सौदा
पार्ट 2
साया- कार्तिक, कार्तिक नाम है ना तुम्हारा?
कार्तिक- हां मैं ही कार्तिक हूं। तुम... तुम कौन हो? और यहां कैसे आ गए और ये सब क्या हो रहा है?
साया- (हंसते हुए) ये मान लो कि मैं तुम्हारी किस्मत हूं।
कार्तिक- किस्मत? मेरी किस्मत? ये सब क्या मजाक है? सच-सच बताओं कौन हो तुम और ये सब क्या हो रहा है?
साया- अरे, तुम्हारी किस्मत तुम्हारे सामने हैं और तुम बस एक ही सवाल किए जा रहे हो? अगर तुम्हें अपनी किस्मत से बात नहीं करना है तो मैं चला जाता हूं। मैं तो ये सोचकर आया था कि कई दिनों से तुम काफी परेशान हो तो क्यों न तुम्हारी कुछ मदद कर दी जाए।
कार्तिक- रूको, मेरी मदद? तुम मेरी मदद कैसे कर सकते हो? और यदि सच में मेरी मदद करना चाहते हो तो अपना परिचय क्यों नहीं देते? ऐसे छिपे हुए क्यों हो तुम?
साया- बताया तो, मैं तुम्हारी किस्मत हूं। और मैं सच में तुम्हारी मदद ही करना चाहता हूं।
कार्तिक- अच्छा, बताओ तो मेरी इन सारी परेशानियों का समाधान कैसे होगा?
साया- वो तो मुझे नहीं पता।
कार्तिक- तुम तो कह रहे थे कि तुम मेरी मदद करने आए हो।
साया- हां, मैं तुम्हारी मदद करने ही आया हूं। अगर तुम अपनी सारी परेशानियों से छुटकारा चाहते हो तो तुम्हें मेरे साथ एक सौदा करना होगा।
कार्तिक- सौदा? कैसा सौदा।
साया- तुम्हारी सारी परेशानी खत्म करने के बदले मुझे भी तो कुछ मिलना चाहिए।
कार्तिक- हां, तो बताओ क्या चाहिए तुम्हें?
साया- पहले ये बताओ क्या तुम मेरे साथ सौदा करने के लिए तैयार हो?
कार्तिक- पहले मुझे ये बताओ कि मेरी परेशानियों को खत्म करने के बदले तुम्हें क्या चाहिए?
साया- तुम सवाल मत करो, ये बताओ तुम मेरे साथ सौदा करना चाहते हो? अपनी सारी परेशानियों का अंत चाहते हो?
कार्तिक- हां, मुझे मेरी सारी परेशानियों का अंत चाहिए। पर ये भी जानना चाहता हूं कि उसके बदले तुम्हें क्या चाहिए?
साया- सौदा करना चाहते हो तो करो, नहीं तुम्हारे जैसे मेरे पास कई लोग है, और वो सौदा करने के लिए कोई सवाल भी नहीं करेंगे।
कार्तिक कुछ देर सोचता है और फिर उस साये से सौदा करने के लिए तैयार हो जाता है।
कार्तिक- ठीक है मैं सौदा करने के लिए तैयार हूं।
कार्तिक की बात सुनकर साया उसकी ओर एक कागज फेंकता है।
साया- अच्छी बात है। तुमने ठीक सोचा। इस कागज को उठाओ और इस पर अपने साइन कर दो।
कार्तिक वह कागज उठाता है और देखता है तो वह खाली कागज था। उस पर कहीं कुछ भी नहीं लिखा था।
कार्तिक- ये तो ब्लैंक पेपर है, इस पर मैं कैसे साइन कर सकता हूं। तुम ये भी नहीं बता रहे हो कि तुम्हें क्या चाहिए?
साया- तुम्हारे पास सिर्फ दो ही ऑप्शन है, या तो अपनी परेशानियों के साथ जीओ, या फिर इस पेपर पर साइन करो और अपनी सारी परेशानियों का अंत कर दो। अगर तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है तो कागज मुझे दो, मैं किसी ओर से सौदा कर लूंगा।
कार्तिक एक बार फिर सोच में पड़ जाता है। उसके दिमाग सभी परेशानियां एक साथ घूमने लगती है। उसे उसका वह सपना भी याद आता है। वह कई साल से परेशान है वह यह भी सोचता है और फिर काफी देर सोचने के बाद वह कागज पर साइन कर देता है।
कार्तिक- ठीक है मैं तुम पर यकीन करता हूं। ये लो मैंने कागज पर साइन कर दिए हैं।
साया- बहुत अच्छे, मैं जानता था तुम साइन जरूर करोगे। अब उस कागज को एक बार पढ़ भी लो।
कार्तिक- (झल्लाते हुए) क्या पढ़ूं तुमने उस पर कुछ लिखा ही कहां है?
कार्तिक जैसे ही वो कागज दोबारा खोलता है तो उस पर काफी कुछ लिखा होता है।
कागज में लिखा होता है कि मैं कार्तिक अपने पूरे होश हवाश में अपनी जानकारी में बिना किसी दबाव और बिना किसी शर्त के अपनी किस्मत का सौदा कर रहा हूं। इस सौदे के बदले मिस्टर लक मुझसे जो भी और जब भी मांगेंगे मैं उन्हें देने के लिए बाध्य रहूंगा। हस्ताक्षर कार्तिक।
कार्तिक यह सब लिखा देकर चौक जाता है कि दो मिनट पहले तो इस कागज पर कुछ नहीं लिखा था, उसके साइन करते ही यह सब कैसे लिखा हुआ है। इसके बाद वह साया उससे वह कागज मांगता है।
साया- कार्तिक, मुझे लगता है तुमने वह कागज पढ़ लिया है और अब वो कागज मुझे दे दो।
कार्तिक- हां, पर अब आपको मुझसे क्या चाहिए। और यह कागज पर सबकुछ अचानक कैसे लिखा गया?
साया- कार्तिक तुम सवाल बहुत करते हो। किस्मत का सौदा करने जा रहे हो, तो अब किस्मत को ही आजमाओ। इतने सवाल करने से क्या मतलब निकलेगा?
कार्तिक- पर आपने यह भी नहीं बताया कि अब आपको क्या चाहिए?
साया- मुझे अभी कुछ नहीं चाहिए, जब मुझे जरूरत होगी, तब मैं तुमसे मांग लूंगा।
कार्तिक- पर मेरी किस्मत का क्या? मेरी सारी परेशानियां कैसे खत्म होगी?
साया- हां, पहली बार तुमने बिल्कुल सही सवाल किया है। अच्छा एक बात बताओ तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारे आस-पास के लोगों में सबसे अच्छी किस्मत किसकी है?
कार्तिक- ऐसे तो कई लोग है, जिनकी किस्मत मेरी किस्मत कही ज्यादा अच्छी है।
साया- तो फिर ठीक है, तुम किसी एक का नाम तय कर लो, जिसकी किस्मत सबसे अच्छी है, मैं तुम्हारी किस्मत उससे बदल दूंगा।
कार्तिक- (जोर से हंसते हुए) क्या मजाक कर रहे हैं आप। ऐसे कोई किसी से अपनी किस्मत बदल सकता है क्या?
साया- हंसो मत कार्तिक यह सच है।
कार्तिक- मैं नहीं मानता।
साया- तो मत मानों। कल से जब तुम्हारी किस्मत बदल जाए तब मान लेना। पर एक बात का ध्यान रखना, सिर्फ एक आदमी का नाम तय करना, जिससे तुम अपनी किस्मत बदलना चाहते हो।
इतना कहकर वह साया एक बार फिर धुंध में गायब हो जाता है। कार्तिक अचानक ही अपने बिस्तर पर उठकर बैठ जाता है। उसे लगता है कि उसने कोई सपना देखा है। वह उठता है और पानी पीकर आता है और फिर से एक बार सपने के बारे में सोचने लगता है। सोचते हुए उसे उस साए की बात याद आती है कि आसपास का कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी किस्मत सबसे अच्छी हो। ऐसे में उसे सिर्फ एक ही नाम याद आता है और वह है ऋषभ का। जिसके बारे में वह कुछ दिन पहले ही सोच रहा था। अब वह सोच रहा था कि यह सच में हो सकता है कि किसी से अपनी किस्मत बदल ली जाए? फिर मन ही मन वह यह सोचता है कि नहीं ऐसा संभव नहीं है। फिर पता नहीं उसे क्या होता है और वह तय करता है कि एक बार सपने की बात को सच मानकर देखा जाए, सच भी हुआ तो उसका क्या नुकसान होगा। अच्छा है उसे सभी परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी। इतना सोचकर वह मन ही मन में ऋषभ का नाम तय कर लेता है, जिससे वह अपनी किस्मत बदलना चाहता है। ऐसा सोचकर वह फिर से सो जाता है।
अगले दिन वह सोकर उठता है तो उसे कुछ बदलाव नजर तो नहीं आता है, परंतु वह सपने को याद करता रहता है। एक बार के लिए वह सोचता है कि वह साक्षी को रात के सपने के बारे में बताए, पर यह सोचकर वह चुप रह जाता है कि यदि वह सपने के बारे में किसी को भी बताएगा तो शायद वह उसका मजाक ही उड़ाएगा। इस कारण वह साक्षी को कुछ नहीं बताता और तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल पड़ता है। गाड़ी चलाते हुए भी वह सपने के बारे में ही सोच रहा था कि काश सपना सच हो जाए तो कितना अच्छा होगा। ऐसे ही कुछ ही देर में वह ऑफिस पहुंच जाता है। ऑफिस पहुंचते ही ऑफिस में उसके साथ काम करने वाले सभी लोग उसका तालियां बजाकर स्वागत करते हैं। कार्तिक यह सब देखकर चौंक जाता है। उसे कुछ समझ नहीं आता है कि ऑफिस के सभी लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? वह कुछ बोलता उसके पहले ही उसका बॉस उसके पास आता है और उसके हाथ में एक लेटर देता है। कार्तिक हाथ में लेटर लेता है।
कार्तिक- यह क्या है बॉस?
बॉस - खुद ही खोलकर देख लो।
कार्तिक- ये सब क्या हो रहा है, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है बॉस?
बॉस - तुम्हारे हर सवाल का जवाब इस लिफाफे में है कार्तिक। इसे खोलो और अपने हर सवाल का जवाब तुम्हें मिल जाएगा।
कार्तिक उस लिफाफे को खोलता है तो उसमें उसका प्रमोशन लेटर था। प्रमोशन के साथ ही उसकी सैलरी भी बढ़ा दी गई थी। कार्तिक को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसका प्रमोशन हो गया है और उसकी सैलरी भी बढ़ गई है।
कार्तिक- बॉस, ये प्रमोशन लेटर?
बॉस- हां कार्तिक, मैंने काफी सोचकर यह फैसला लिया है। तुम लंबे समय से इस ऑफिस में काम कर रहे हो, परंतु आज तक तुम्हें प्रमोशन नहीं मिला था। हां, तुमसे कुछ गलतियां होती है, पर वो तो सभी करते हैं। कुछ की गलतियां उजागर हो जाती है और कुछ की दब जाती है। तुम्हारी उजागर हो जाती थी। पर इसका मतलब यह नहीं है कि तुम प्रमोशन के हकदार नहीं हो। सो विश यू गुड लक, एण्ड कीप गोइंग।
कार्तिक- थैक्यू वैरी मच सर। आपने मुझ पर यकीन किया।
अश्कों का भार
कभी बस यूं ही मुस्कुरा दिया करती थीं आंखें,
कभी यूं ही खिलखिला दिया करती थी आंखें।
खो गई है चमक, खो गया है इनका हर सपना,
अब हर पल हर वक्त बहती रहती है ये आंखें।।
कभी हजारों ख्वाबों को बुनती थी आंखें,
कभी लाखों ख्वाबों को जीती थी आंखें।
अब न कोई ख्वाब, न नींद ही होती है,
अब सिर्फ अश्कों को समेटती है आंखें।।
कभी दिल की जुबां बन जाती थी आंखें,
कभी कुछ न कहकर भी सब कह जाती थी आंखें।
अब न कोई शब्द है, न जज्बात बयां करती है,
अब तो सिर्फ वीरान सी हो गई है आंखें।।
यूं तो कई बार छलकी है आंखें,
यूं तो कई बार बह भी चुकी है आंखें।
पर इस बार शायद बात ही कुछ और है,
इस बार कुछ ज्यादा ही बोझिल है आंखें।।
समेट रही है अश्कों के मोती आंखें,
ना जाने कैसे एक सीप बन गई है आंखें।
कुछ कहते कहते अक्सर चुप हो जाती है,
ना जाने अब कैसे बेजुबां हो गई है आंखें।।
यूं तो सोचा कई बार एक सवाल ही कर लूं,
जवाब भी देती तो आखिर क्या देती आंखें।
अब नहीं संभाल पा रही है भार अश्कों का,
महसूस कर रहा हूं कितनी कमजोर हो गई है आंखें।।
कोई चुरा ले जाए मेरे अश्कों के मोती,
शायद कुछ संभल जाएगी ये आंखें।
ऐसा न हो कि बढ़ जाए भार अश्कों का,
कहीं हमेशा के लिए बंद न हो जाए ये आंखें।।
सौदा
पार्ट 1
इंसान अपनी परेशानियों और समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए क्या कुछ नहीं करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह इन समस्याओं से कितना घिरा है या परेशान है उस पर भी निर्भर करता है कि वह अपनी परेशानियों और समस्याओं से निजात पाने के लिए कौन सा और किस प्रकार का रास्ता इख्तियार करता है। कई परेशानियां ऐसी भी होती है, जिनका हल निकलता ही नहीं है या वह परेशानी लंबे समय तक बनी रहती है। इस कारण इंसान कुछ ऐसा कर जाता है, जो उसे नहीं करना चाहिए था। कार्तिक भी कुछ ऐसी ही परेशानियों से घिरा था। उसके जीवन में कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा था। वह चाह रहा था कि सब कुछ सामान्य रहे और वह परिवार के साथ हमेशा खुश और सुखी जीवन जी सके। कभी उसे नौकरी में परेशानी आती थी, तो कभी वह आर्थिक रूप से परेशान रहता था। कभी परिवार में ही कभी बीमारी, कभी कोई दुर्घटना या कोई अनहोनी होने से भी वह विचलित हो जाता था।

