एक ही सुराग  पार्ट 3

एक ही सुराग 

पार्ट 3


ऐसे ही केस को लेकर बात करते हुए दोनों कुछ ही देर में उस जगह पर पहुंच जाते हैं। वहां उन्हें एक पुराना पोस्टऑफिस भी नजर आता है, जिससे भौमिक यह समझ जाता है कि उसने पहेली का सही हल निकाला था। अब उसके अनुसार उस चैलेंजर का दूसरा सुराग उसे यही मिलने की पूरी उम्मीद थी। ऐसा ही सोचकर भौमिक और परमार दोनों पोस्टऑफिस के अंदर चले जाते हैं। वहां थोड़ी बहुत पूछताछ करते हैं, पर वहां उन्हें सुराग के रूप में कुछ नहीं मिलता है। हालांकि इसके बाद भी दोनों पोस्टऑफिस और उसके आसपास देखते हैं कि शायद हमेशा की तरह किसी पत्थर से दबा कोई खत रखा हो, परंतु उन्हें वहां ऐसा कुछ नहीं मिलता है। दोनों फिर से अपनी कार में आ जाते हैं। कार में भौमिक की सीट पर ही एक पत्थर से दबा एक खत रखा था। वह उसे उठाता है और खोलता है। 
डियर एसीपी, 
जैसा कि मैंने सोचा था कि आप मेरी पहली पहेली को हल कर लेंगे और यहां तक आ ही जाएंगे। पर एक बात जो मैंने नहीं सोची थी वह यह कि आपने कैसे सोच लिया कि मैं ये खत पोस्टऑफिस में रखूंगा, वहां जाकर आपको पूछताछ करने की जरूरत नहीं थी। फिर भी आपने की चलिए कोई बात नहीं। ये आपका काम भी है। अब हम आगे की बात करते हैं। वैसे आपको एक बात बता दूं कि आपको यहां बुलाया है तो आप इस जगह को अच्छी तरह से देख लें कि क्योंकि यहां से मैं अपना कुछ काम करते हुए जा रहा हूं। और अब रही बात दूसरे सुराग कि तो वो आपके ऑफिस पहुंच गया हैं। वहां जाकर आप अपने दूसरे सुराग को देख सकते हैं और फिर एक नाकाम कोशिश कर सकते हैं मुझे पकड़ने की। 
अ...ह....ह...ह... इतना गुस्सा अच्छा नहीं होता एसीपी साहब। खत को फाड़ने से कुछ नहीं होगा। इसलिए अपने गुस्से पर थोड़ा काबू रखिए और जल्दी से ऑफिस जाइए, क्योंकि वहां आपका दूसरा सुराग है। 
अच्छा अब चलता हूं फिर मिलूंगा ऐसे ही किसी खत में।
चैलेंजर 



भौमिक उस खत को पढ़कर डेश बोर्ड पर पटक देता है और फिर परमार उस खत को पढ़ता है। खत पढ़ने के बाद वह कार सीधे ऑफिस के लिए मोड़ लेता है। ऑफिस पहुंचने के बाद जैसे ही वे केबिन में जाते हैं टेबल पर ही उन्हें एक खत मिलता है। इस बार भी भौमिक उस खत को उठाता है। इस बार उसे उस खत में सिर्फ एक पहेली लिखी मिलती है। 
ये उड़ने की राह है, यहां वक्त कभी थमता नहीं
मैं भी एक ऐसा गुलाब हूं, जो खुश्बू कभी रखता नहीं।
परमार- अब ये क्या पहेली है सर? 
भौमिक- पहेली है तो इसका हल तो निकालना ही होगा। तभी तो हम उस तक पहुंच सकते हैं। 
परमार- पर सर ऐसे कब तक हम पहेलियों के सहारे बैठे रहेंगे? हम उसे कैसे पकड़ सकते हैं? 
भौमिक- फिलहाल तो हमारे पास इन पहेलियों के सिवाय कुछ नहीं है परमार। इन पहेलियों से ही हमें उसका कोई सुराग मिल सकता है। 
परमार- तो अब इस पहेली क्या हल है सर? 
भौमिक- वही तो सोच रहा हूं परमार। आखिर अब क्या कहना चाह रहा है यह? 
भौमिक हाथ में खत लेकर काफी देर तक सोचता रहता है। पर उसे पहेली का कोई हल नहीं मिलता है। वह कुछ देर बाहर टहलने के लिए चला जाता है और फिर थोड़ी देर बाद ऑफिस आकर बैठ जाता है। पहेली के हल के साथ भौमिक यह भी सोच रहा था कि आखिर यह शख्स ऐसा क्या करना चाह रहा है। और उसने उसे एक महीने का समय क्यों दिया है। क्या एक महीने में ऐसा कुछ होने वाला है जिसका वो फायदा उठा सके। परमार भी लगातार से देखे जा रहा था। आखिरकार जब कोई हल नहीं निकलता है तो दोनों अपने अपने घर के लिए रवाना हो जाते हैं। रास्तें में गाड़ी चलाते हुए भी भौमिक के दिमाग में वहीं पहेली चल रही थी। तभी उसकी नजर एक बोर्ड पर पड़ती है और वह मुस्कुरा देता है। 
परमार- सर लगता है कि आपने पहेली का हल निकाल लिया है।
भौमिक- हां, परमार लगता तो ऐसा ही है। अब यह तो सुबह जाकर पता चलेगा कि मैं कितना सही हूं। 
परमार- तो सुबह कहां जाना है सर? 
भौमिक- परमार सुबह क्यों अभी चलते हैं। 
परमार- सर इस समय। अब तो काफी देर हो चुकी हैं। 
भौमिक- परमार थोड़ी देर और सही परमार। तुम एक काम करो गुलाबगंज के टॉवर तक चलो। 
परमार- गुलाबगंज के टॉवर पर? 
भौमिक- हां, परमार। देखो ये उड़ने की राह मतलब एयरपोर्ट रोड। मैं भी एक ऐसा गुलाब हूं, जो खुश्बू नहीं रखता मतलब गुलाब गंज और यहां वक्त कभी थमता नहीं। मतलब टॉवर जहां की घड़ी कभी बंद नहीं होती और गुलाबगंज का बाजार भी कभी बंद नहीं होता है। 
परमार- वाह सर मान गए। आपने तो पहेली का हल निकाल ही लिया। 
भौमिक- तुम बस जल्दी से वहां चलो। मुझे लग रहा है कि वहां हमारा एक और खत इंतजार कर रहा है। 
कुछ ही देर में दोनों गुलाबगंज पहुंच जाते हैं और वहां टॉवर के आसपास खत को तलाशना शुरू कर देते हैं। वहां उन्हें कुछ नजर नहीं आता है, पर भौमिक सोचता है कि उसके अनुसार तो अगला खत यही होना चाहिए। क्या चैलेंजर ने अब तक खत यहां रखा नहीं है? क्या उसे ऐसा लग रहा था कि मैं उसकी पहेली का जल्दी हल नहीं निकला पाउंगा, इस कारण उसने अब तक यहां कोई खत नहीं छोड़ा है? दूसरी ओर परमार भी वहां खत को खोज रहा था। तभी वहां एक रेहड़ी वाला आता है।  
रेहड़ी वाला- साहब शायद जो खोज रहे हैं, वह मेरे पास है। 
भौमिक- तुम्हारे पास? 
रेहड़ी वाला- हां, शायद आप यह खत खोज रहे हैं ना? 
भौमिक- हां, पर ये तुम्हारे पास कैसे आया। 
रेहड़ी वाला- पता नहीं साहब। मैं तो यहां चाट बनाता हूं। कई लोग आते हैं और प्लेट कहीं भी रखकर चले जाते हैं। अभी थोड़ी देर पहले यहां से सारी प्लेट उठा रहा था तो एक प्लेट पर यह खत चिपका हुआ था। इस पर एसपी लिखा हुआ था, तो मैंने रख लिया था। आपको देखा तो देने के लिए आ गया। 
भौमिक- ओके कोई बात नहीं। (भौमिक उसे 500 रूपए देता है और फिर से अपनी कार में आ जाता है।) 
भौमिक वो खत खोलता है और उसे पढ़ने लगता है।

