बेताल The Silent Killer चौथा भाग
बेताल The Silent Killer चौथा भाग
बेताल The Silent Killer तीसरा भाग
परमार- सर, सर लगता है यह कातिल हमें बैठने नहीं देगा।
भौमिक- हम बैठेंगे तो यूं भी नहीं परमार। पर तुम इस तरह यहां क्या बात है?
परमार- सर, तीन और लड़कियां...
परमार की यह बात सुनते ही भौमिक उठकर खड़ा हो जाता है।
भौमिक- क्या एक साथ तीन?
परमार- नहीं सर तीन अलग-अलग जगह पर तीन लड़कियां। तीनों ही कत्ल में एक-एक दिन का अंतर है बस जानकारी आज मिली है।
भौमिक- ओह, परमार यह केस तो बिगड़ता ही जा रहा है। लगता है है इस कातिल को जल्द से जल्द पकड़ना होगा, वरना पता नहीं और कितनी लड़कियां....
परमार- जी, सर।
तभी भौमिक के ऑफिस के बाहर से शोर आता है और भौमिक परमार को बाहर देखने के लिए भेजता है। परमार आकर बताता है कि मीडिया के लोग है और शहर में लगातार हो रहे कत्ल को लेकर आपसे बात करना चाहते हैं। भौमिक मीडिया से बात करने के लिए बहर आता है। भौमिक के बाहर आते ही मीडिया के लोग उस पर सवालों की बौछार कर देते हैं।
भौमिक- देखिए मैं जानता हूं कि शहर में हो रहे कत्ल को लेकर आप सभी के पास कई सवाल है। फिलहाल मैं इन कत्ल के बारे में सिर्फ इतना कह सकता हूं कि पुलिस अपना काम कर रही है और जल्द ही हम कातिल को सलाखों के पीछे लेकर आएंगे। आप लोग भी शांति बनाकर रखे और हो सके तो पुलिस का सहयोग करें और पुलिस को अपना काम करने दें। बस इससे ज्यादा मैं आपको कुछ नहीं कह सकता हूं।
इतना कहने के बाद भौमिक फिर से अपने ऑफिस में आ जाता है। वह फिर से केस के बारे में सोचने लगता है। शहर में अब तक पांच लड़कियों की हत्या हो चुकी थी। यह भी तय हो गया था कि यह कोई सीरियल किलर ही है, जो हत्या कर रहा है।
भौमिक- परमार कातिल बहुत चालाक है। हमारे लिए एक भी सुराग छोड़कर नहीं गया है। इसलिए हमें कुछ और सोचना होगा इसे पकड़ने के लिए।
परमार- पर क्या सर? कैसे पकड़ेंगे कातिल को? हमें तो यह भी नहीं पता कि उसका अगला शिकार कौन होगा।
भौमिक- पकड़ेंगे परमार, इसे भी जरूर पकड़ेंगे।
भौमिक अभी परमार से केस को लेकर बात कर ही रहा होता है कि उसके ऑफिस में रखे फोन की घंटी बत उठती है। वह फोन उठाता है। दूसरी ओर से कमिश्नर उससे बात करता है और उससे कहता है कि उसे इस केस में जल्द से जल्द रिजल्ट चाहिए। भौमिक भी यस सर कहते हुए फोन रख देता है।
भौमिक- परमार, इस केस ने पुलिस को हिलाकर रख दिया है। मीडिया भी हमारे पीछे पड़ गई है।
परमार- हां, सर। पर कातिल को पकड़े कैसे? उसके बारे में कोई सुराग कोई जानकारी भी तो नहीं है हमारे पास।
भौमिक- परमार कहते हैं कि जब कोई सुराग न मिले तो एक बार फिर शुरू से शुरू करना चाहिए। चलो शिराली के घर चलते हैं, वहां से ही शुरूआत करते हैं।
परमार- ठीक है सर, जैसा आपको ठीक लगे।
भौमिक- परमार तुम एक काम करो मैं सभी घटना स्थल पर होकर आता हूं, तब तक तुम सभी जगह के सीसीटीवी फुटेज मंगाओं और उन्हें खंगाल डालो। हो सकता है कि सीसीटीवी से ही हमें कोई सुराग मिल जाए। अगर एक भी सुराग हमारे हाथ लग गया तो फिर कातिल को मुझसे कोई नहीं बचा पाएगा।
परमार- ठीक है सर। मैं अभी सारे फुटेज मंगा लेता हूं।
भौमिक- परमार सभी लड़कियों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मंगा लो और एक बार उसे भी बहुत ध्यान से देखना। मैं तब तक घटना स्थल पर एक बार फिर से देखकर आता हूं।
इतना कहने के बाद परमार और भौमिक दोनों ही उसके ऑफिस से निकल जाते हैं। परमार जहां सभी घटना स्थल के फुटेज जुटाने में लग जाता है, वहीं भौमिक एक-एक कर सभी घटना स्थल पर जाकर एक बार फिर से सभी चीजों को बहुत ध्यान से देखता है। हालांकि उसे पांचों ही जगह पर ऐसा कुछ नहीं मिलता, जिससे कि उसे कातिल के संबंध में कोई सुराग मिल सके। वह समझ जाता है कि कातिल बहुत ही चालाक है और पुलिस के लिए किसी भी प्रकार का कोई सुराग छोड़कर नहीं गया है। उसे अब बहुत गुस्सा आ रहा था कि कातिल को आखिर पकड़े तो पकड़े कैसे? इसी सोच के साथ वह पांचवे घर को देख रहा होता है। घर के आसपास वह सीसीटीवी की लोकेशन देखता है। उसे घटना स्थल से कुछ दूर के एक पुराना सा घर दिखाई देता है, वह उसकी ओर बढ़ जाता है। उसे आश्चर्य तब होता है जब उस पुराने घर पर भी एक