ऑफिस में उसे उसके कलिग का कोई सहयोग नहीं मिलता था। उसका बॉस उसे अक्सर छोटी सी गलती पर भी पूरे स्टॉफ के सामने बेइज्जत कर दिया करता था। लंबे समय से उसका प्रमोशन रूका हुआ था। कभी बार उसकी पेमेंट भी काट ली जाती है। ऐसी कई परेशानियों से वह निजात पाना चाहता था। कार्तिक अक्सर जब भी अकेला होता तो वह सोचता था कि उसके जीवन में कोई परेशानी नहीं है और वह अपने पूरे परिवार के साथ बहुत अच्छी जिंदगी जी रहा है। वह परिवार के साथ बाहर घूमने के लिए भी जाता है, अपने बेटे को अच्छे स्कूल में पढ़ा रहा है। उसके लिए रोज नई चीजे लेकर जाता है। पत्नी को भी वह हर तरह से खुश रख रहा है। परंतु जब उसका यह सपना टूटता था, तो उसे फिर हकीकत में उन सभी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। ऐसे ही एक दिन वह अपने ऑफिस से घर के लिए निकल ही रहा था कि उसकी पत्नी का फोन आता है।
कार्तिक- हैलो, हां ऑफिस से घर के लिए ही निकल रहा हूं। बताओं कुछ लाना है क्या?
साक्षी - जी, लाना तो है।
कार्तिक- हां, तो बोलो क्या लाना है?
साक्षी- कुछ रूपए लेकर आईए। अनुज साइकिल चलाते हुए गिर गया है और उसे बहुत चोट आई है। शायद उसके पैर फ्रेक्चर भी हो सकता है। मैं उसे हॉस्पिटल लेकर जा रही हूं, आप रूपए लेकर हॉस्पिटल ही आ जाइए।
कार्तिक- चौंकते हुए अरे, कैसे गिर गया? और तुम कहां थी?
साक्षी- मैं घर पर थी और वह बाहर सोसायटी के कंपाउड में साइकिल चला रहा था। वह तो उसके रोने की आवाज आई तो मुझे पता चला।
कार्तिक- अच्छा ठीक है, तुम उसे जल्दी से हॉस्पिटल लेकर जाओ, मैं विनय से कुछ रूप्ए लेकर सीधे हॉस्पिटल ही आ रहा हूं।