डियर एसीपी, 
जानकर अच्छा लगा कि तुम अपने दिमाग का बखूबी इस्तेमाल करते हो। पहले मुझे लगा था कि तुम शायद आज यहां नहीं पहुंच पाओगे, पर तुम पहुंच गए हो और यह खत भी पढ़ रहे हो। चलो खैर कोई बात नहीं। अच्छा हुआ कि तुम आ गए। वैसे अब तुम्हारे लिए एक काम और करने वाला हूं। जिससे तुम्हारी परेशानी कुछ कम हो जाएगी और तुम्हें मेरे पीछे आने में मजा भी आएगा। क्योंकि अब मैं तुम्हें वो बताने वाला हूं, जो मैं करने वाला हूं। अब तुम मुझे कैसे रोकोगे ये तुम सोच लेना। 
मैं इस शहर से एक अपहरण करने वाला हूं। और अपहरण एक ऐसे इंसान का होगा जिससे पूरी मुंबई हिल जाएगी। उसके अपहरण से न सिर्फ तुम्हारी पुलिस फोर्स बल्कि राजनेता भी चिल्लाने लग जाएंगे। इसलिए अब अपना हर कदम थोड़ा सोचकर उठाना एसीपी। किसका अपहरण होगा ये पता लगाना तुम्हारा काम है, पर हां तुम्हारी मदद मैं ऐसे कर सकता हूं कि मैं तुम्हें उसके बारे में कुछ हिंट दे दूंगा। अब नाम जानने के लिए तुम्हें मेरे अगले खत का थोड़ा सा इंतजार करना होगा, क्योंकि अपने काम के लिए मैं कुछ दिन शहर से बाहर जा रहा हूं। जब आउंगा तो तुम्हें फिर से ऐसा ही एक खत तुम्हारे ऑफिस में पहुंचा दूंगा। 
चैलेंजर 

यहां से परमार भौमिक को उसके घर पर छोड़कर अपने घर के लिए निकल जाता है। इधर घर पहुंचने के बाद भी भौमिक के दिमाग में चैलेंजर के खत की बातें ही घूम रही थी। वह अब यह सोचने लगा था कि मुंबई शहर में आखिर ऐसा कौन है, जिसके अपहरण से न सिर्फ पुलिस विभाग बल्कि राजनीति से जुड़े लोग भी मैदान में उतर जाएंगे। अब वह मुंबई शहर के नामचीन लोगों की लिस्ट बनाने के लिए बैठ जाता है। उसने शहर के लगभग 100 से भी अधिक लोगों की लिस्ट तैयार कर ली थी, जो मुंबई में अपना एक रसूख रखते हैं। इनमें कुछ फिल्म से जुड़े लोग, राजनेता और बिजनेसमैन के नाम शामिल थे। लिस्ट तैयार करने के बाद अब वह यह भी सोच रहा था कि एक साथ इतने लोगों की गतिविधि पर नजर रखना संभव नहीं हैं। ऐसे में अब इस लिस्ट में उसे कुछ ऐसे नाम निकालने होंगे जो फिलहाल की स्थिति में सक्रिय हो या हो सकते हैं। ऐसा सोचने के बाद भी उसके पास करीब 30 लोगों के नाम थे। हालांकि अब भौमिक को सोचना था कि इन तीस लोगों से मुलाकात कर वह इन्हें आगाह कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा भी दे सकता है। इसके साथ ही उसके दिमाग में यह भी चल रहा था कि चैलेंजर जिसका भी अपहरण करने वाला है, वह इन तीस लोगों में से ही कोई होना चाहिए। ऐसा सोचते हुए ही उसकी नींद लग जाती है। अगले दिन सुबह उठकर तैयार होकर भौमिक वह लिस्ट और चैलेंजर के तीनों खत लेकर अपने ऑफिस के लिए निकल जाता है। ऑफिस में वह अपने केबिन में बैठकर एक बार फिर से अपनी तैयार की हुई लिस्ट को देखने लगता है। कुछ ही देर में परमार भी वहां पहुंच जाता है और भौमिक के केबिन में आकर बैठ जाता है। भौमिक अब भी अपने काम में ही लगा था। 

मेरे अल्फाजों पर कभी गौर तो करो
मेरे अल्फाजों पर कभी गौर तो करो

दिल से निकले मेरे अल्फाजों पर कभी गौर तो करो, 
इनमें छिपा है तुम्हारे लिए कहीं प्यार, महसूस तो करो।
एक सूरत एक मूरत भी है कहीं इन शब्दों के आगोश में, 
तुम पहचान लो उसे गौर से और फिर मेरे हवाले करो।।