सीसीटीवी फुटेज लगा हुआ मिलता है। वह उसे घर की ओर बढ़ जाता है। वहां जाकर वह देखता है कि घर पूरी तरह से खाली है। वह अंदर जाता है, आवाज भी लगाता है, पर वहां कोई जवाब नहीं देता है। वह सीसीटीवी के फुटेज को तलाशने लगता है। एक कमरे में उसे एक कम्प्यूटर मिलता है और उससेक वह पिछले कुछ दिनों का फुटेज कॉपी कर लेता है। वह जैसे ही बाहर निकलता है वहां एक चौकीदार आ जाता है। चौकीदार उसे बताता है कि यह एक पुराना मकान है, जिसकी वह चौकीदारी करता है। इसके मालिक विदेश में रहते हैं। भौमिक चौकीदार से पूरी जानकारी लेकर फिर से अपने ऑफिस के लिए निकल जाता है। ऑफिस में पहुंचने पर वह परमार से बात करता है।
भौमिक- परमार पांचों घर में होकर आ गया, पर सुराग के नाम पर एक बाल भी नहीं मिला है।
परमार- सर मैंने भी सीसीटीवी फुटेज खंगाल लिए हैं, परंतु उसमें भी कहीं कुछ भी ऐसा नजर नहीं आया, जिस पर शक भी किया जा सके।
भौमिक- परमार ये कैसा कातिल है, जो इतनी सफाई से काम कर रहा है। सबसे बड़ी बात वह लड़कियों को इतना तड़पाता है, फिर भी आसपास के लोगों को किसी प्रकार की कोई आवाज नहीं आती है। क्या वह कहीं और कत्ल करता है और फिर लाश को लाकर उनके घर में ही उल्टा लटका देता है। पर अगर वह लाश को लेकर आता है तो कोई तो उसे देखेगा ही, क्योंकि इतनी बड़ी लाश को लेकर आना, फिर घर के अंदर ले जाना कोई आसान काम तो नहीं है।
परमार- जी, सर। यह तो है। पर वह जो कोई भी है, बहुत शातिर है और अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहा है।
भौमिक- पोस्टमार्टम रिपोर्ट्र से कुछ पता चला परमार?
परमार- नहीं सर, लगभग सभी एक जैसी ही है। टॉर्चर, रेप, हत्या।
भौमिक- अब क्या करें परमार? इस कातिल को कैसे पकड़े इसका तो कोई सुराग ही नहीं मिल रहा है।
परमार- मैं भी काफी देर से यही सोच रहा था सर, पर कुछ समझ नहीं आ रहा है।
ऑफिस में दोनों ऐसे ही केस को लेकर बात करते रहते हैं और फिर रात हो जाने के बाद दोनों अपने घर के लिए निकल जाते हैं। घर पहुंचने के बाद भी भौमिक के दिमाग में केस की ही बातें चल रही थी। तभी उसे उस पुराने घर से लिए गए फुटेज की याद आती है और वह अपने लैपटॉप में उस फुटेज को देखने लगता है। कम से कम दो से तीन बार तक वह फुटेज देखता है और फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है। अगले दिन वह अपने ऑफिस आता है, तब तक परमार भी ऑफिस आ चुका होता है।
भौमिक- अब तुम्हें एक काम करना है परमार।
परमार- क्या सर?
भौमिक- पहले तुम ये फुटेज देखो।
परमार- वह फुटेज देखता है इसमें क्या है सर?
भौमिक- अरे, तुम्हें कुछ नजर नहीं आया?
परमार- नहीं सर, इसमें तो कुछ भी नहीं है।
इसके बाद भौमिक और परमार दोनों एक साथ वह फुटेज देखते हैं और फिर दोनों ही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं।
भौमिक- अब तुम्हें समझ आ गया होगा परमार कि तुम्हें क्या करना है?
परमार- जी सर बिल्कुल समझ गया। मैं अभी से काम पर लग जाता हूं।
इतना कहने के परमार वहां से चला जाता है। भौमिक भी एक बार से फुटेज देखने लगता है। भौमिक जो फुटेज देख रहा था, उसमें उन्हें एक ऐसा आदमी नजर आता है, जो कि छुपकर वहां से भागने की कोशिश कर रहा था। शायद उसे आदमी को भी उस मकान में लगे सीसीटीवी कैमरे के बारे में नहीं पता था। इस कारण वह जेब से कुछ चीज निकालकर घर के पास घनी झाड़ियों में फेंक देता है। परमार उसी चीज को खोजने के लिए वहां गया था। इसके साथ परमार वहां उस आदमी के पैरों निशान भी खोजेगा, जिससे उस कातिल के बारे में कुछ जानकारी पुलिस को मिल सके।
बेताल The Silent Killer दूसरा भाग
बेताल The Silent Killer पहला भाग
भौमिक आज जब ऑफिस पहुंचा तब ही से उसका मन कुछ ठीक नहीं था। वह खुद में एक बैचेनी सी महसूस कर रहा था। ऑफिस में आने उसे अभी केवल दो ही घंटे हुए थे, पर वह अब तक चार बार कॉफी पी चुका था। आमतौर पर वह इतनी कॉफी नहीं पीता है, पर उसे महसूस होने वाली बैचेनी को कम करने के लिए वह ऐसा कर चुका था। उसे लब रहा था कि आज कुछ ऐसा होने वाला है जो ठीक नहीं है। तभी परमार उसके केबिन में आता है। वह भौमिक को सेल्यूट करता है। भौमिक भी सिर्फ सिर हिलाकर उसका अभिवादन करता है।
भौमिक- हां, परमार बताओ क्या खबर लाए हो ?