कार्तिक यहां से अपने ऑफिस में उसके साथ काम करने वाले अपने दोस्त विनय के पास जाता है और उसे अनुज के एक्सीडेंट के बारे में बताते हुए उससे रूपए मांगता है। विनय उसे तत्काल रूपए देता है और कार्तिक उसे बाद में मिलने का कहकर हॉस्पिटल आ जाता है। हॉस्पिटल में वह फीस जमा करता है और उसके बाद साक्षी और अनुज के साथ वापस घर आ जाता है। रास्तें में उसके दिमाग में यही बात चल रही थी, एक परेशानी खत्म नहीं होती है और दूसरी परेशानी आकर खड़ी हो जाती है। कई सालों से यही सिलसिला चला आ रहा था। ऐसी समस्याओं और परेशानी के कारण अब उसके व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा था। अब उसे अधिक गुस्सा आता था। वह लोगों से कम बात करता था। वह हंसता कम था। छोटी-छोटी बातों में पर उसे झल्लाते हुए देखा जा सकता था। लोगों से ठीक से बात नहीं करता था और न ही वह अपने काम को ठीक से कर पा रहा था। इन सबके कारण भी उसकी परेशानियों में इजाफा हो रहा था। वह सोच रहा था कि अब बहुत समय हो गया है और इन परेशानियों से निजात मिलना ही चाहिए। ऐसे ही सोचते हुए तीनों घर पहुंच जाते हैं। साक्षी भी घर में जाकर किचिन में पहुंच जाती है। सबसे पहले वह कार्तिक के लिए चाय बनाती है और फिर अनुज के लिए कुछ पकाने चली जाती है। कुछ ही देर में वह सभी के लिए खाना भी बना लेती है। फिर साक्षी और कार्तिक खाना खाने के लिए बैठ जाते हैं।
साक्षी- कितने रूपए लिए हैं विनय भैया से?
कार्तिक- क्यों तुम्हें क्या करना है? जितने भी लिए हो, तुम्हारा काम चल रहा है ना?
साक्षी- अरे, कार्तिक ऐसे क्यों जवाब दे रहे हो? एक सिंपल सा सवाल ही तो किया है?
कार्तिक- हां, मैं तो ऐसे ही जवाब देता हूं। और तुमने सवाल किया ही क्यों? तुमने कहां रूपए लेकर आना मैं लेकर आ गया। अब कहां से, कैसे, किससे, कितने उन सबसे तुम्हें क्या मतलब?
साक्षी-कार्तिक मुझे पता है कि तुम परेशान हो, पर घर में तो अच्छे रहो और बात करो।
कार्तिक- अब तुम मुझे लेक्चर मत दो प्लीज।
इसके बाद वह खाना छोड़कर उठ जाता है और बाहर निकल जाता है। बाहर निकलने के बाद भी वह उन्हीं बातों के बारे में सोचता रहता है कि आखिर उसकी जिंदगी से इन सभी परेशानियों का अंत कैसे होगा? वह अपने आसपास के लोग, कलिग और जिन्हें वो जानता है उन लोगों से अपनी जिंदगी का कम्पेरिजन करने लगा है। वह सोचता है कि मुझसे अच्छी तो उन लोगों की किस्मत है, उनकी परेशानी कितनी जल्दी हल हो जाती है। वे सभी लोग कभी-कभी ही परेशान नजर आते है। उसके ऑफिस में ही एक और बंदा काम करता है जिसका नाम ऋषभ है। वह उसके बारे में सोचता है कि ऋषभ की किस्मत कितनी अच्छी है। अच्छी नौकरी, हाई सैलरी, खूबसूरत गर्लफ्रेंड, प्यार करने वाले लोग, ऑफिस में इज्जत क्या कुछ नहीं है उसके पास। और एक वह है जो हर वक्त परेशानियों से घिरा रहता है। काफी देर तक वह इन्हीं ख्यालों में टहलता रहता और फिर एक ठेले में जाकर कुछ खाने की सोचता है, क्योंकि घर पर तो गुस्से में खाना छोड़कर आ गया था, पर अब उसे भूख लग रही थी। वह एक ठेले पर पहुंचता है और वहां से कुछ खाने का ऑर्डर देकर पास ही खड़ा हो जाता है। पास ही दो छोटे बच्चे वहां बैठे थे। वह उन्हें देखता है। बच्चे उससे खाने के लिए मांगते हैं, जो वह अपना ऑर्डर उन्हें दे देता है। साथ ही कहता है कि मुझसे अच्छी तो तुम्हारी किस्मत है। तुमने खाने को मांगा और तुम्हें मैं मिला और मैंने दे दिया। काश ऐसे ही मुझे भी कोई मेरी खुशियां इस तरह से दे देता। उनमें से एक बच्चा कहता है तो आप मेरी किस्मत ले लो अंकल। कार्तिक उसे देखकर बस एक हल्की मुस्कान देता है और उसके सिर पर हाथ फिराते हुए वापस अपने घर की ओर चल देता है।

घर आकर वह बाहर वाले कमरे में ही सोफे पर लेट जाता है। कुछ ही देर में उसे नींद भी आ जाती है। रात को अचानक उसे किसी की आवाज आती है। उसे ऐसा लगता है जैसे कोई उसे कह रहा है कि आप मेरी किस्मत ले लो अंकल। वह उठकर देखता है तो उसे कोई नजर नहीं आता है। वह फिर से सो जाता है, परंतु उसे एक बार फिर वहीं आवाज आती है, आप मेरी किस्मत ले लो अंकल। वह एक बार फिर से उठकर पूरे कमरे में देखता है मगर उसे इस बार भी कोई नजर नहीं आता है। कुछ ही देर में कार्तिक को अहसास होता है कि जैसे पूरे कमरे में कोई धुंध सी छा गई है और उसे कुछ नजर नहीं आ रहा है। उस धुंध में भी वह आवाज उसे बार-बार सुनाई दे रही थी। थोड़ी ही देर में उसे उस धुंध में एक साया नजर आता है। वह साया धीरे-धीरे कार्तिक की ओर बढ़ता है। कार्तिक उससे बार-बार पूछ रहा है कि कौन, कौन हो तुम? वह साया कोई जवाब नहीं देता और धीरे-धीरे कार्तिक के पास आ जाता है।
Wednesday, April 22, 2020
एक दिन अचानक
Final पार्ट
अनवर की कुटिल मुस्कान का रहस्य अब खुलने जा रहा था। उसने अपने संपर्कों से मुंबई से एक ऐसे व्यक्ति को बुला लिया था, जो योजना बनाने, घात लगाने और निशाना लगाने में माहिर था। उसने आते ही अपना काम शुरू कर दिया और वह एक-एक कर दिलावर के लोगों को अपना निशाना बनाने लगा। इघर दिलावर परेशान था कि उसके आदमियों को मारा जा रहा है, परंतु अनवर कहीं भी नजर नहीं आता है और न ही उसका कोई आदमी वहां होता है, तो अब यह कौन है जो उसके आदमियों को मार रहा है। एक दिन अनवर अपनी पूरी ताकत के साथ दिलावर को मारने की योजना बनाता है और खोज शुरू कर देता है। इसकी जानकारी दिलावर को भी मिल जाती है। उसे लगता है कि यदि वह अनवर को नहीं मिला तो उसके परिवार को निशाना बना सकता है। इसलिए वह सीधे अपने घर की ओर निकल पड़ता हैं। घर पहुंचते ही वह अपनी मां और दोनों बच्चों को घर के पीछे वाले रास्ते से दूसरे गांव में निकल जाने के लिए भेज देता है। जैसे ही वह घर में आता है, उस पर हमला हो जाता है। वह सामने वाले दरवाजे ही भागता हुआ बाहर आता है। बड़े से मैदान पर वह लगातार भाग रहा था। गांव वाले भी छिपकर यह सब देख रहे थे। वहीं अनवर के आदमी लगातार उसका पीछा कर रहे थे। कुछ ही देर बाद पूरे गांव में शांति हो जाती है। गांव को इस संबंध में कोई जानकारी नहीं मिलती कि आखिर क्या हुआ। लगभग एक माह का समय गुजर जाने के बाद दिलावर का पूरा परिवार एक बार फिर अपने घर पर आ जाता है। एक माह में गांव वाले भी शांति से जीवन जी रहे थे। उन्हें इस एक माह में न तो कोई गैंगवार देखने को मिली थी और न ही गैंगवार में गांव को कोई व्यक्ति मारा गया था। गांव में अचानक सब कुछ शांत हो गया था।