तुम्हें देखकर अक्सर लरज जाते हैं अल्फाज मेरे, 
इनको छू लो तुम बस एक बार, इन्हें बिंदास करो।
ये लफ्ज कभी कविता कभी गीत भी बन जाते हैं, 
तुम भी तो कभी इन गीतों को गुनगुनाया तो करो।।

तेरे छूने के ही अहसास से ये कैसे मचल जाते हैं, 
तेरे ना होने के ख्याल से ही इनके मायने बदल जाते हैं।
कब से खामोश दफन है लफ्ज कागजों की पहलू में, 
तुम आओ एक बार और इनकी आवाज बन जाया करो।।

मेरे छिपे अहसासों और अरमानों की एक मूरत है ये,
मेरे दिल में कहीं छिपे हुए प्यार की एक सूरत है ये।
यूं तो बंद अलफाजों में प्यार की एक ठंडी सी बयार, 
तुम आकर उसे एक बार इश्क का तूफान कर जाया करो।।

यूं तो लिखा हुआ हर शब्द अपना एक मुकाम रखता है,
गर निकालों मतलब तो हर शब्द एक जहान रखता है।
यूं तो बसी हुई है लिखे हुए लफ्ज में कोई एक कहानी, 
तुम आओ और इन्हें पढ़कर कहानी की एक किताब करो।।

कभी बन जाते हैं ये गुल तो कभी गुलदान है शब्द मेरे,
कभी मौसिकी तो कभी खुश्बू की पहचान है शब्द मेरे।
कभी सलोने रंग है तो कभी बहारों की फरमाईश है ये, 
तुम बन जाओ तितली और फिर इन्हें गुलिस्तान करो।।

कभी शबनमी अहसास, कभी ठहरी हुई सुगंध है ये, 
कभी रजनीगंधा है तो कभी कोई मुकुंद है लफ्ज मेरे।
कभी धूप की तपन तो कभी चांदनी का अहसास है,
तुम पढ़कर मेरे शब्दों को इनको एक सुहानी शाम करो।।

अभी तो बोल भी रहे है शब्द, मेरे अहसासों की कहानी, 
बयां हो रहा है इश्क मेरा, मेरे ही इन शब्दों की जुबानी।
कहीं हो ना जाए ये बेजां और ये सिसककर दम तोड़ दे, 
इनको बोलकर तुम इनकी जिंदगी इनके नाम करो।।

अभी तो बिखरे पड़े है ये कभी सिमट जाने की चाहत में, 
टूटते भी है ये हर रोज, एक बार फिर से जुड़ जाने को।
कहीं कतरा तो कहीं शीशे से बिखर ना जाए अल्फाज मेरे, 
इनसे जुड़कर तुम इनको अपनी सी एक सूरत करो।।

मेरे शब्दों की जुबां, मेरे लफ्जों में भी एक संगीत है, 
इनकी भी है इक आरजू, इनका भी तो कोई मीत है।
लिखता तो कागज पर हूं, पर ये दिल से निकलते है, 
इनको महसूस कर तुम इनको मेरी मोहब्बत करो।।

एक ही सुराग  पार्ट 2

एक ही सुराग 

पार्ट 2


एक ही सुराग का पहला पार्ट यहां पढ़े 

इसके बाद केबिन में कुछ देर के लिए खामोशी छा जाती है। इस खामोशी के बीच भौमिक सोचता है कि क्या आगामी कुछ दिनों में शहर में ऐसा कुछ होने वाला है, जिससे वहां कोई गड़बड़ की जाए तो शहर में अशांति का माहौल बन सकता है। हालांकि उसे इस समय ऐसा कुछ याद नहीं आता है। वह एक बार फिर परमार की ओर रूख करता है। 
भौमिक- परमार,  वह जब भी हमें कोई सुराग देगा तब देगा, परंतु हम अब इसे हल्के में नहीं ले सकते हैं। 
परमार- जी, सर। 
भौमिक- तो परमार एक काम करो सबसे पहले ये पता करो कि क्या शहर में कुछ बड़ा होने वाला है। कोई पार्टी, किसी बड़े व्यक्ति का आना, या कोई राजनीतिक सभा या कुछ भी। 
परमार- जी, सर मैं पता लगाता हूं। 
इतना कहने के बाद परमार वहां से चला जाता है। भौमिक एक बार फिर से वह खत उठाता है और गौर से उसे पढ़ने लगता है। खत को पढ़ते हुए वह यह भी सोच रहा था कि यह खत लिखने वाला कौन हो सकता है। वह यह भी सोचता है कि यह जो भी है वह उसके हर काम पर नजर रखता है, तभी उसने हवेली वाले डॉक्टर के परिवार की हत्या का जिक्र किया है और उसे इसके लिए सम्मान भी मिला है यह भी उसे पता है। यह व्यक्ति जो कोई भी भौमिक के बारे में हर जानकारी रखता है। भौमिक ने म नही मन तय कर लिया था कि अब वह उसे पकड़कर ही दम लेगा। इसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े वह करेगा। अब भौमिक इंतजार में था कि परमार क्या खबर लाता है और यह व्यक्ति जो खुद को अब चैलेंजर कह रहा है वह खुद कोई सुराग दे, जैसा कि उसने कहा है। इसके बाद भौमिक भी लंच के लिए निकल जाता है। शाम को एक बार फिर वह ऑफिस आता है और कुछ जरूरी काम निपटाकर फिर से चला जाता है। लगभग तीन दिन बीत गए थे और चैलेंजर की ओर से अब तक सुराग के लिए कोई खत नहीं मिला था। हमेशा की तरह भौमिक और परमार उसके केबिन में बैठकर काम कर रहे थे। तभी एक सिपाही आता है, उसके हाथ में एक लिफाफा था। भौमिक उसे देखता है और उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। सिपाही टेबल के पास आता है और भौमिक की ओर लिफाफा बढ़ाते हुए कहता है कि सर यह लिफाफा पहले की ही तरह एक पत्थर से दबा हुआ था। परमार यह सुनकर तुरंत बाहर की ओर जाता है, पर भौमिक उसे रोक देता है और कहता है कि परमार कोई फायदा नहीं है बाहर जाने का। वहां कोई नहीं होगा और न ही तुम्हें वहां कोई सुराग मिलेगा। परमार भौमिक की बात सुनकर फिर से कुर्सी पर बैठ जाता है। भौमिक वह लिफाफा लेता है और सिपाही बाहर चला जाता है। 
भौमिक- लो परमार इस बार पहले तुम पढ़ो। देखे क्या कहना चाहता है चैलेंजर। 
परमार- जी, सर। परमार वो लिफाफा खोलता है और लेट निकालकर पढ़ता है।