परमार- सर आपको कैसे पता चला कि मैं कोई खबर लाया हूं?
भौमिक- तुम पहले खबर बताओ क्या हुआ है?
परमार- सर, सूचना आई है कि अभिरंग कॉलोनी में एक घर में हत्या हो गई है।
भौमिक- मुझे लग ही रहा था कि आज कुछ होने वाला है। तुम वहां जाकर देखो क्या मामला है जरूरत पड़े तो मुझे कॉल कर देना।
परमार- जी सर। परमार फिर से सेल्यूट कर वहां से चला जाता है।
इस बीच भौमिक एक बार फिर कॉफी मंगाता है और अपनी चेयर पर बैठकर पीने लगता है। करीब 30 मिनट ही बीते होंगे कि भौमिक के मोबाइल की रिंग बजती है। परमार का कॉल होता है और भौमिक फोन उठाकर बात करता है।
भौमिक- हां, परमार बताओ क्या सीन है वहां ?
परमार- सर, मुझे लगता है कि आपको यहां आ जाना चाहिए।
भौमिक- क्यों ऐसा क्या हो गया है, जो तुम नहीं संभाल सकते?
परमार- सर जो मैं देख रहा हूं वह आपको भी देखना चाहिए।
भौमिक- ठीक है आता हूं, तुम मुझे वहां पता सेंड कर दो।
परमार- जी, सर अभी करता हूं।
परमार भौमिक को घटना स्थल का पता सेंड करता है और भौमिक अपनी जीप में वहां के लिए रवाना हो जाता है। कुछ ही देर में वह घटना स्थल पर पहुंच जाता है। उसके जीप रोकते ही परमार दौड़कर उसके पास आ जाता है।
भौमिक- तो परमार ऐसा क्या हो गया, जो तुमने मुझे यहां बुला लिया ?
परमार- आप खुद ही देख लिजिए सर। फिलहाल मैं कुछ कह नहीं सकता।
परमार के इतना कहने के बाद दोनों आगे बढ़ जाते हैं। अभिरंग कॉलोनी में यह एक घर था, जिसमें तीन बेडरूम, एक बड़ा सा हॉल नीचे की ओर बने थे। इतना ही दूसरी मंजिल पर भी बना था। देखने में यह किसी बड़े व्यक्ति का बंगला सा नजर आ रहा था। घर के पीछे की ओर एक गार्डन भी था, वह भी खासा बड़ा था। गार्डन में कई पेड़ भी लगे थे, साथ ही फूलों के कई पौधे लगे थे, जो कि गार्डन को और भी खूबसूरत बना रहे थे। गार्डन के बीचो बीच एक झूला भी था। घर को देखकर लग रहा था कि यहां कोई कभी कभी ही आता था। हालांकि यह सभी सुख सुविधाएं मौजूद थी। परमार और भौमिक जैसे ही घर में प्रवेश करते हैं, एक मिनट के लिए भौमिक रूक जाता है, क्योंकि घर के फर्श पर चारों ओर खून ही खून फैला पड़ा था। घर का काफी सारा सामान बिखरा पड़ा था। भौमिक को यह सब देखकर समझ आ गया था कि हत्या के पहले यहां काफी जद्दोजहद हुई है। मरने वाले ने खुद को बचाने का काफी प्रयास किया है। हालांकि उसके मन मे एक विचार यह भी आ रहा था कि हो सकता है कि यहां चोरी के इरादे से कोई आया हो, किसी के अचानक आ जाने पर हत्या हुई हो? हालांकि ये सब अभी उसके कयास ही थे, जांच के बाद ही पूरी बात सामने आना थी। इसके बाद परमार और भौमिक अन्य कमरों में भी जाते हैं, वहां भी लगभग यही हाल था।
भौमिक- ये सब दिखाने के लिए तुमने मुझे यहां बुलाया था परमार? यह सब तो तुम मुझे ऐसे भी बता सकते थे?
परमार- सर जो दिखाने के लिए मैंने आपको यहां बुलाया है वह घर में नहीं घर के बाहर बने गार्डन में हैं। आइए वहां चलते हैं।
इसके बाद दोनों घर के पीछे की ओर बने गार्डन की ओर जाते हैं। गार्डन में जाते ही भौमिक की आंखे खुली की खुली रह जाती है। गार्डन का सीन देखने के बाद उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से रिएक्ट करे। गार्डन में जो वह देख रहा था, शायद उसने आज तक नहीं देखा था और वह मन ही मन सोच रहा था कि ऐसा वह दोबारा न देखे तो अच्छा होगा। गार्डन में यूं तो कई पेड़ थे। एक पेड़ पर एक 22 से 25 साल की लड़की की लाश को उलटा कर टांगा गया था। उसके गले को रेता गया था, मरने से पहले वह काफी तड़पी भी होगी, यह लाश को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था। उसके दोनों पैर पेड़ की एक टहनी पर थे और बाकि पूरा शरीर हवा में लटक रहा था। लाश गिरे नहीं इसके लिए कातिल ने उसके पैरों को रस्सी से बांध दिया था। लड़की के शरीर पर कई घाव भी थे, जिन्हें देखकर लग रहा था कि उसे मारने से पहले काफी पीटा गया होगा।
भौमिक- ओह माय गॉड, ये कातिल है या कोई जल्लाद है? लाश के साथ कोई ऐसा सलूक करता है क्या?