लगभग 40 साल पहले हुई इसकी पूरी घटना की जानकारी प्रभात विशाखा को देता है। इस पूरी जानकारी को सुनकर विशाखा एक शून्य में खो सी जाती है। प्रभात उससे कई बार बात करने की कोशिश करता है, पर वह बिना कोई जवाब दिए वहां से चली जाती है। कुछ दिन बाद विशाखा का प्रभात के पास फोन आता है और वह उससे कहती है कि उसे कसाना जाना है। कुछ प्रयासों के बाद वह अपने घर के लोगों को भी कसाना जाने के लिए मना लेती है। हालांकि इस दौरान उसका भाई उसके साथ था। प्रभात, विशाखा और विशाखा का भाई एक दिन कसाना गांव पहुंच जाते थे। गांव में पहुंचते ही विशाखा को लगने लगता है कि जैसे वह पहले इस गांव में आ चुकी है। विशाखा पूरे गांव को देखते हुए आगे बढ़ती जाती है और प्रभात और विशाखा का भाई उसके पीछे चलता रहते हैं। एक बड़े से घर के सामने विशाखा रूक जाती है। जो काफी सुनसान और उजड़ा हुआ लग रहा था। यह पंडित का घर था। वह पंडित के बारे में याद करती है, जैसा कि प्रभात ने कसाना के इतिहास के बारे में बताते हुए उसे कहा था। तभी वहां से गांव का एक व्यक्ति गुजरता है वह विशाखा को देखता है और उससे पूछता है कि इस घर को क्या देख रही हो बिटिया। ये 40 साल से ऐसा ही है। विशाखा बिना कुछ बोले आगे चल देती है। इस बार वह सीधे दिलावर के घर के सामने पहुंच जाती है। प्रभात उससे पूछता है कि यहां क्यों रूक गई तो विशाखा कहती है, यही तो मेरी मां मेरा इंतजार कर रही है। वह अंदर चली जाती है। इधर प्रभात को समझते देर नहीं लगती कि विशाखा का सपना महज एक इत्तेफाक नहीं था। उसका इससे संबंध था। वह अंदाजा लगता है कि दिलावर का विशाखा के रूप में पुर्नजन्म हुआ है और अब करीब 40 साल बाद वह अपने घर पर आया है। इधर विशाखा जब अंदर जाती है तो करीब 70 वर्षीय एक महिला उससे पूछती है कि कौन, किससे मिलना है। विशाखा कुछ नहीं कहती, बस वह उस बुर्जुग महिला को एक टक निहारती रहती है। वह महिला दोबार उससे पूछती है तो उससे मुंह से बस एक शब्द निकलता है ऐ बाजी। ये शब्द सुनकर वो महिला भी एक दम से रो पड़ती है और फिर उससे पूछती है कि ये तुने क्या बोला। और तुझे कैसे पता कि कोई मुझे इस नाम से भी बुलाता था। विशाखा कहती है कि ए बाजी तुझे ये शब्द याद है, पर जो कहता था वो याद नहीं है। विशाख कहती है ए बाजी मैं तेरा दिलावर। फिर कुछ ऐसी बातें उस महिला को बताती है जिससे उसे यकीन हो जाता है कि सामने जो लड़की खड़ी है वहीं उसका बेटा दिलावर है। फिर प्रभात और अपने भाई से अपनी मां को मिलाती है।

देखते ही देखते पूरे गांव में यह खबर फैल जाती है कि दिलावर एक लड़की के रूप में वापस आ गया है। फिर गांव के कुछ पुराने लोगों को पहचानती है, तो सभी उसकी बात पर यकीन करने लगते है। गांव के कुछ पुराने लोग अब इस बारे में जानना चाहते हैं कि उस दि आखिर क्या हुआ था, जब दिलावर अपने घर से भागा था और उसके बाद गांव में कभी किसी का खून नहीं बहा। तब विशाखा उन्हें बताती है कि उसे एक सपने ने गांव के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद उसने और उसके दोस्त प्रभात ने गांव में बारे में पूरी बात पता की। जब प्रभात ने अनवर, राणा, दिलावर और पंडित के बारे में सब कुछ बताया तो मुझे भी पूरी बात याद आ गई। उस दिन मैं यहां से भाग रहा था और अनवर के आदमी उसका पीछा कर रहे थे। जैसे ही वह गांव के बाहर पहुंचा तो वहां अनवर पहले से तैयार खड़ा था। उसने देखते ही उस पर गोली चलाना शुरू कर दिया। गोली लगने से दिलावर घायल हो गया और पास के ही नाले में गिर पड़ा। अनवर और उसके साथियों ने समझा कि दिलावर मर गया है। सभी लोग पास के ही एक खेत में जश्न में डूब गए थे। अनवर भी वहीं पर मौजूद था। कुछ देर बाद दिलावर को होश आता है और वह देखता है कि वे सभी वहां जश्न मना रहे हैं। घायल होने के बाद भी वह एक-एककर सभी मारना शुरू कर देता हैं सबसे आखिर में वह अनवर के सामने जा खड़ा होता है। दोनों के बीच लड़ाई भी होती है और दोनों ही हथियार लेकर एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं और एक दूसरे पर गोली चला देते हैं। दोनों वहीं गिर पड़ते हैं।