डियर एसीपी, 
वादे के मुताबिक मैं आपको अपना सुराग दे रहा हूं। यह खत एक बार फिर आपके पास पहुंचा रहा हूं। वैसे आपको एक बात को जानकर खुशी होगी कि मैंने जो एक महीने का समय मुझे पकड़ने या पता लगाने के लिए आपको दिया था, उसकी टाइमिंग आज से शुरू हो रही है। इस खत को पढ़ने के साथ ही आपका टाइम शुरू हो जाएगा। तो देखते है कि मैं अपना काम पहले खत्म करता हूं या आप पहले मुझ तक पहुंच पाते हैं। वैसे खेल को थोड़ा रोचक बनाने के लिए मैंने कुछ सोचा है। मैं आपको सुराग तो दूंगा, पर.....। ना घबराईए मत कोई शर्त नहीं रख रहा हूं बस ये कहना चाह रहा हूं कि मेरा हर सुराग एक पहेली के रूप में होगा। अगर आपने पहले हल कर ली तो आप मुझ तक पहुंच पाएंगे और अगर पहेली हल नहीं कर पाए तो मैं तो आपना काम कर ही लूंगा। तो अब ज्यादा बात न करते हुए आपको सुराग देता हूं। नीचे एक पहेली है उसका हल निकालिए और मुझसे मिलने या मुझे पकड़ने का पहला प्रयास करें। 
चैलेंजर 
पहचान पुरानी ही सही पर औकात अपनी अब भी रखता हूं, 
भूला दिया कई लोगों ने मुझे, पर पहचान अब भी रखता हूं।
कागज की बनावट से कभी मिल जाती थी यादें और रिश्तें, 
अब भी दफन है मुझ में कई बातें और कई रिश्तों के किस्से।
मेरी तारिफ कहीं तुम्हारी यादों में ही गुम है, उन्हें समेट लो, 
दिन तो पांचवां है तुम भी आकर मुझसे यही मिल पर मिल लो।

ऐसी ही एक पहेली के साथ वह खत समाप्त हो जाता है और परमार खत पढ़ने के बाद भौमिक को देखता है। 
परमार- अब ये क्या है सर? ये पहेली और ये आकर मिलना, पकड़ना। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है। और वो किस काम की बात कर रहा है? कौन सा काम करना चाह रहा है ये?
भौमिक- मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है परमार। ये शायद हमारे साथ खेलना चाहता है। और रही बात इसके काम की तो यह अभी कुछ नहीं करने वाला। ये अभी अपने उस काम की तैयारी कर रहा है। जिसके लिए इसे कम से कम एक महीना लग रहा है। इसलिए ही इसने हमें भी एक महीने का समय दिया है। 
परमार- पर सर हम इसे पकड़ेंगे कैसे? और ये पहेली का क्या फंडा है? 
भौमिक- कहा ना परमार, ये हमसे खेल रहा है। ये खुद को बहुत चालाक समझ रहा है। इसलिए ही इसने हमें पहेली के रूप में अपना सुराग भेजा है। पहेली है तो कुछ अजीब सी और साफ तौर पर कुछ नहीं लिखा है इसने। इसलिए इस पहेली का हल निकालने के लिए हमें अपना दिमाग लगाना होगा, तभी यह पहेली हल हो पाएगी। 
परमार- सर मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा है। आप ही इस पहेली का कुछ हल निकालिए सर। 

भौमिक- अरे, तुम परेशान क्यों हो रहे हो परमार। आराम से। एक काम करो पहले कॉफी मंगाओं फिर देखते है इस पहेली को भी। 
परमार कॉफी मंगा लेता है और दोनों कॉफी पीने लगते हैं। कॉफी पीते हुए भौमिक उस पहेली के बारे में ही सोच रहा था। वह बार-बार खत को देख रहा था और सोचता था। परमार बड़े गौर से भौमिक को देख रहा था। भौमिक कई बार बहुत गहरी सोच में होता तो कभी अचानक मुस्कुरा देता था। ऐसा उसने कई बार किया और परमार उसे देखकर और परेशान हो रहा था। इधर परमार सोच रहा था कि आखिर सर को क्या हो गया है कभी मुस्कुरा रहे है और कभी एकदम से गंभीर हो जाते हैं। आखिर माजरा क्या है। परमार भी उस पहेली को देखता पर उसे उसका कोई हल समझ नहीं आ रहा था। तभी भौमिक कॉफी का कप टेबल पर रखता है और खड़ा हो जाता है। 
भौमिक- परमार एक काम करो जल्दी से गाड़ी निकालो। 
परमार- सर अचानक कहां जा रहे हैं? और ये पहेली का क्या? 
भौमिक- तुम चलो तो सही परमार। रास्तें में बताता हूं तुम्हें। 
(परमार गाड़ी बाहर निकालता है और भौमिक उसमें आकर बैठ जाता है।) 
परमार- कहां जाना है सर? 
भौमिक- अभी तो बस सीधे जाने दो बाकि आगे बताता हूं। 
परमार- जी सर। (और परमार गाड़ी चलाने लगता है और बार-बार भौमिक को देख रहा होता है।) 