परमार- यही तो आपको दिखाना चाह रहा था सर। इस कारण मैंने आपको कॉल किया और आपके आने तक यहां किसी को कुछ भी छुने नहीं दिया है।
भौमिक- परमार, सब देखने के बाद मुझे दो बातों की संभावना नजर आ रही है। कातिल या तो इस लड़की से हद से ज्यादा नफरत करता था या फिर कातिल पागल है।
परमार- जी, सर। पह अब क्या करना है?
भौमिक- करना क्या है परमार वहीं करो जो हमेशा करते हो। लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजो। फॉरेंसिक टीम को बुलाओ, हर सबूत उठाओ। देखों सबूत के तौर पर कुछ मिलता है क्या? ये लड़की कौन है? यहां क्या कर रही थी? ये यहां अकेली थी या इसके साथ कोई और भी था? अगर था तो वा ेअब कहां है? कुछ भी छूटना नहीं चाहिए।
परमार- जी, सर ये सब तो मैंने पहले ही कर दिया है। बस आपने यह सीने देख लिया है तो लाश को भी पोस्टमार्टम के लिए भिजवा देता हूं। फॉरेंसिक टीम भी आकर अपने काम में लग गई है। फोटोग्राफर से हर कोने का फोटो लेने के लिए कह दिया है। लड़की की पहचान के लिए कुछ लोगों को भेज दिया है। सीसीटीवी कैमरे भी तलाश कर रहे हैं।
भौमिक- ओके वैरी गुड परमार।
इसके बाद भौमिक अपने ऑफिस के लिए रवाना हो जाता है। जैसा कि उसकी आदत है कि केस सामने आने के बाद वह उस केस के बारे में सोचने लगता है। ऑफिस आने के बाद वह हमेशा की तरह इस केस के बारे में भी सोचने लग गया था। उसके दिमाग में गार्डन का चित्र बार बार आ रहा था। वह सोच रहा था कि आखिर एक लड़की से किसी ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती है कि उसे इतनी बुरी तरह से टार्चर करने के बाद मारा जाए और फिर उसे पेड़ पर उल्टा लटका दिया जाए। वह हर ऐंगल से केस के बारे में सोच रहा था। करीब 3 घंटे के बाद परमार उसके केबिन में आ जाता है।
परमार- सर सारी कार्रवाई कर दी है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कल शाम तक मिल जाएगी। वही फॉरेंसिक की टीम भी अपनी रिपोट्र करीब 4 दिन में हमें दे देगी।
भौमिक- सोचते हुए हम्म।
परमार- आपको क्या लगता है सर ये हत्या किसी नफरत का नतीजा है?
भौमिक- वहीं सोच रहा हूं परमार। पर क्या कोई किसी से इतनी नफरत कर सकता है। वैसे मुझे इस केस में कुछ ओर ही एंगल नजर आ रहा है। ये नफरत नहीं कुछ और ही है।
परमार- मतलब सर?
भौमिक- बस ये मतलब ही तो समझ नहीं आ रहा है परमार।
दोनों इसी तरह केस के बारे में बात करते रहते हैं। हालांकि उनकी जांच फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक की रिपोर्ट पर टिकी थी, इस कारण दोनों ऑफिस में ही केस को लेकर बात कर रहे थे। तभी एक सिपाही भौमिक के केबिन में आता है और उसके टेबल पर एक लिफाफा रखकर चला जाता है। लिफाफे में उस घर के आसपास के सीसीटीवी फुटेज की एक सीडी थी। भौमिक इशारे में परमार को वह सीडी प्ले करने के लिए कहता है। परमार भी लिफाफे से सीडी निकालकर लैपटॉप में प्ले करता है।
मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : आखिरी पार्ट
अब तक आपने पढ़ा...
श्लोक जो तीन साल से कुछ नहीं बोला हैं। कई मनोचिकित्सक उसका इलाज करने या उससे बात करने के लिए जा चुके हैं, परंतु कई प्रयास के बाद भी वे उससे एक शब्द नहीं बुलवा सके हैं। इसके बाद पारूल, जो कि खुद एक मनोचिकित्सक है उसे यह केस सौंपा जाता है। पारूल के भी एक माह तक लगातार प्रयास करने के बाद आखिरकार श्लोक उससे बात करता है। मरीचिका, लोग, रिश्ते ऐसे ही कई बातें उन दोनों के बीच होती है। इन बातों के दौरान ही पता चलता है कि दोनों एक-दूसरे बहुत अच्छे जानते हैं। दोनों एक समय एक-दूसरे से प्यार भी किया करते थे, परंतु एक दिन पारूल में आए बदलाव के कारण दोनों का रिश्ता टूट जाता है। अब आगे...