तभी वहां दिलावर का एक आदमी पहुंच जाता है। दिलावर मरने से पहले उसे कहता है कि यहां जो कुछ भी हुआ किसी को पता नहीं चलना चाहिए। उसने कहा कि यहां से सारी लाशें हटा देना। और कभी मां मिले तो कहना मैं ठीक हूं और एक दिन उससे मिलने के लिए जरूर आउंगा। बच्चों का ध्यान रखना। इतना कहकर वह दम तोड़ देता हैं। दिलावर का साथी उसके कहे अनुसार सब कुछ ठीक कर देता है। गांव में किसी को भी पता नहीं चलता कि अनवर और दिलावर दोनों मारे जा चुके हैं। गांव वाले अब तक यही समझ रहे थे कि दोनों फिलहाल कहीं और निकल गए हैं। वहीं दिलावर का बेटा बड़ा होने के बाद पुलिस में भर्ती हो गया था और उसकी बेटी ने भी डॉक्टरी की पढ़ाई की थी। कुछ ही समय पहले उसकी शादी हुई थी। अब गांव के सभी लोग दिलावर के एक लड़की के रूप में लौट आने को लेकर चर्चा कर रहे थे। वहीं दिलावर का बेटा और बेटी भी विशाखा से मिलने के लिए गांव पहुंचते हैं। कुछ दिन गांव में रहने के बाद विशाखा, प्रभात और विशाखा का भाई वापस लौट जाते हैं। विशाख लगभग रोज ही अपनी दूसरी मां यानि कि दिलावर की मां से फोन पर बात करती रहती है।
दोस्तों इस कहानी के माध्यम से मैं पुर्नजन्म की बात को बढ़ावा नहीं देना चाहता हूं। बस मेरे एक दोस्त को इस प्रकार का एक सपना आया था, जिसमें कसाना गांव का नाम सुना था। फिर उसे गांव के कुछ दृश्य भी दिखाई दिए थे। इसी के आधार पर मैंने एक काल्पनिक कहानी लिखी है। इस कहानी में कोई किरदार या कोई घटना सच में हुई हो तो उसे में अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा इत्तेफाक ही समझूंगा।
एक दिन अचानक
पार्ट 4
राणा से मुलाकात कर अनवर वापस आ जाता है। राणा के साथ मिलकर दिलावर और पंडित को एक साथ खत्म करने की योजना पर काम शुरू करता है। अनवर की योजना के अनुसार अनवर पंडित की बहन और राणा दिलावर के बेटे का अपहरण कर लेता है। अनवर और राणा मिलकर पंडित और दिलावर को एक ही समय और एक ही जगह पर बुलाते है, ताकि दोनों मिलकर उन दोनों का खात्मा कर दें। राणा दिलावर के बेटे का और अनवर पंडित की बहन का अपहरण कर लेता है। अपनों के अपहरण की खबर सुनते ही दोनों आग बबूला हो जाते हैं और अपनों को लाने के लिए अनवर और राणा के बताए ठिकाने पर पहुंचने के लिए निकल पड़ते हैं। दोनों ही ठीक समय पर बताए गए स्थान पर पहुंचते हैं और जैसे ही वे लोग वहां पहुंचते हैं उन पर अनवर और राणा के आदमी हमला कर देते हैं। पंडित और दिलावर इस हमले से खुद को बचाने का प्रयास करते हैं। इस हमले के दौरान ही पंडित के लोग भी वहां पहुंच जाते हैं और एक बार फिर उनके बीच गैंगवार शुरू हो जाती है। इस गैंगवार में राणा मारा जाता है और अचानक हुए हमले के कारण अनवर को वहां से भागना पड़ता है।

सबकुछ शांत होने के बाद दिलावर पंडित से पूछता है कि तुम्हारे आदमी यहां अचानक कैसे आ गए। तो पंडित उसे बताता है कि ये लोग अचानक नहीं आए हैं, ये लोग पहले से ही यहां थे। बस मौके का इंतजार कर रहे थे। करीब पांच दिन पहले ही मुझे अनवर की इस पूरी साजिश के बारे में पता चल गया था। तब दिलावर कहता है कि अच्छा तो इसलिए ही तुमने यहां आते समय रास्ते में मुझे हथियार दिया था। पंडित कहता हां, बिल्कुल क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम इस तरह से साजिश का शिकार हो जाए और तुम्हारे बच्चे को भी कोई नुकसान पहुंचे। इस पर दिलावर पूछता है कि तुम्हें पांच दिन पहले ही इस साजिश का पता चल गया था, तो तुमने बच्चों को बचाया क्यों नही। पंडित कहता बचा तो लिया, यदि मैं उस समय ही कुछ करता तो शायद आज राणा ऐसे नहीं पड़ा होता। हालांकि मैं चाहता था कि राणा की जगह यहां अनवर होता, पर वो बचकर भाग निकला। राणा एक बार फिर उससे पूछता है कि तुम्हें साजिश का पता कैसे चला। तब पंडित कहता है कि ये तो तुम्हें पता ही है कि अनवर ने मेरे घर पर हमला कराया था। हालांकि उसमें कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। मैं जानता था कि अनवर एक बार फिर मुझ पर हमला करेगा। इसलिए मैंने अपने कुछ आदमी अनवर के आदमियों के पीछे लगा दिए थे। इस दौरान उसका एक आदमी मेरे हत्थे लग गया और फिर उससे पूरी कहानी उगलवाना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। वो हमें एक साथ लाकर हमें मारने का प्लान बना रहे थे, तो मैंने भी उन दोनों को एक साथ मारने की योजना बना ली थी। अफसोस कायर अनवर भाग निकला, वरना आज वो भी मेरे हाथों मारा जाता। दिलावर उसके बच्चों को बचाने के लिए पंडित शुक्रिया कहता है और फिर दोनों वहां से बच्चों को लेकर निकल जाते हैं।
दूसरी ओर अनवर अपनी योजना के फेल हो जाने से परेशान हो गया था। अब इसे यह भी डर था कि दिलावर और पंडित अब साथ मिलकर उसके खिलाफ जंग लड़ेंगे, जो उसके लिए ठीक नहीं है। फिलहाल वह छिपकर रहना चाहता था, परंतु इस गांव में उसके लिए ऐसी कोई जगह नहीं थी। वह सोच नहीं पा रहा था, कि अब उसे क्या करना चाहिए। वहीं हमले के बाद उसके कुछ आदमी भी अब तक वापस नहीं आए थे। वह ये तो समझ चुका था कि अब उसका बच निकल पाना मुश्किल हैं इसलिए उसने एक बार फिर से सोचना शुरू किया। इस बार फिर उसने कुछ सोचा और उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैरने लग गई थी।

इस मुस्कान का मतलब यह था कि एक बार फिर अनवर ने पंडित और दिलावर को मारने के लिए कोई साजिश रची है, उसे उसके कामयाब होने का यकीन भी है, इस कारण ही उसके चेहरे पर यह कुटिल मुस्कान आई थी। दूसरी ओर राणा की मौत के बाद उसकी गैंग लगभग बिखर गई थी। सभी अनवर के पास थे। अनवर ने भी उन्हें अपनी गैंग में शामिल कर लिया था। इससे उसकी ताकत और भी अधिक बढ़ गई थी। वहीं इस गैंगवार और राणा की मौत से पूरे गांव में दहशत का माहौल बना हुआ था। हर कोई डर कर जी रहा था और आपस में बातें कर रहे थे कि अब क्या होगा। क्योंकि इस बार जो हुआ है, वो इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इस बार अनवार और राणा ने सीधे तौर पर पंडित और दिलावर के घर पर हमला किया है। इससे ये दोनों भी चुप नहीं बैठने वाले थे। वहीं राणा की मौत के बाद अनवर और भी ज्यादा खतरनाक हो जाएगा, क्योंकि अब उसे दिलावर और पंडित दोनों का एक साथ सामना करना था। ऐसे में वह मौके की तलाश में था कि दोनों में किसी को भी जल्द से जल्द वह अपने रास्ते से हटा सके। किस्मत भी शायद अनवर के साथ ही चल रही थी। एक रात पंडित पास के ही एक गांव में शादी से वापस घर लौट रहा था। उसके साथ उसका पूरा परिवार भी था। लौटते समय ही अचानक ही उसकी गाड़ी खराब हो गई और उसके साथी दूसरी गाड़ी में थे वो लोग आगे निकल गए। उन्हें पता ही नहीं चला कि पंडित की गाड़ी खराब होने के कारण वहां रूक गई है। अनवर का एक आदमी लगातार पंडित पर नजर रखे था, उसने यहां सूचना तत्काल ही अनवर को दी और अनवर भी पंडित के खात्मे का सोचकर हथियारों और कुछ आदमियों के साथ वहां पहुंच जाता है। पंडित अनवर को देखकर कुछ समझ पाता उससे पहले ही अनवर और उसके आदमी पंडित की कार पर गोलियों की बौछार कर देते हैं। पंडित साथ उसका पूरा परिवार भी वहीं मारा जाता है।

