क्या गलत मुझे नहीं पता। मै। तो कहता हूं कि दिल तोड़ने के पहले सिर्फ एक बार सोचा होता। कि यही सब उसके साथ होता तो क्या होता। कहना हर किसी के लिए आसान होता है कि सब भूलकर आगे बढ़ो, पर सब भूल जाना ही आसान नहीं होता है। प्यार के सच्चे और झुठे होने की धारणा मुझे नहीं पता, पर इतना पता है कि आज भी मुझे हर पल, हर बात में उसकी कमी महसूस होती है। पहले हर बात में वो शामिल हुआ करती थी, आज भी चाहता हूं कि वो शामिल हो। पर उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता है, उसके लिए अब उसका परिवार, पैसा, रूतबा, लोगों की बातें ही मायने रखती है। उसे इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि मैं कहां हूं, मैं क्या कर रहा हूं, मेरे क्या हाल है? उसके सिर में कभी दर्द होता था तो मैं कुछ भी करने के लिए तैयार रहता था, मेरा एक्सीडेंट हो गया और उसने ठीक होने के बाद एक बार फोन करके पूछा भी नहीं कि अब तुम्हारे क्या हाल है। खैर जाने दीजिए सुहानी जी जितनी बात करूंगा उतनी ही लंबी होती जाएगी। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए।
इतना कहने के बाद विवान वहां से चल देता है। सुहानी वहीं खड़ी रहती है। सुहानी विवान को तब तक देखती रहती है, जब तक कि वो उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाता। इसके बाद सुहानी कॉलेज आती है। वह अपन क्लास में पहुंचती है। हालांकि उसका ध्यान क्लास में ना होकर अब भी विवान की बातों पर ही था। विवान के कहे हर शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे। वह सोच रही थी कि एक तरह से विवान का कहना सही है कि कोई किसी से प्यार करें और फिर उसे धोखा मिले तो उसे क्या करना चाहिए। इंसान आखिर टूट ही जाएगा। प्यार करने वाला ही उसे फिर से संभाल सकता है। पर विवान को वो संभाले तो कैसे। अब ऐसा लगने लगा था कि सुहानी विवान से प्यार करने लगी थी। वह मन ही मन तय करती है कि वह स्वाती से मिलेगी। चाहे इसके लिए उसे नागपुर ही क्यों ना जाना पड़े। वह एक बार स्वाती से जरूर बात करेगी। ऐसे ही सोचती हुए वह कॉलेज खत्म होने के बाद अपने घर पहुंच जाती है और अगले दिन नागपुर जाने के लिए तैयारी शुरू कर देती है।
सुहानी- मैं मानती हूं कि स्वाती ने जो किया वो गलत था। कम से कम उसे आपसे मिलकर सच को जानना चाहिए था। पर उसने ऐसा नहीं किया। पर उसकी गलती की सजा आप न सिर्फ अपने आप को बल्कि आप से जुड़े लोगों को भी दे रहे हैं। यह भी गलत है।
विवान- मेरे लिए अब कुछ गलत और सही मायने नहीं रखता। कोई भी व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है या मेरे लिए क्या राय बनाता है मुझे इस बात से कोई लेना-देना नहीं है।
सुहानी- पर ऐसा कब तक करेंगे। आप फिर से एक शुरूआत कर सकते हैं।
विवान- प्यार को लेकर हमेशा से लड़कों को बदनाम किया जाता रहा है। कि लड़के धोखेबाज होते हैं। लड़कियों का फायदा उठाते हैं और फिर छोड़कर चले जाते हैं। हमेशा ये बुराई लड़कों के हिस्सों में ही आई है। प्यार की शुरूआत में इस बात को लेकर ही उसे जज भी किया जाता है। फिर पता चलता है कि धोखेबाज लड़का नहीं लड़की थी। उसके बाद भी दोष लड़के को ही दिया जाता है और कहा जाता है कि तुम्हारी ही कुछ कमी रही होगी, लड़कियां कभी साथ नहीं छोड़ती। पर सब गलत है। रिश्ता शुरू होने के साथ शर्ते लागू कर दी जाती है। फिर जब साथ निभाने की बारी आती है तो लड़कियों का परिवार, लड़के की हैसियत, अच्छा घर, सुखी जीवन की इच्छा, तुमसे अच्छा और भी कई कारण निकल आते हैं लड़कियों की ओर से और फिर एक रिश्ता टूट जाता है। रिश्ते की शुरूआत में यह सब चीजें नजर नहीं आती हैं पर बाद में सब कुछ इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि रिश्ता खत्म हो जाता है। यहां लड़कियां मतलब के लिए प्यार का दिखावा करती है, करती वही है जो उन्हें करना होता है। बातें करेगी सच्चे प्यार की, पर जब प्यार निभाने की बारी आती है तो सैकड़ों बहाने बनाकर चल देती है। क्या कभी सोचती है कि जिस इंसान के साथ उन्होंने इतना लंबा समय बिताया है उसके दिल पर क्या गुजरेगी। क्या लड़के इंसान नहीं होते है? मानता हूं कि कुछ लड़के गलत हो सकते हैं, पर हर लड़का गलत होगा ये तो नहीं कर सकते। अगर कुछ लड़के लड़कियों का फायदा उठाते हैं तो कुछ प्यार करना और निभाना भी जानते हैं। लड़कियों की चंद खोखली बातों के कारण उस इंसान का दिल तो हमेशा के लिए टूट जाता है ना। कुछ रिश्ते भगवान बनाकर भेजता है और उनसे जोड़ता है। पर प्यार का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता होता है, जिसे हम खुद अपनी पसंद और मर्जी से चुनते है। भगवान के बने रिश्ते तो हम जिंदगी भर निभाते हैं, पर खुद के बने रिश्तों को क्यों तोड़कर चले जाते हैं। भगवान के बने रिश्तों में कोई दरार आ जाए या कोई गलतफहमी बन जाए तो पुरजोर कोशिश करते हैं कि वह गलतफहमी दूर हो जाए, पर अपने बनाए रिश्तों को तोड़ने में एक मिनट की भी देरी नहीं करते हैं। ये रिश्ता था या कोई सौदा कि बात नहीं बनी तो सौदा खत्म। कभी जिस इंसान के साथ हमेशा जीने मरने की कसमें खाते हो, हर सुख-दुख में उसका साथ देने का वादा करते हो, उस इंसान को तब जब खासकर उसे आपी जरूरत हो अपनी फायदे के लिए छोड़कर चले जाते हो? बस यही होता है लड़कियों का प्यार?