भौमिक- परमार आगे देखकर गाड़ी चलाओ। मैं जानता हूं तुम्हारे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं। चलो मैं उन सभी सवालों के जवाब देता हूं तुम्हें। 
परमार- जी सर, जल्दी बताइए। 
भौमिक- उसकी पहेली क्या है परमार। 
पहचान पुरानी ही सही पर औकात अपनी अब भी रखता हूं, 
भूला दिया कई लोगों ने मुझे, पर पहचान अब भी रखता हूं।
कागज की बनावट से कभी मिल जाती थी यादें और रिश्तें, 
अब भी दफन है मुझ में कई बातें और कई रिश्तों के किस्से।
मेरी तारिफ कहीं तुम्हारी यादों में ही गुम है, उन्हें समेट लो, 
दिन तो पांचवां है तुम भी आकर मुझसे यही मिल पर मिल लो।
भौमिक- यहा पहली लाइन का मतलब है कि कोई पुरानी बिल्डिंग पर उसे नाम से जाना जाता है। दूसरी लाइन का मतलब है कि वहां ऐसा कुछ था, जो शायद अब वहां नहीं है या फिर अब उसका उपयोग लोग करते नहीं है। कागज की बनावट से का मतलब हो सकता है खत, जिसमें लोग अपने लोगों को याद करते थे और रिश्तों से मिला करते थे। दफन है रिश्तों के किस्से मतलब कई खत आज भी उसके पास है मतलब कि पोस्टऑफिस हो सकता है, जहां लोगों के खत आया जाया करते थे और कई खत पता बदल जाने के बाद वहीं रह जाते थे। तारिफ का मतलब यही है कि हम पोस्टऑफिस को भूले नहीं है। और पांचवे दिन का मतलब है कि सप्ताह का पांचवा दिन यानि कि शुक्रवार जो आज है और आज चैलेंजर वहां अपने काम के सिलसिले में आने वाला है। यानि कि हमारे शहर के पुराने पोस्टऑफिस के आसपास या वहीं पर वो हमेंं मिलेगा। 
परमार- अरे वाह सर क्या बात है। आपने तो बड़ी जल्दी ही पहेली का हल निकाल लिया। अब उसे पता चलेगा कि आप भी क्या चीज है। 
भौमिक- नहीं परमार मुझे लगता है कि शायद वो जानता है कि मैं इस पहेली का हल निकाल लूंगा और शायद हमारा अगला सुराग हमें वहीं पोस्टऑफिस पर मिलने वाला है। 
परमार- ये आपको कैसे पता सर? 
भौमिक- पक्का तो नहीं कह सकता परमार। पर जिस तरह से यह हमसे खत के माध्यम से बात कर रहा है और पहेली के रूप में सुराग दे रहा है, उससे मुझे लगता है कि यह हमें बहुत अच्छे से जानता है और हमारे लिए हमारा अगला सुराग वहीं छोड़कर गया होगा। 

ये भी क्या शौक है जनाब
ये भी क्या शौक है जनाब 

जो उनके जुल्म सहे तो हम मजलूम नहीं, 
एक आवाज क्या कर बैठे, हम बागी हो गए।
उनके सितम की इंतहा तो किसी ने नहीं देखी,
मेरे कुछ कहने से पहले सब उनसे राजी हो गए।।

उन्हें गुरूर जरूर रहा होगा उनके रूतबे का, 
और गुमान भी होगा उन्हें हमारे पुतले होने का।
अब ये जरूर वक्त ने कोई साजिश ही की है, 
ये भी पल आ गया है अब किरदार बदलने का।।

आज भी उनके रहनुमाओं की कोई कमी नहीं है,
नहीं रखता कोई हिसाब कभी हमारे जख्मों का।
बस वो सही और हम गलत करार दिए गए हैं, 
कभी तुम भी तो करो अहसास मेरे उन लम्हों का।।

मेरी तबीयत से कब उन्हें कभी कोई ताल्लुक हुआ है, 
दिल खाली उनका हाथ भी उस ही वक्त पीछे हुआ है।
खता किसी पर सजा अक्सर मुकर्रर हुआ करती थी, 
जब भी घूमती थी नजर मुझ पर ही रूका करती थी।।

क्या थे वो अल्फाज जिन्होंने मुझे खलनायक बना दिया, 
सितमगर होकर उन्होंने सबको अपना कायल बना लिया।
कभी कितना बेअसर हुआ करता था किरदार मेरा भी, 
आज उन्हें मतलब पड़ा तो कोई अपना सा याद आ गया।।

ये भी क्या शौक है जनाब अपनी शख्सियत बदलने का, 
ये भी क्या किस्सा है अपनों को अपनों से दूर करने का।
गर आप भी रखते थे हमारी आरजू तो अब तक कहां थे
वक्त बीता है, हम तो अब भी वहीं है पहले भी जहां थे।।

तुम कभी तो ताल्लुक रखते मेरे अंदर के किरदार से 
अतरंगी, मनमौजी, बोलती जुबां के खामोश अरमान से।
कभी तो मिलते, कभी बात करते मेरे अंदर के इंसान से,
कभी तो तुम भी बाहर आ जाते अपने ही अभिमान से।।

तुम्हें तो लगता है मुझे देखकर कि मुस्कुरा रहा हूं मैं, 
खोखली हंसी से अपने ही अश्कों को छिपा रहा हूं मैं।
गलत नहीं हूं फिर भी उजाले डरा देते हैं अक्सर मुझको, 
अंधेरे से अंधेरे में ही अपनी मोहब्बत निभा रहा हूं मैं।।