इतनी ही देर में पंडित के आदमी वापस आते नजर आते हैं, तब तक अनवर वहां से भाग निकलता है। पंडित के साथी कुछ नहीं कर पाते हैं। अगले दिन सुबह तक यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी। पूरे गांव में एक पंडित ही था, जो इस गैंगवार को खत्म कर गांव में शांति लाना चाहता था। पंडित की मौत हो जाने से गांव वालों की यह उम्मीद भी खत्म होती नजर आ रही थी। गांव वालों को यह पता था कि अब अनवर के हौंसले और भी बढ़ जाएंगे और दिलावर से उसकी जंग अब खुलकर होने वाली है। इधर पंडित के घर पर मातम था। उसके साथी अब पंडित की मौत का हर हाल में बदला लेना चाहते थे। उन्होंने पंडित की मौत के बाद कुछ दिन इंतजार किया और फिर अनवर की तलाश में जुट गए। उनकी मदद अब दिलावर कर रहा था। हालांकि दिलावर पंडित की तरह गांव में शांति के लिए नहीं लड़ रहा था, परंतु बच्चों के अपहरण के मामले में पंडित ने उसका साथ दिया था, इस कारण वह अपनी ओर से पंडित के साथियों को हर मदद भी दे रहा था।
क्रमशः
Wednesday, April 08, 2020
एक दिन अचानक
पार्ट 3
अब तक आपने पढ़ा...
विशाखा एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की है। उसके अपने सपने और अरमान है, जिसे वह पूरा करना चाहती है। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करती है। उसका एक दोस्त है प्रभात है, जो कि एक अखबार के लिए काम करता है और उसके और विशाखा के बीच काफी बातें होती है। एक दिन विशाखा को सपना आता है कि वह अपने किसी परिचित को मिलने के लिए हॉस्पीटल जाती है और वहां एक बच्चा आता है और उससे कहता है कि उसकी मां उसका कसाना गांव में इंतजार कर रही है। इसके बाद प्रभात और विशाखा उस गांव के बारे में पता करते हैं। कसाना गांव एक समय क्राइम सिटी के रूप में विख्यात था। यहां चार गैंग सक्रिय थे, जो लोगों में दहशत फैलाकर अपना वर्चस्व बनाने के लिए आपस में लड़ा करते थे। दिलवर, राणा, पंडित और अनवर की गैंग आपस में लड़ती थी और इस गैंगवार में कई गांव वाले मारे जाते थे। एक दिन दिलावर के कुछ आदमी पंडित के घर पर बम फैंक देते हैं, हालांकि पंडित इसमें बच जाता है।
अब आगे....
घर पर हुए हमले के बाद पंडित कुछ बौखला सा जाता है और वह मन ही मन तय कर लेता है कि अब दिलावर का वह खात्मा करके रहेगा। दूसरी ओर पंडित के घर पर दिलावर के आदमी ने बम फेंका था, इसकी जानकारी अनवर की गैंग को मिल जाती है और वह दिलावर और पंडित दोनों को एक साथ खत्म करने की योजना बनाने में जुट जाता है। इधर राणा अब तक खामोश ही था। हालांकि वह भी मौके की तलाश में था कि उसे मौका मिले तो वह तीनों में से किसी का भी खात्मा कर सके। पंडित सीधे तौर पर दिलावर से नहीं लड़ना चाहता था, वह चाहता था कि कहीं दिलावर उसे अकेला मिल जाए तो वह उसे खत्म कर देगा। दूसरी अनवर सोच रहा था कि पंडित और दिलावर जब एक-दूसरे के सामने हो तो वह अचानक हमला कर उन दोनों को खत्म कर देगा।

वहीं दिलावर इस बात से बेखबर था कि उसके खिलाफ षडयंत्र बनाया जा रहा है। वह अपने परिवार के साथ समय बीता रहा था। उसके परिवार में भी उसकी मां, उसके दो छोटे बच्चे थे। हालांकि उसकी गैंग के सदस्य उसके घर के बाहर हमेशा रहते थे, फिर भी दिलावर को अपने परिवार की चिंता हमेशा सताती रहती थी। जिस तरह पंडित अपने परिवार से बहुत प्यार करता था, उसी तरह दिलावर भी अपने परिवार को अपना सब कुछ मानकर चलता था। हालांकि वह दूसरे लोगों के लिए जल्लाद से कम ना था, परंतु घर में एक अच्छा बेटा होने के साथ ही एक अच्छा पिता भी था। इसके साथ ही वह अपनी गैंग के साथियों के भी हर सुख-दुख में खड़ा रहता था। उसकी एक ही कमी थी वह थी कभी भी आवेश में आकर कोई फैसला कर लेता था और जब तक वह उसे अमल में नहीं ले आता चैन से नहीं बैठता था। इस कारण उसका कई बार नुकसान भी हुआ है और कई बार वह अपनी जान को भी जोखिम में डाल चुका है।दिलावर अक्सर अपने साथियों के घर चला जाया करता था और उनके परिवार के साथ ही कुछ समय बीताता था। यहीं कारण था कि उसके लोग अपनी जान की परवाह भी नहीं करते थे और उसे अपना बड़ा भाई समझते थे। उसकी गैंग के साथी उसे भाईजी कहकर ही बुलाते थे।

इधर अनवर सोचता है कि यदि दिलावर को खत्म करना है तो पंडित को उकसाना होगा, ताकि पंडित दिलावर का खात्मा कर दे और फिर वह पंडित को खत्म कर दे। इसके बाद मौका देखकर राणा को रास्ते से हटाकर कसाना पर अपना पूरा वर्चस्व बना सके। इसके लिए वह एक योजना बनाता है कि अपने कुछ लोगों को पंडित के घर पर एक बार फिर हमला करने के लिए कहता है। इस दौरान वह अपने साथियों से कहता है कि हमले के दौरान वे दिलावर का नाम ले कि दिलावर से पंगा बहुत महंगा पड़ेगा। इससे पंडित अपने होश खो बैठैगा और दिलावर को मारने के लिए निकल जाएगा। हम उसके पीछे जाएंगे और जैसे ही पंडित दिलावर को खत्म करेगा, हम उसे खत्म कर देंगे। योजना के अनुसार वेष बदलकर पंडित के घर पहुंच जाते हैं। इधर पंडित को शक था कि कोई भी एक गैंग बम फेंकने की घटना का फायदा उठाकर एक बाद फिर उसके घर पर हमला कर सकते हैं, इस कारण वह भी तैयार था। रात के समय अनवर के साथी पंडित के घर पर हमला करने के लिए जाते हैं, परंतु वह पंडित के जाल में फंस जाते हैं। वो लोग घर पर हमला करते उसके पहले ही पंडित के लोग उन लोगों को पकड़ लेते हैं। पकड़े जाने के बाद वे अनवर की सारी योजना पंडित को बता देते हैं, परंतु पंडित उन सभी को खत्म कर देता है। अब पंडित दिलावर और अनवर दोनों से ही बदला लेने के लिए योजना बनाने में जुट जाता है। हालांकि वह कई बार दोनों को मारने के लिए प्रयास करता है, परंतु सही मौका और समय न मिल पाने के कारण वह उन पर हमला नहीं कर पाता है।