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पारूल की बेरूखी ने श्लोक को अंदर से तोड़कर रख दिया था। उसके मन में कई सवाल थे, जो वह पारूल से पूछना चाहता था, परंतु पारूल उसके किसी सवाल का जवाब नहीं देती थी। उन दोनों के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही थी। श्लोक अपने सवाल के साथ चुप था और पारूल कुछ न कहने के लिए खामोश। श्लोक की चुप्पी उस पर इस कदर हावी हुई वह खुद को अंदर से टूटा महसूस करने लगा और फिर उसकी नौकरी भी चली गई और वह अपने परिवार से भी दूर हो गया। श्लोक ने बहुत ही शिद्दत से पारूल को प्यार किया था, परंतु पारूल में अचानक आए इस बदलाव के कारण वह पूरी तरह से बिखर गया था। कहते ही डूबते को तिनका सहारा ही बहुत होता है, परंतु श्लोक को ऐसा कोई सहारा नहीं मिला। शायद वह संभल जाता यदि पारूल उससे एक बार बात करती। अगर उसकी कोई मजबूरी थी, श्लोक की कोई बात उसे बुरी लगी थी, श्लोक में अचानक कोई कमी नजर आने लगी थी, पर पारूल की खामोशी ने उसे और भी खामोश कर दिया। ऐसे ही फिर श्लोक इस अस्पताल में आ पहुंचा और फिर एक दिन उसका आमना-सामना पारूल से हो गया। हालांकि वह पारूल से भी बात नहीं करना चाहता था, पर फिर उसने सोचा कि शायद यह उसके पास आखिरी मौका है, जब वह अपनी बात पारूल तक पहुंचा सकता है। दूसरी ओर पारूल भी अपने पिछले दिनों को याद कर रही थी। वह भी सोच रही थी कि श्लोक की इस खामोशी का राज क्या उसके अतीत में ही है, पर उसे भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। अब उसने तय कर लिया था कि अगली बार जब वह श्लोक से मिलेगी तो सीधे खामोशी पर ही बात करेगी, उसे बाकि किसी बात को करने का मौका नहीं देगी। अगले दिन फिर पारूल श्लोक से मिलने के लिए पहुंच जाती है।
इधर श्लोक भी आज कुछ अलग ही अंदाज में उससे मिला था। आज श्लोक ने हाथ बढ़ाकर पारूल का स्वागत किया। पारूल ने भी उससे हाथ मिलाया। फिर श्लोक मुस्कुराते हुए उसके सामने बैठ गया। फिर एक हंसी के साथ उसने अपनी बात कही कि शायद आप कल रात सोई नहीं है, शायद कुछ सोच रही थी। पारूल जवाब दिया, जी, हां सही कहा आपने। पर मैं आपकी खामोशी का राज खोजने का प्रयास कर रही थी। तो मिला आपको जवाब? आपने अब तक बताया ही नहीं है। हां, उसका जवाब तो मैंने आपको अब तक नहीं दिया है। पारूल ने फिर कहा अब आप कोई और बात करें उससे पहले मैं आपको कह दूं कि मेरे लिए आप सिर्फ एक केस हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं। अतीत में जो हुआ था, वह हो चुका है। हम आज में है और आज में आप मेरे लिए एक केस हैं। आप अपनी खामोशी तो तोड़ ही चुके हैं, अब उस तीन साल की खामोशी की बात भी बता दीजिए। ताकि मैं यहां से चैन से जा सकूं और यदि आपको कोई प्रॉब्लम है तो उसका इलाज किया जा सके।
कुछ देर तक रूम में खामोशी छा जाती है। फिर श्लोक कहना शुरू करता है। मैं आपके लिए एक केस हूं मैं मान लेता हूं। आप मेरे लिए डॉक्टर है मैं यह नहीं मानूंगा। मैं तीन साल तक खामोश क्यों था, यह तो मैं आपको नहीं बता सकता। पर कुछ है जो आपको बताना चाहता हूं। पारूल ने सवाल किया है क्या ? श्लोक ने फिर आपी बात को कहना शुरू किया। मुझे नहीं पता कि चार साल पहले ऐसा अचानक क्या हो गया था कि आपने मुझे छोड़ दिया। मेरा प्यार आपकी नजर में क्या था, मुझे वह भी नहीं पता, मेरी शख्सियत आपकी नजर में क्या थी मुझे यह भी नहीं पता। आपने अचानक ही मेरा साथ छोड़ दिया, मैं अंदर तक टूट गया था। खुद को संभालने की मैंने काफी कोशिश की, परंतु खुद को संभाल नहीं सका। मेरे पास कई सवाल थे, आपके लिए, पर आपने न तो मेरे सवाल सुने, न उनका जवाब दिया और न ही कभी मुझे समझने की कोशिश की। पिछले कुछ दिनों में हमारे बीच हुई बातें आपके लिए फालतु हो सकती है, पर मेरे लिए वह मेरे तीन साल थे। मरीचिका का क्या होती है, शायद आपको अभी समझ नहीं आएगा। मेरे कई सवाल और आपका एक सवाल हमेशा निरूत्तर रहेगा। हां, पर मेरा दावा है कि आप मरीचिका को बहुत अच्छै से समझ सकेगी। पारूल एक बार श्लोक को आश्चर्य भरी निगाह से देखती है। हम अपने आसपास खुद एक मरीचिका मनाकर रहते हैं। हम जो कहना चाहते हैं, करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाते। कभी हमारा अहम बीच में आता है, कभी परिवार, कभी लोग, कभी कुछ तो कभी कुछ। हम खुद अपनी खुशियों को उस मरीचिका के कारण तौलने लगते हैं, हम अपनी छोटी-छोटी खुशियों की तुलना दूसरों की खुशियों से करने लगते हैं। हमारे अपने परिवार में कोई परेशानी हो तो हम मिलकर उसका सामना करते हैं, परिस्थितियों से समझौता करते हैं, पर बात जब दूसरों की हो तो उनमें खामियां निकालने लगते हैं। परेशानियों, परिस्थितियों के लिए उन्हें जज करने लगते हैं। हम यह नहीं सोच पाते कि इन परिस्थितियों, परेशानियों से हमें भी कभी गुजरना पड़ सकता है या हम गुजर चुके हैं। हम हमेशा दूसरों को दोष देने लग जाते हैं।