एक ही सुराग

एक ही सुराग 

पार्ट 1


मुंबई-गोवा हाइवे पर एक हवेली में एक डॉक्टर और उसके परिवार की हत्या के मामले को भौमिक ने सुलझा लिया था। बहुत जल्द ही उसे केस का खुलाना करने के कारण उसे पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका था। उसका केस सॉल्व करने का रिकॉर्ड अब भी बरकरार था। उस केस से आगे बढ़ते हुए भौमिक अपने ऑफिस में बैठा कुछ फाइल देख रहा था और परमार भी उसके साथ उसके केबिन में ही था। दोनों कुछ पुराने अनसुलझे केस को लेकर बात कर रहे थे। भौमिक केस को लेकर परमार से जानकारी भी ले रहा था और परमार उसे केस की डिटेल के साथ ही केस में हुई अब तक की जांच के बारे में बताता जा रहा था। इसके साथ ही किसी केस में किसी अपराधी की डिटेल भी भौमिक परमार से ले रहा था। परमार काफी पुराना व्यक्ति था इस कारण उसे अधिकतर केस और उनकी जांच के बारे में जानकारी थी। मुंबई में ही रहते हुए वह काफी अपराधियों और उनके केस और उनके बारे में भी खासी जानकारी रखता था। अगर कहा जाए कि परमार का नेटवर्क काफी मजबूत था और वह कई ऐसी जानकारी अपने भरोसेमंद लोगों से प्राप्त कर लिया करता था, जो कि किसी भी केस के लिए जरूरी होती थी। इनमें कई बार वह अपराधियों के छिपने के साथ से लेकर अपराध में उपयोग में लाए गए हथियार और सुपारी कीलिंग जैसे अपराधों की जानकारी भी निकाल लिया करता था। भौमिक और परमार को उस केबिन में करीब 2 घंटे से ज्यादा का समय हो चुका था। तभी भौमिक ने परमार को कॉफी के लिए कहा। पहले वे दोनों बाहर जाकर कॉफी पीने का मन बना रहे थे, परंतु भौमिक ने बाद में परमार से कहा कि यहीं काफी बुलवा लेते है परमार इस पर परमार भी यस सर कहकर केबिन के बाहर जाता है और बाहर खड़े एक सिपाही को कॉफी लाने का कहकर फिर से केबिन में आ जाता है। कुछ ही देर में एक सिपाही दोनों के लिए कॉफी लेकर केबिन में आता है और कॉफी टेबल पर रखकर चले जाता है। दोनों अपनी कॉफी पी ही रहे होते हैं कि फिर से वहीं सिपाही भौमिक से अंदर आने की इजाजत मांगता है, भौमिक उसे अंदर आने को कहता है। सिपाही के हाथ में एक लिफाफा था, जो वह भौमिक को देते हुए कहता है कि सर यह लिफाफा बाहर पड़ा था और इस पर आपका नाम लिखा था। भौमिक उससे वो लिफाफा लेता है और कहता है कि यह कौन सा तरीका है लिफाफा पहुंचाने का कि बाहर फेंककर चला गया। सिपाही कहता है यह तो पता नहीं सर, अभी जब बाहर गया आपको कॉफी देकर तो इस पर नजर पड़ी। यह एक पत्थर से दबा हुआ रखा था। पता नहीं कब से रखा हुआ है? भौमिक हां में सिर हिलाता है और वह सिपाही फिर से केबिन के बाहर चले जाता है। भौमिक वह लिफाफा टेबल पर रखता है और कहता है कि पहले कॉफी खत्म की जाए उसके बाद इस लिफाफे को खोलेंगे, पता नहीं क्या हो इसमें? और हम अपनी कॉफी भी ठीक से नहीं पी सके। और फिर परमार और भौमिक दोनों हंस पड़ते हैं। कॉफी पीने के बाद भौमिक वह लिफाफा खोलता है तो उसमें उसे एक खत मिलता है। खत पढ़ते हुए भौमिक का चेहरा गंभीर हो जाता है। परमार उसकी ओर देखकर भांप जाता है कि कुछ गड़बड़ है और खत में तभी सर अचानक इतने गंभीर हो गए हैं। भौमिक वो खत पढ़कर टेबल पर रख देता है तभी परमार उससे पूछता है कि सर क्या हुआ? ऐसा क्या लिखा है खत में कि आप इतने गंभीर हो गए। भौमिक परमार से कहता है कि तुम खुद ही पढ़ लो परमार। परमार वो खत उठाता है और पढ़ना शुरू करता है।

डियर एसीपी साहब, 
सबसे पहले तो मैं आपको बधाई देना चाहता हूं कि आपने डॉक्टर और उसके परिवार की हत्या का केस बहुत जल्दी ही सॉल्व कर लिया। वाकई इतने उलझे हुए केस को इतनी जल्दी सिर्फ आप ही सॉल्व कर सकते थे। वैसे आपके हाथ में आए सभी केस आपने सॉल्व किए हैं, परंतु यह केस वाकई में बहुत अलग था और आपने अपनी समझबुझ से आखिरकार उसे सॉल्व कर ही दिया। वैसे खत पढ़ते हुए आपके मन में सवाल तो आ रहा होगा कि खत लिखने वाला मैं कौन हूं और यदि बधाई ही देना थी तो सामने आकर क्यों नहीं दी? मेरा नाम जानने के लिए आपने खत लिखने वाला का नाम भी देखा था, पर वहां तो लिखा ही नहीं है। वैसे मेरा नाम जानना जरूरी नहीं है, जरूरी यह है कि यह खत मैंने लिखा क्यों है? तो बिना देर किए मैं आपको बता देता हूं कि यह खत मैंने लिखा क्यों है? तो एसीपी साहब कुछ दिनों से आपका शहर बहुत शांत है जो मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। अखबारों में भी कोई सुर्खियां नहीं आ रही है। इसलिए अब मैं आपके शहर को कुछ अशांत करने जा रहा हूं। अब आपके शहर में कुछ ऐसा होने वाला है, जिससे पूरा मुंबई हिल जाएगा। मैं इस शहर में कुछ ऐसा करूंगा कि आप भी मुझ तक पहुंच नहीं पाएंगे। आप इसे चुनौती के रूप में भी ले सकते हैं, वैसे लेना क्या मैं तो खुद आपको चैलेंज करता हूं अगर मुझे रोक सकते हो तो रोक लो। 
एक बात और आपको बता देना चाहता हूं, मैं जो करने वाला हूं उसके लिए मैं आपको एक महीने का समय देता हूं। इस एक महीने में अगर आप मेरी पहचान कर सको तो बहुत अच्छा होगा, क्योंकि यदि आप मुझ तक पहुंच गए तो फिर आपका शहर शांत ही रहने वाला है और अगर नहीं पहुंच पाए तो कुछ तो होगा ही। वैसे आपकी कुछ मुश्किल मैं आसान भी किए देता हूं। इस एक महीने के दौरान मैं अपने उस काम के सिलसिले में जहां भी जाउंगा उसकी खबर आप तक पहुंचा दूंगा, अगर आप मुझे पहचान सके और यह आपके लिए अच्छा होगा। एक महीने के बाद जो भी शहर में होगा उसकी भी जानकारी आपको देता रहूंगा ताकि आप मेरा चैलेंज पूरा कर सके। अब देखते है कि आप मुझ तक पहुंचते हैं या मैं अपने काम को अंजाम देकर निकल जाउंगा और आप मेरा कुछ नहीं कर पाएंगे। अब आप मुझे किस नाम से बुलाएंगे यह तो मैं नहीं जानता पर हां मैं खुद को एक नाम दे रहा हूं वो भी सिर्फ आपके लिए। 
आपका अपना चैलेंजर