दिलावर अब तक अपने खिलाफ होने वाले षडयंत्र से अंजान था, वहीं अब अनवर के लिए भी पंडित से लड़ाई खुलकर होने की आशंका बन गई थी। अनवर को भी इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि पंडित ने उसके आदमियों को पकड़ लिया था पूरी योजना जानने के बाद उनकी हत्या कर दी थी। उसे इस बात का भी पता था कि पंडित अब उस पर कभी हमला कर सकता है। ऐसे में वह भी इस मौके की तलाश में था कि वह पंडित को खत्म कर सके। इसके लिए वह एक बार फिर योजना बनाता है और इस बाद पंडित और दिलावर को खत्म करने के लिए राणा से हाथ मिलाने की पेशकश करता है। वह राणा से कहता है कि हम दोनों मिलकर उन दोनों को खत्म कर देते हैं और दोनों मिलकर शहर पर राज करेंगे। शहर को दो हिस्सों में बांट लेंगे और कोई भी किसी के हिस्से में नहीं आएगा। इस बात पर राणा अनवर से हाथ मिला लेता है। वह अनवर से पूछता है कि पंडित और दिलावर को एक साथ कैसे मारेंगे। दोनों एक साथ हमें मिलेंगे कैसे? इसके लिए अनवर कहता है कि वो काम तुम मुझ पर छोड़ दो दोनों एक ही समय एक ही जगह पर आ जाएंगे। तुम बस तैयार रहना कि दोनों में से कोई भी उस समय बचकर जाने ना पाए। इस पर राणा उसे हामी भर देता है।
क्रमशः
एक दिन अचानक
पार्ट 2
इन सभी बातों से विशाखा अंजान थी। उसे नहीं पता था कि जिस गांव का नाम उसने सपने में सुना था, उसका एक भयानक इतिहास भी था। हालांकि इंटरनेट के जरिए उसे गांव के होने का तो पता चल गया था, परंतु उसे अभी यह नहीं पता था कि ये गांव एक समय अपने आप में यमराज की भूमि के नाम से जाना जाता था। लोग कहते थे कि स्वयं यमराज के दूत यहां इंसानों के भेष में हथियारों के साथ घूमते हैं। वे किसी की हत्या के पहले बिल्कुल नहीं सोचते थे कि इसका अंजाम क्या होगा? न ही ये सोचते थे कि जिसकी वे हत्या कर रहे हैं, उसके परिवार पर क्या गुजरेगी? उन्हें सिर्फ हत्या से काम था। सिर्फ मुखबिरी का शक या किसी दूसरे गैंग से संबंध होने की अफवाह भी उन्हें मिल जाए तो वे उस व्यक्ति की मुलाकात सीधे यमराज से करा देते थे। एक ओर जहां विशाखा इस बात से अंजान थी, वहीं दूसरी ओर प्रभात इस गांव का इतिहास निकालने और विशाखा के सपने का इस गांव से कोई संबंध होने की संभावना को तलाशने में लग गया था।

इस दौरान उसे पता चलता है कि 70-80 के दशक में कसाना गांव में चार गैंग का यहां काफी खौफ हुआ करता था। इनमें एक गैंग का प्रमुख हुआ करता था दिलावर शेख। यह अपने नाम की तरह ही बेखौफ था और निर्दयता इसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। बच्चा, बूढ़ा, जवान, औरत इसके लिए कोई मायने नहीं रखते थे यह किसी पर भी बेरहमी से टूट पड़ता था। दूसरी गैंग का सरगना था अनवर हुसैन। यह भी दिलावर से कम नहीं था। अपना वर्चस्व बनाने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकता था। वहीं तीसरी गैंग थी रणबहादूर उर्फ राणा की। इसका मकसद बाकि तीन गैंग का खात्मा करना था, परंतु दूसरी गैंग से संबंध रखने वाले या इसकी मुखबिरी करने वालों के लिए यह किसी जल्लाद से कम नहीं था। वहीं चौथी गैंग जो कसाना में सक्रिय थी वह थी अनुज पांडे की, यह गांव में पंडित के नाम से जाना जाता था। यह हालांकि अभी युवा ही था और यह काफी दिलेर भी था। यह अक्सर गलत के खिलाफ आवाज उठाता था और इसका मकसद इन तीन गैंग को खत्म कर गांव में शांति बनाना था। इसके लिए यह तीनों गैंग से दुश्मनी मोल ले चुका था। इसने अपनी गैंग भी सिर्फ इन तीन गैंग के खात्मे के लिए ही तैयार की थी। इसकी गैंग के द्वारा अक्सर बाकि तीन गैंग के लोगों का ही खात्मा होता था। बाकि गांव में इसकी काफी इज्जत थी। वक्त बीतता गया और इन चारों गैंग की गैंगवार में कोई कमी नहीं आ रही थी। हर गैंग का सदस्य दूसरी गैंग के सदस्य के खात्में के लिए खून का प्यासा सा घूमता था। कई बार पंडित की गैंग और बाकि तीन गैंग के बीच गैंगवार इसलिए भी हुई कि पंडित की गैंग ने उन्हें गलत करने से रोकना चाहा। इसके लिए तीनों ही गैंग अब हर संभव तरीके से पंडित को अपने रास्तें से हटाना चाह रही थी। चारों गैंग के बीच होने वाली गैंगवार को पुलिस भी रोकने में असमर्थ थी। हालांकि गैंग के सभी लोग जानते थे कि इस गैंगवार से उनका काफी नुकसान होता है, आदमी मारे जाते हैं, फिर कानून का डर कुछ तो बना ही रहता है, वहीं राजनेता भी, जिनके हाथ इन गैंग के सिर पर होते थे, वे भी लताड़ लगा दिया करते थे। इसके बाद भी अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इन गैंग की आपस में गैंगवार हुआ करती थी।
पंडित, जिसकी गांव में काफी इज्जत थी, उसका घर गांव के बीचों-बीच था। वह यहां अपनी मां, अपने छोटे भाई और बहन के साथ रहता था। गांव में ही उसकी एक प्रेमिका भी थी, जिसका नाम प्रिया था। दोनों जल्द ही शादी करना चाह रहे थे। दोनों परिवारों के बीच शादी को लेकर रजामंदी भी बन गई थी। पंडित के पिता बाकि अनवर औद दिलावर की गैंग के बीच चल रही गोलीबारी में मारे गए थे। ऐसा अक्सर होता था कि गैंग के बीच होने वाली लड़ाई में कोई ना कोई गांव का व्यक्ति ऐसे ही मारा जाता था। ऐसा ही पंडित के पिता के साथ भी हुआ था। इसी कारण उसने बाकितीन गैंग के सफाए का प्लान का तैयार किया और उनका मुकाबला करने के लिए मैदान में उतर आया था। इसकी जानकारी अन्य राजनेताओं और पुलिस को भी थी। पुलिस कइ्र्र बार चोरी छिपे पंडित को सपोर्ट भी किया करती थी। वहीं कुछ राजनेता जहां उसके साथ थे, वहीं कुछ उसे रास्ते से हटाने के लिए बाकि गैंग को मदद करते थे। दो से तीन बार पंडित पर हमला भी हुआ था, परंतु वह हर बार बच गया था।

वहीं दूसरी ओर दिलावर के पांच भाई और थे, जो कि उसकी गैंग में हमेशा उसके साथ खड़े रहा करते थे। इन छह भाईयों के एक साथ होने के कारण यह गैंग काफी खतरनाक थी। वहीं अनवर हुसैन दूसरे शहर से तड़ीपार होने के बाद इस गांव में आया था। यहां बसने के बाद उसने अपने वहीं के साथियों को यहां लाकर अपनी गैंग फिर से खड़ी कर ली थी। एक समय दिलावर और अनवर की गैंग ही वर्चस्व की लड़ाई लड़ा करती थी। परंतु बाद में राणा भी इनको टक्कर देने के लिए मैदान में उतर आया था। राणा भी अपने परिवार के साथ रहता था और गांव का काफी अमीर आदमी भी था। उसने अपने पैसों के बल पर ही अपनी गैंग को खड़ा किया था। इस प्रकार यहां चलने वाली चारों गैंग में सिर्फ पंडित ही एक मकसद के साथ लड़ रहा था, बाकि अपना वर्चस्व बनाने और बचाने के लिए आपस में लड़ रहे थे और उनके इस खेल में कई गांव वाले अपनी जान से हाथ धो बैठते थे।