लड़कों को एक ऐसी लड़की चाहिए, जो उसे प्यार करें, उसका घर संभाले, उसके प्रति ईमानदार रहे, पर वह खुद इन जिम्मेदारियों को कितना उठाता है। वहीं लड़कियों की ख्वाहिश एक अच्छा घर, अच्छा परिवार चाहिए, चाहे फिर उसके खुद अपने घर के हालात कितने ही बुरे क्यों न हो। अपने घर में समझौता कर सकती है तो दूसरे घर में जाने के लिए शर्ते लागू क्यों होती है। हमें दोस्त ऐसा चाहिए जो हर मुश्किल घड़ी में हमारे साथ खड़ा हो, वहीं दोस्त अगर मुश्किल में आ जाए तो हमें अपनी ही परेशानी से मुक्ति नहीं मिलती है। रिश्तेदार ऐसे हो जो सुख-दुख में साथ दे, मदद के लिए आगे रहे, उन्ही रिश्तेदारों को अगर मदद की जरूरत पड़ जाए तो कहा जाता है कि अभी तो हम खुद ही परेशान चल रहे हैं। हम खुद में ही कितने खुदगर्ज हो जाते हैं कि हम दूसरों को देख भी नहीं पाते। दूसरों के दुख तकलीफ हमें महसूस नहीं होती, शायद जिसका कारण हम खुद भी हो सकते हैं। हम ऐसे क्यों हो जाते हैं। क्यों हम दूसरा का फायदा उठाने के बारे सोचते रहते हैं। क्यों दूसरी की भावनाएं हमारे मतलब के आगे मर जाती है? ऐसा क्यो, दूसरों को हमेशा जज करने या दोष देने की इस मरीचिका का भ्रम हम आखिर कब तोड़ेगें। रेगिस्तान की मरीचिका तो आंखों का एक धोखा है, परंतु हमारी असल जिंदगी में जो ये मरीचिका है, यह आंखों का धोखा नहीं यह खुद के साथ, दूसरों के साथ धोखा है। हमें इस मरीचिका को तोड़ना होगा। सच से सामना करना होगा। तभी हम इस मरीचिका के भ्रम से बाहर आ सकेंगे और खुद को एक बेहतर इंसान बना सकेंगे और एक बेहतर इंसान की पहचान भी कर सकेंगे। इतना कहने के बार श्लोक एक बार फिर खामोश हो गया। कुछ देर रूम में खामोशी रही, जिसे पारूल ने तोड़ा और फिर कहा कि आप अपनी खामोशी के बारे में बताइए।
पारूल के शब्द सुनने के बाद श्लोक कुर्सी से खड़ा हुआ। उसी खिड़की के पास पहुंच गया। कुछ देर तक वहीं खड़े रहने के बाद वह फिर पारूल से बोला आपको सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहिए? पारूल ने हां कहा। अगर आपकी तरह ही आपके सवाल का जवाब खामोशी हो तो आप क्या करेगी। पारूल ने कहा कि कुछ भी हो जाए मैं आपकी उस खामोशी के राज को जानकर रहूंगी, उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े मैं करूंगी। अच्छा क्या कर सकती है आप? श्लोक ने पारूल से पूछा। वक्त के साथ आपको सब पता चल जाएगा। श्लोक ने फिर पारूल से पूछा क्या आप मेरे चार साल पहले के कुछ सवालों का जवाब दे सकती है। पारूल इस पर कुछ नहीं कहती। श्लोक जोर से हंसते हुए खामोशी, खामोशी, खामोशी......। पारूल उठकर कमरे से जाने लगती है, तब तक दोनों ही आपस में कोई बात नहीं करते हैं, पारूल ने रूम का दरवाजा खोला ही था कि एक आवाज उसके कदमों को वहीं रोक देती है। वह पलटकर देखती है कि श्लोक वहीं खिड़की के पास गिरा हुआ है, उसके सिर से खून बह रहा है और वह लगभग अचेत हो चुका है। वह पास जाकर देखती है तो उसके चेहरे पर एक मुसकान उसे नजर आती है, जैसे श्लोक आखिरी बार कह रहा हो कि तुम्हारी खामोशी की मरीचिका ने मुझे तीन साल तक खामोश रखा था, मेरी यह कभी न टूटने वाली खामोशी की मरीचिका अब तुम्हें हमेशा एक भ्रम में ही रखेगी।
बहते हुए खून और अचेत पड़े श्लोक को देखकर पारूल को भी कुछ होश नहीं रहा था। उसकी आंखों से बस आंसू निकल रहे थे, वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी। गोली चलने की आवाज सुनकर अस्पताल के कुछ लोग उस कमरे में आ गए थे। कुछ ने पारूल को संभाला और कुछ उस स्थिति को संभालने की कोशिश में लग गए थे। फिर पुलिस, अस्पताल में भागदौड़ सब होता रहा, पर पारूल उस पल के बाद ही खामोश हो गई थी। उसके कानों में श्लोक की वो आखिरी हंसी और उसके कहे शब्द ही गूंज रहे थे, खामोशी, खामोशी, खामोशी......। वह अब भी श्लोक के मरीचिका शब्द का अर्थ खोजने का प्रयास कर रही थी।
मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 4