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 2 यहां पढ़े
इतना बोलने के बाद विवान एक बार फिर चुप हो जाता है। कुछ देर के लिए दोनों के बीच खामोशी छा जाती है। एक ओर जहां सुहानी के दिमाग में विवान की अब तक सारी बातें घूम रही थी, वहीं विवान एक बार फिर अपनी पुरानी यादों में खो चुका था। दोनों अब तक खामोश थे।
सुहानी- आप सही कह रहे हैं। पर मैं फिर भी कहूंगी कि आप अब भी गलत कर रहे हैं। स्वाती ने गलत किया है, पर सजा आप खुद को दे रहे हैं।
विवान- सुहानी जी मै। एक खिलौना हूं। और खिलौन की मर्जी नहीं होती है कि उसे किसी का दिल बहलाना है या नहीं। कोई भी, कभी भी खिलौने से खेलकर अपना दिल बहला सकता है और जब दिल बहल जाए तो छोड़कर जा सकता है। जैसा कि स्वाती ने किया है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसके इस व्यवहार के कारण मुझे कितना बुरा लगा होगा। क्योंकि रिश्ते के उस समय को मैंने भी पूरी ईमानदारी से निभाया था। मैंने तो प्यार ही किया था। मुझसे जो हो सकता था वो मैंने किया था। हां, वक्त और परिस्थितियों पर मेरा वश नहीं है, कभी अच्छा तो कभी बुरा हो सकता है, पर रिश्तें को बनाए रखना तो हमारे बस में था। बुरे वक्त में अच्छे की ओर चल देना ये सिर्फ लड़कियां ही कर सकती हैं। उसे जो अच्छा लगा उसने वो किया, मुझे जो अच्छा लग रहा है वो मैं कर रहा हूं।
सुहानी- पर ये ठीक नहीं है विवान जी।
बेइंतहा नफरत और सच्चा प्यार का पार्ट 3 यहां पढ़े
विवान- क्या सही और क्या गलत मुझे नहीं पता। मै। तो कहता हूं कि दिल तोड़ने के पहले सिर्फ एक बार सोचा होता। कि यही सब उसके साथ होता तो क्या होता। कहना हर किसी के लिए आसान होता है कि सब भूलकर आगे बढ़ो, पर सब भूल जाना ही आसान नहीं होता है। प्यार के सच्चे और झुठे होने की धारणा मुझे नहीं पता, पर इतना पता है कि आज भी मुझे हर पल, हर बात में उसकी कमी महसूस होती है। पहले हर बात में वो शामिल हुआ करती थी, आज भी चाहता हूं कि वो शामिल हो। पर उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता है, उसके लिए अब उसका परिवार, पैसा, रूतबा, लोगों की बातें ही मायने रखती है। उसे इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि मैं कहां हूं, मैं क्या कर रहा हूं, मेरे क्या हाल है? उसके सिर में कभी दर्द होता था तो मैं कुछ भी करने के लिए तैयार रहता था, मेरा एक्सीडेंट हो गया और उसने ठीक होने के बाद एक बार फोन करके पूछा भी नहीं कि अब तुम्हारे क्या हाल है। खैर जाने दीजिए सुहानी जी जितनी बात करूंगा उतनी ही लंबी होती जाएगी। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए।
इतना कहने के बाद विवान वहां से चल देता है। सुहानी वहीं खड़ी रहती है। सुहानी विवान को तब तक देखती रहती है, जब तक कि वो उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाता। इसके बाद सुहानी कॉलेज आती है। वह अपन क्लास में पहुंचती है। हालांकि उसका ध्यान क्लास में ना होकर अब भी विवान की बातों पर ही था। विवान के कहे हर शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे। वह सोच रही थी कि एक तरह से विवान का कहना सही है कि कोई किसी से प्यार करें और फिर उसे धोखा मिले तो उसे क्या करना चाहिए। इंसान आखिर टूट ही जाएगा। प्यार करने वाला ही उसे फिर से संभाल सकता है। पर विवान को वो संभाले तो कैसे। अब ऐसा लगने लगा था कि सुहानी विवान से प्यार करने लगी थी। वह मन ही मन तय करती है कि वह स्वाती से मिलेगी। चाहे इसके लिए उसे नागपुर ही क्यों ना जाना पड़े। वह एक बार स्वाती से जरूर बात करेगी। ऐसे ही सोचती हुए वह कॉलेज खत्म होने के बाद अपने घर पहुंच जाती है और अगले दिन नागपुर जाने के लिए तैयारी शुरू कर देती है।
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