एक बार पंडित अपने गांव से बाहर किसी काम से गया हुआ था। तब दिलावर की गैंग के एक आदमी ने पंडित के घर के बाहर बम फेंक दिया था। हालांकि बम से घर को कुछ नुकसान हुआ, परंतु पंडित के भाई-बहन और उसकी मां इस हमले में बच गए। बम के फटने के बाद गांव के बाकि लोगों ने मदद की थी। बम की सूचना मिलते ही पंडित अपने घर आ गया था। वह तुरंत ही दिलावर की पूरी गैंग का सफाया करना चाह रहा था, पर गांव के कुछ बुजुर्गों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इसके बाद उसने अपने परिवार के लोगों को पास के दूसरे गांव में अपने एक दोस्त के घर भिजवा दिया, ताकि इस गैंगवार में उसके परिवार के लोगों को कुछ हो ना जाए, पर शाख्द अनवर की गैंग के लोगों को इस बात की जानकारी मिल गई थी।
Wednesday, April 01, 2020
एक दिन अचानक
पार्ट 1
रिश्ते और यादें, ये दो शब्द ऐसे हैं, जो एक से न होते हुए भी आपस में जुड़े लगते हैं। रिश्तों की याद हो या यादों में कोई रिश्ता हो, इंसान को एक अलग ही अनुभव देता है। ऐसे ही एक अनुभव से गुजरने वाली थी एक छोटे से शहर की लड़की विशाखा। इस वक्त उसे नहीं पता था कि आगे कि जिंदगी में उसके साथ क्या होने वाला है। भविष्य के गर्त में छिपी बातों से अंजान विशाखा एक आम जिंदगी जी रही थी। परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के साथ उसकी जिंदगी के 30 साल ऐसे ही गुजर गए थे। कुछ सपने और कुछ अरमान उसकी आंखों में थे और वह उन्हें पूरा करने का हमेशा प्रयास करती रहती थी। अपने परिवार से प्यार करने वाली विशाखा हमेशा खुश रहती और दूसरों को खुश रखने का प्रयास करती थी। यूं तो उसके कई दोस्त थे, परंतु उनसे उसका मिलना कम ही होता था। उसका एक दोस्त था प्रभात, जो कि एक अखबार में नौकरी करता था। विशाखा की अक्सर उससे बात हुआ करती थी। विशाखा अपनी कई बातें प्रभात को बताती थी। विशाखा को किसी भी प्रकार की मदद चाहिए होती तो वो प्रभात को ही याद करती थी। एक आम इंसान की जिंदगी की तरह विशाखा की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए थे, जिनका उसने डटकर मुकाबला किया था।

परिवार के संस्कार उसके व्यवहार में नजर आते थे। विशाखा यूं तो बहुत सुलझी हुई लड़की थी, परंतु गुस्सा हमेशा उसकी नाक पर बैठा रहता था। प्रभात उसे कई बार इसके लिए टोकता भी था, परंतु वह बस हां कर प्रभात की बात को टाल दिया करती थी। कभी कहती थी कि मैं गुस्से पर कंट्रोल करूंगी, पर उसने शायद कभी प्रयास ही नहीं किया। विशाखा की एक बात और थी वह हर बात में अपने दिमाग का उपयोग करती थी, कोई भी बात उसके लिए कितने फायदे या नुकसान की है, यह उसके दिमाग में हमेशा रहता था। उसने अपनी जिंदगी में कुछ ही ऐसी बातें होगी, जिसमें उसने दिल से फैसला लिया हो। शायद यहीं कारण है कि उसके दोस्त कम थे, और ज्लद ही उसके रिश्ते टूट जाया करते थे। उसकी नजर में सिर्फ उसका परिवार ही अहमियत रखता था, बाकि रिश्ते उसके लिए परिवार के बाद ही आते थे। इसलिए उसने कभी रिश्तों को समझने का प्रयास ही नहीं किया। इसी कारण उसकी कई बार प्रभात से भी लड़ाई हुई है।

वक्त ऐसे ही बीत रहा था और आने वाले समय अंजान विशाखा अपनी जिंदगी को आराम से जी रही थी। परंतु आने वाला वक्त न सिर्फ उसके लिए बल्कि उसके परिवार के लिए परेशानी का सबब बनने वाला था। विशाखा को एक रात सपना आया कि वह अपने किसी परिचित से मिलने के लिए हॉस्पिटल गई है। वह परिचित से मिलने के लिए वार्ड के गेट पर खड़े होकर इंतजार कर रही थी, तभी एक छोटा सा लड़का वहां आता है और उसका हाथ पकड़ कर कहता है तुम्हारी मां वहां इंतजार कर रही है। जबकि विशाखा की मां अंदर वार्ड में अपने परिचित से बात कर रही थी। विशाखा उस लड़के से पूछा कि कहां, तो उसने सिर्फ एक शब्द कहा कसाना। विशाखा उस लड़के से कुछ और पूछ पाती उसके पहले ही वह लड़का वहां से भाग गया। ऐसे कुछ सपने पहले भी विशाखा को आए हैं, जिसमें वह या तो खुद को कहीं कैद पाती थी, या किसी महल या किले में अकेली रह जाती थी। तब वह अक्सर डर जाती थी और उसकी नींद खुल जाती थी। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी नींद खुली, उसे कुछ डर भी लगा, परंतु इसके बाद वह फिर से सो गई। सुबह उसने अपनी मां को सपने के बारे में बताया तो उसकी मां ने कहा कि हां, हमारे दिमाग में काफी कुछ चलता है और वह हमें सपने में दिख जाता है। विशाखा ने भी अपनी मां की बात मान ली और उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया। हालांकि उसने सपने से पहले कभी कसाना के बारे में नहीं सुना था। दिन में उसने इंटरनेट पर कसाना के बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो वह आश्चर्यचकित रह गई क्योंकि ऐसा एक गांव उत्तरप्रदेश में था। इसके साथ ही यह गांव एक समय अपराध का सबसे बड़ा गढ़ हुआ करता था।

उसने यह बात अपने दोस्त प्रभात को भी बताई। प्रभात ने भी विशाखा की बात को बड़े ध्यान से सुना और उसने भी अपने स्तर पर कसाना के बारे में पता किया। यह उत्तर प्रदेश का एक छोटा कस्बा था। यहां अपराध का ग्राफ काफी अधिक था। इंटरनेट से मिली जानकारी के अनुसार एक समय यहां कई गैंग हुआ करते थे, जिनमें अक्सर विवाद होते थे और कई लोगों की जान उस गैंगवार में चली जाती थी। वर्चस्व की लड़ाई में यह गैंगवार काफी अधिक होती थी और तहसील के लोग चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे। इस गांव में अपराध और गैंग का असर यह था कि यदि कोई किसी गेंग के सदस्य के बारे में बात भी कर ले या उनके संबंध में कोई जानकारी निकालने का प्रयास भी करें तो उस गैंग के सदस्य उस व्यक्ति की हत्या कर देते थे। इस क्षेत्र में पुलिस भी आने से डरती थी, क्योंकि यहां करीब 4 गैंग मुख्य रूप से सक्रिय थे, जो पुलिसकर्मियों पर भी हमला करने से नहीं डरते थे। कुछ राजनीतिक लोगों का इन गैंग को आसरा था, जिसके कारण ये गैंग क्षेत्र में काफी सक्रिय रहती थी। जब भी पुलिस इन पर कार्रवाई करना चाहती किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी के नेता का फोन पुलिस के पास पहुंच जाता था। इसके कारण पुलिस अपनी कार्रवाई नहीं कर पाती थी। चारों ही गैंग के लोग क्षेत्र के लोगों को दहशत में रखते थे। किसी भी गैंग के किसी भी सदस्य के खिलाफ कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता था। यदि करता भी था, उसे मिलती थी मौत। गैंग के इस आतंक के कारण कई लोग क्षेत्र छोड़कर दूसरे शहरों में रहने के लिए भी चले गए थे। उनके घर अब भी कसाना में ही थे, परंतु वे उन्हें बेचने के लिए भी यहां नहीं आते थे। ऐसे खाली पड़े घरों पर इन गैंग के सदस्य अपना कब्जा कर लिया करते थे और वहीं से वे अपनी गतिविधि को संचालित किया करते थे।
क्रमशः