परमार- सर, कौन है ये, जो आपको चैलेंज कर रहा है? 
भौमिक- अभी तो मुझे भी कुछ नहीं पता है परमार। पर शायद इसका पता जल्द ही लगाना होगा। 
परमार- पर कैसे सर? इसने तो ऐसा कोई पहचान भी नहीं बताई है। 
भौमिक- हां, पर बता देगा। 
परमार- कैसे सर? ये लेटर भी उसने कम्प्यूटर पर टाइप कर भेजा है। राइटिंग से भी इसकी पहचान नहीं हो सकती है। लिफाफे पर भी कुछ नहीं लिखा है, सिर्फ आपके नाम की चिट लगी है और कुछ भी नहीं है। 
भौमिक- परेशान क्यों हो रहे हो परमार? उसने हमें एक महीने का समय दिया है ना और ये भी कहा कि उसे पकड़ने के लिए वह खुद ही हमें सुराग देगा। जब सुराग देगा तब हम उसे दबोच लेंगे। 
परमार- पर सर क्या आपको लगता है कि ये लेटर सही है? मतलब क्या वाकई एक महीने में बाद शहर में कुछ होने वाला है? 
भौमिक- ये तो वक्त ही बताएगा परमार। पर एक बात जो मुझे लग रही है वह यह है कि जिस तरह से इसने लेटर लिखा है यह अपने आप को बहुत चालाक समझता है। यह शायद खुद को साबित करना चाहता है। इसलिए इसने हमें सुराग देने के साथ ही उसे पकड़ने का चैलेंज दिया है। 
परमार- शायद ये हो सकता है सर। 
भौमिक- ये भी हो सकता है परमार कि एक महीने बाद कुछ हो ही नही। ये बस हमें अपने पीछे घुमाना चाहता है। 

तभी भौमिक के ऑफिस के फोन की घंटी बजती है और भौमिक फोन उठाता है। दूसरी ओर से किसी अखबार से फोन था और वे लोग उसे चैलेंज के बारे में ही भौमिक से पूछ रहे थे। भौमिक जांच करने की बात कहकर फोन रख देता है। 
भौमिक- अब मुझे लग रहा है कि ये इंसान जो भी है ये कुछ करने वाला है। 
परमार- ऐसा क्यों लग रहा है सर आपको? 
भौमिक- तुमने देखा नहीं परमार। ऐसा ही लेटर उसने सारी मीडिया को भी पहुंचाया है। वो हमें सीधे चैलेंज कर रहा है। 
परमार- मैं समझा नहीं सर।
भौमिक- परमार अगर इसे कुछ नहीं करना होता तो यह लेटर सिर्फ हमारे पास आता ताकि हम परेशान हो। पर इसने ऐसा ही लेटर मीडिया को भी पहुंचाया है, इसका मतलब यह है कि यह खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा है। मीडिया के सामने यह हीरो बनना चाहता है। 
परमार- फिर तो यह बहुत खतरनाक हो सकता है सर। 
भौमिक- हां, परमार। इसलिए हमें इसे सीरियस लेना होगा। इसके साथ ही इसका दूसरा लेटर या जैसा इसने कहा कि सुराग देगा उस पर हमें तत्काल एक्शन भी लेना होगा। 
परमार- पर सर इसका इरादा क्या होगा? ये करना चाहता है? 
भौमिक- ये तो अभी कहना मुश्किल है परमार, पर लगता है जो कुछ भी होगा बड़ा होगा। या कुछ ऐसा होगा, जिससे शहर को प्रभावित किया जा सके। 

ये नादांनियां, ये गुस्ताखियां
ये नादांनियां, ये गुस्ताखियां 

शायद हमसे ही सीखे थे इश्क ए जहान की ये नादांनियां, 
पर हमने तो नहीं सिखाई थी मोहब्बत में ये गुस्ताखियां।
क्यों दो दिलों में बन गई है बेवजह की गलतफहमियां, 
जो पास थे, क्यों बन गई है दूरियां आज उनके दरमियां।।

हमने सिखाया निभाया जाता मोहब्बत को मोहब्बत से, 
हमने बताया मोहब्बत मिलती है मोहब्बत को मोहब्बत से।
गर निभाओगे तो निभ भी जाएगी मोहब्बत मोहब्बत से, 
हम साथ हुए तो कट जाएगी जिंदगी भी मोहब्बत से ।।

तुम, मैं, दिल, प्यार कहने को तो बस ये अल्फाज हैं, 
इन सबसे बने हम, यहीं एक तो मोहब्बत की पहचान है।
हमने तो सिखाया था दिल के लिए तु ही एक जहान है, 
तेरी खामोशियों अब भी उठता दिल में कोई तूफान है।।

मोहब्बत के जहान में हमने तुम्हें मोहब्बत ही सिखाई थी, 
बदल दस्तुर जहां का इसमें तिजारत कहां ले आई थी।
मोहब्बत की दुनियां साथ हमने मोहब्बत से ही बनाई थी, 
रोशन जहान ए इश्क पर कैसी ये फरेब की परछाई थी।।


मैंने तो नहीं सिखाई थी कभी मोहब्बत निभाने शर्तों की बातें, 
मैंने तो नहीं सिखाया था किसी का दिल तोड़कर यूं ही चले जाना।
न ही मैंने सिखाया था कभी तुम्हें अपने को पल में पराया बनाना,
दिल तोड़ना, झूठ बोलना, बेरूखी दिखाना और कोई बहाना बनाना।।

दिलों से खेलने का हुनर तो मुझे आज भी नहीं आता है, 
आंखों में अश्क लेकर मुस्कुराना भी नहीं आता है।
मोहब्बत में हर प्रेमी, हर दिल मासूम ही नजर आता है, 
पता नहीं कौन तुम्हें मोहब्बत में शातिर बना जाता है।।

बेमतलब की मोहब्बत में तुम कहां से मतलब ले आए हो, 
धड़कते दिल को कैसे तुम पत्थर में तब्दील कर आए हो।
हमसे दूर रहकर जी लोगे कैसे आंखों में ख्वाब लाए हो, 
मोहब्बत में बेवफाई की अदा कहां से सीखकर आए हो।।

कुछ हमसे सीखे हो, अब कुछ तुम खुद ही सीख चुके हो,
साथ हमारे अब तो तर्जुबा-ए-मोहब्बत तुम कर चुके हो।
जो हमसे सीखे हो कभी उसकी भी आजमाइश कर लेना,
गर फिर हो तुम्हें मोहब्बत तो किसी शर्त पर मत करना।।