पारूल श्लोक की बातों को समझने का प्रयास करती है और समय अधिक हो जाने के कारण वहां से उठकर चली जाती है। अगले दिन फिर वह श्लोक सामने होती है। इस बार श्लोक अपनी ओर से बात की कोई शुरूआत नहीं करता है वह खिड़की के बाहर ही देखता रहता है। कुछ देर उस कमरे में खामोशी ही रहती है और पारूल उसे तोड़ते हुए कहती है कि मैंने कल रात को आपकी बातों के बारे में सोचा और काफी सोचा। आपकी कुछ बातें सही भी है और तर्क संगत भी है। हम इन बातों पर और भी बातें कर सकते हैं, पर मुझे आपकी खामोशी की वजह जानना है। आखिर ऐसी कौन सी बात है जो किसी इंसान को तीन सालों तक खामोश रख सकती है। तीन सालों में आप न जाने कितने ही लोगों से मिले हो, पर आपकी खामोशी हमेशा रही है। आखिर वो कौन सी बात है? पारूल की बातें सुनकर श्लोक पारूल के सामने रखी कुर्सी पर आकर बैठ जाता है। श्लोक पारूल से कहता है कि आपकी नजर में लोगों की अहमियत क्या है? पारूल कुछ चौंकने वाले अंदाज में लोग कौन से लोग। अरे, वहीं लोग जो हमेशा कुछ न कुछ कहते रहते हैं। श्लोक ने पारूल के सवाल का जवाब देते हुए कहा। हालांकि मैं उन लोगों को बहुत ज्यादा माइंड नहीं करती हूं, पर....। श्लोक ने इस बार पारूल को बीच में ही टोकते हुए कहा कि पर उनका डर तो रहता है। क्योंकि लोग क्या कहेंगे। है ना? जी हां, पारूल ने जवाब दिया। पर क्या आपको लगता है कि लोग क्या कहेंगे इसलिए हम अपनी आजादी खो दें, या हम जो चाहते वह न करें क्योंकि लोग क्या कहेंगे? हम जिस समाज में रहते हैं वहां यह सब देखना पड़ता है, पारूल ने कहा।
चलो, माना हम लायक नहीं
चलो माना कि हम तुम्हारे लायक नहीं,
चलो माना कि हम किसी काबिल नहीं।
हम नाकाबिल है तो कोई गुनाह नहीं,
तुम कैसे साबित करोगे हम तुम्हारे लायक नहीं।।
कहोगे कि हम तुम्हें बेइंतहा प्यार करते थे,
तुम सोचते थे और हम कहा करते थे।
जब सोती थी रातें हम जागा करते थे,
उन रातों में बस तुमसे बातें किया करते थे।।
कहोगे कि हम तुम्हारा ख्याल रखते थे,
कदम दर कदम तेरे साथ चला करते थे।
तुम्हारी तकलीफ में साथ हुआ करते थे,
तुम हंसते थे तो हम भी हंसा करते थे।।
कहोगे कि हम तुम्हारे लिए वक्त रखते थे,
तुम्हें दिल में अपने दिल की तरह रखते थे।
जो तुम रूठ जाते थे कभी हमसे किसी बात पर,
तुम मान नहीं जाते थे तब तक कोशिश करते थे।।
कहोगे कि तुम्हारे दर्द की हम दवा हुआ करते थे,
जब कोई ना होता हम तुम्हारे साथ हुआ करते थे।
हम दूर भी होते थे तो तुम्हारा ख्याल हुआ करते थे,
कभी तपती धूप में तुम्हारा इंतजार किया करते थे।।
कहोगे कि तेरी यादों को सहेज कर रखते थे,
बस तेरे लिए हम अक्सर गुनगुनाया करते थे।
बात गर जो निकला आए तेरे सुकुन की,
हम अपना सुकुन भी तुझ पर लुटाया करते थे।।
कहोगे कि तेरी राहों पर हम नजरें बिछाया करते थे,
तेरे वक्त के लिए कभी तुझे लेने भी आया करते थे।
तेरा साथ मिले कुछ इस कदर हमकों,
इसलिए अक्सर सपनों की दुनियां बसाया करते थे।।
कहोगे कि मेरा प्यार तो अब भी वहीं है,
वक्त के साथ मेरे लिए बदले तो तुम हो।
ये वक्त है फिर कभी तो बदलेगा ही,
क्योंकि मेरे इंतजार अब भी तुम हो, तुम हो, तुम हो।।
मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 3
पारूल जी चलिए मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा, पर क्या आप अपने उन सवालों के जवाबों पर यकीन करेंगी? पारूल एक बार उसे अचरज भरी निगाह से देखती है, फिर कहती है पहले आप जवाब तो दीजिए। मेरी चुप्पी के कारण थे वो चार कत्ल, जो मैंने किए थे। पारूल श्लोक की बात को सुनकर एकदम चौंक जाती है और फिर कुछ संभलते हुए सवाल करती है कि पर क्यों और किन लोगों के कत्ल। मेरे ही परिवार के लोग थे, उनके कत्ल कर मैंने उन्हें अपने ही घर में दफन कर दिया और फिर भाग गया। भागते हुए यहां आ गया। कत्ल के बाद से मेरे होंठों पर चुप्पी थी, जो आपके कारण टूट गई। पर आपने अपने ही परिवार का ही कत्ल क्यों किया? श्लोक ने कहा कि मैं आपके इस सवाल का जवाब भी दूंगा, पर क्या आपने मेरी बात पर यकीन कर लिया? पारूल उसे एकबार फिर असमंजस भरी नजरों से देखती है। इस पर श्लोक कहता है कि इसलिए मैंने आपसे पहले सवाल किया था कि क्या आप मेरे जवाबों पर यकीन करेंगी। मैं सच कह रहा हूं या झूठ यह कौन और कैसे तय करेगा। मैंने कहा कत्ल किए और एक मिनट के लिए ही सही पर आपने उसे सच मान लिया। पारूल जी यही बातें है जो मनुष्य को एक मरीचिका का भ्रम देती है। हालांकि मरीचिका खुद एक भ्रम पर मनुष्य एक भ्रम के भी भ्रम में फंस जाता है।