मत कर जिक्र

मत कर जिक्र 

मत कर जिक्र ए जमाने वफाओं का, 
हमने बेवफाओं की बेवफाई से वफा देखी है।
चंद सिक्के क्या खनक उठे, 
हमने बदलते रिश्तों की सच्चाई देखी है।।

कैसे बदलता है वक्त धीरे-धीरे, 
ये अफसोस भी तुम ही कर लो साहेब। 
हमने तो एक पल में ही यहां पर, 
चेहरों से सैकड़ों नकाब उतरते देखे हैं।।
क्या सच, क्या शर्मिंदगी, क्या बेहयाई है, 
जिसकी जैसी सोच है, वैसी ही सीरत पाई है।
तुम ही तोल लो शब्दों को इमान के वजन से, 
हमने तो काला सच और सफेद झूठ भी देखे हैं।।

ना बात करो साथ की, ना करो विश्वास की, 
ना किस्सा हो दोस्ती का, ना किस्सा रिश्तों का।
तुम बना रखों इनमें वजूद अपना, 
हमने तो दोस्ती में भी किरदार बदलते देखे हैं।।
तुम कर लो एतबार किसी से प्यार कर, 
और बदल भी दो जहां, कुछ असर कर।
हम नहीं इश्क से खुद को बदलने वाले,
हमने भी देखे है मतलब से प्यार करने वाले।।

क्या रंग और क्या कायनात की बात हो, 
कौन अपना और किसका यहां साथ हो।
तुम महसूस कर लो हर मौसम का समां,
हमने तो बहारों में भी पत्ते गिरते देखे हैं।। 

चाहो तो मिटा लो हस्ती किसी के वास्ते, 
एक जिंदगी के लिए चाहे बना दो रास्ते।
जिक्र में बसा देना चाहे किसी के लिए फूलों के गुलिस्तां, 
हमने तो अपनों के हाथ में भी खंजर देखे हैं।।

अब समझ नहीं आता फर्क उजले और काले में, 
कत्ल भी हो जाते हैं अब दिन के उजाले में।
दिल के जज्बात और मुंह की जुबां अब तुम समझों, 
हमने तो उजले कपड़ों में भी मन के काले देखें हैं।।
जो चाहे लगा लो कीमत अपने किरदार की, 
चाहे आजमा लो हैसियत अपने ही खरीदार की।
गर कर सको करना अदा जरूरत इंसान की, 
वरना हमने जरूरत में बिकते कई जिस्म भी देखे हैं।।

दे सको तो देना खुशियां और मुस्कान किसी को, 
और देना वजह खिलखिलाने की किसी को।
कभी करना ख्याल किसी की एक मुस्कुराहट का,
वरना हमने एक हंसी के पीछे आंसूओं के सैलाब देखे हैं।। 

तुम भी तो महसूस करके देखो
तुम भी तो महसूस करके देखो 

ये शायद उसकी बेरूखी का ही तो असर हो रहा है,
उसकी ही यादों से रोशन मेरा हर सवेरा हो रहा है।
कभी शाम होती है तो कभी रात भी घेरा जाती है,
मेरे चारों ओर यादों का घना कोहरा हो रहा है।।

जब कभी बैठता हूं तन्हा तो ये अक्सर मुझे घेर लेती है, 
लगता है ऐसे जैसे तेरी बाहें मुझे खुद में समेट रही है।
कभी तो गुनगुनी सी धूप, कभी मौसम सर्द हो रहा है,
तेरे ही प्यार का अब भी मुझ पर असर हो रहा है।।

जाने कितने ही रंगों की जुबानी, तेरी यादों की कहानी है, 
कभी तुफां, कभी सुकुन तो कभी तेरी मोहब्बत रूमानी है।
 मन करता है बन जाउं एक परिंदा और तुमसे मिल लूं, 
 तेरे दिल के पिंजरे में इसे हमेशा के लिए बंद कर लूं।।

 बन जाउं वो शाम जब तुम मेरे साथ हुआ करती थी, 
कभी बन जाउं वो रात, जब हमारी बातें हुआ करती थी।
अक्सर उस वक्त के थमने की मैं बस दुआ मांगता था, 
उस वक्त जब तेरी बाहों का मुझे सहारा मिला करता था।।

मैं बन जाउं फूल की डाली भी, जिसे देख तू ललचाती थी, 
तोड़ लाने का मुझे कहने के लिए जरा ना हिचकिचाती थी।
फिर चल दूं उस राह पर, जो मुझे तेरी ओर ले आती थी, 
तुम ही हो मेरी मंजिल, जो मुझे दूर से दिखला देती थी।।

तेरी ही यादों में मैं बस जाना और खो जाना चाहता हूं, 
कभी प्यार, कभी तकरार, कभी अश्क बन जाना चाहता हूं।
होगी कमियां मुझ में भी, पर भूल जा, ये इल्तजा है मेरी, 
फिर पकड़ ले हाथ मेरा, मैं तेरे साथ चलना चाहता हूं।।

बहुत खूब है यादें, तुम भी तो महसूस करके देखों, 
कभी जी कर देखों तो कभी यादों में खोकर देखों।
ये यादें ही तुम्हें भी बहुत कुछ याद दिला देगी, 
कुछ पल बैठों तन्हा और यादों को याद करके देखों।।

कैसे यादों के तुफां को तुमने अब तक रोका है, 
खुश हो तुम ये सोचना बस एक रंगीन धोखा है।
खो जाओं अपनी बातों में देखो कौन सा अक्स बनता है, 
फिर से बन जाओ मेरे अब भी तुमको किसने रोका है।।

तुम बन जाओ मेरी आवाज, मुझे फिर से गुनगुनाने दो,
सीने लगा लो मुझको, मुझको कुछ देर मुस्कुराने दो।
शब्दों की सहरी से फिर मुझको साज कोई बनाने दो, 
तुम बन जाओ गीत मेरे, कोई संगीत मुझे बनाने दो।।

या जी लो मेरी जिंदगी बस इतना ही काफी होगा,
जब मिलेगा ना सुकूं और दर्द भी नाकाफी होगा।
मैं तो जिंदा हूं यादों से, कैसे तुम इतना सोचोगी, 
बस हो जाओ थोड़ा तन्हा, तुम भी तेरी यादों में डूबोगी।।