क्या आप मुझे बता सकती है कि दुनियां में सच क्या है और झूठ क्या है? दुनियां में कई सच है और कई झूठ है। पारूल ने कहा। जी, मैं भी तो वहीं जानना चाहता हूं कि आखिर सच क्या है और झूठ क्या। क्या झूठ कभी सच था, या सच कभी झूठ हो सकता है। सच आखिर है क्या। जो परखा गया हो? जो मान्य हो? या जिस पर यकीन हो जाए बस वही सच है? जी, नहीं सच को कभी परखने की जरूरत नहीं होती है, पारूल ने कहा। यदि सच को परखने की जरूरत नहीं होती है तो माता सीता को अग्नि परीक्षा क्यों देना पड़ी थी। वहां भी तो सच की परख हुई थी। श्लोक की इस बात पर पारूल लगभग निरूत्तर हो जाती है, वह बस उसे एकटक देखती रहती है। पारूल अगर मैं कहूं कि झूठ कि बुनियाद ही सच की परख है तो क्या आप मानेंगी। पारूल ने कहा कि श्लोक सच और झूठ के अपने अपने पैमाने हैं। यह निर्भर करता है कि बोला क्या जा रहा है सच या झूठ फिर उस पर निर्णय लिया जाता है कि सच क्या है और झूठ क्या है? जो आप कह रहे हैं वह भी सही है, परंतु यह कैसे कह सकते हैं कि झूठ की बुनियाद सच की परख है। श्लोक ने पारूल की बात के जवाब में कहा कि जब बार बार सच को परखा जाएगा तो कभी तो उसके बदले कोई ऐसी बात आएगी ही जो सच को छुपा दे और सच की परख करने वाले को सच की परख ही न करने दे। यानि कि सच को परख से बचाने के लिए उस सच के बदले एक झूठ। हर बार ही सच की परख नहीं होती हैं, पारूल ने कहा। पर हर बात सच हो ये भी तो जरूरी नहीं है ना? कोई बात सच है या झूठ उसे कैसे तय किया जा सकता है। मतलब साफ है कि अगर बात सच है तो उसे भी और अगर बात गलत है या झूठ है तो उसे भी परखा तो जाएगा ही। अगर झूठ है और फिर उसे परखा गया और वह झूठ झूठ साबित हुआ तो कोई बात नहीं परंतु यदि वह बात सच है और फिर भी उसे परखा गया तो फिर बात वहीं आ जाती है कि सच को हमेशा परखा ही जाता है। श्लोक की इन बातों से पारूल को उलझन में डाल दिया था। वह कहती है कि मतलब यह कि आपने अभी झूठ कहा था कि आपने अपने परिवार का कत्ल किया है? तो फिर आपकी वह खामोशी ? श्लोक ने फिर कहा कि मैंने अपने पूछा था कि क्या आप मेरी बात पर यकीन करेंगी? मैंने अपनी एक बात कही थी, वह सच है या झूठ यह तो आपके मानने पर निर्भर करता है। मैंने कहा कि मैंने अपने परिवार का कत्ल किया और आपने मान लिया। अब आप उसे झूठ मान रही है। तो फिर आप ही बताए कि मेरी बात सच है या झूठ। खैर रही बात मेरी खामोशी की तो अब तो मेरी खामोशी रही ही नहीं तो उस पर सवाल क्यों? मैं खामोशी पर कुछ कहूं भी तो फिर वही बात कि क्या आप उस पर यकीन करेंगी? इस बार आप और भी ज्यादा संशय में रहेगी कि मेरी बात सच है या झूठ। फिर आप उसे या तो सच मानेगी या फिर झूठ। अगर सच मान लिया तो फिर आपका कोई सवाल नहीं होगा, पर झूठ माना तो फिर एक अगला सवाल। पारूल जी जिस मरीचिका की बात मैं कर रहा था वह यही तो है। आप, मैं और हमारे जैसे न जाने कितने ही लोग इस मरीचिका में उलझे हैं और सच और झूठ के इसी भ्रम में जी रहे हैं। हमें असलियत में पता ही नहीं है कि आखिर सच क्या और झूठ क्या है? कुछ लोग कहते है कि हम अपनी आंखों देखी पर यकीन करते हैं और वह सच होता है पर रेगिस्तान में दूर एक पानी की झील भी तो आप ही देखते हैं और जब वहां पहुंचते हैं तो वहां कुछ नहीं होता। तब क्या सच होता है और क्या झूठ होता है।
मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 2
अगले दिन पारूल फाइल लेकर डॉक्टर मिहिर से मिलती है और उन्हें बताती है कि फाइल में उस व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है। खास बात बस यह लिखी है कि वह पिछले तीन साल से एक भी शब्द नहीं बोला है। पहले के डॉक्टर भी उसके लिए कुछ नहीं कर सके क्योंकि जब वे उसके साथ होते थे, तब भी वह कुछ नहीं बोला और हमेशा खामोश ही रहा है। डॉक्टर मिहिर ने कहा कि फाइल वह भी देख चुके हैं, इस कारण उन्होंने इस केस को एक चैलेंज के रूप में लिया है और यह केस उसे सौंपा है। मिहिर ने कहा कि पारूल हमें ये केस हर हाल में सॉल्व करना है, हमें उसकी सच्चाई, उसकी पहचान, उसका अतीत, उसकी खामोशी का राज चाहिए। ये तुम कैसे करती हो, यह तुम जानो, पर मुझे इसका रिजल्ट चाहिए और वो भी पॉजिटिव। पारूल ने एक बार फिर मिहिर से कहा कि वह अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगी। इतना करने के बाद वह वहां से चली जाती है। अगले दिन पारूल उस व्यक्ति की फाइल लेकर हॉस्पिटल पहुंचती है और वहां अपना परिचय देने के बाद उस व्यक्ति से मिलने की बात कहती है। कुछ ही देर में उसे एक कमरे की ओर भेज दिया जाता है। कमरे की ओर जाते हुए उसका दिल जोर से धड़क रहा था। वह थोड़ा नर्वस हो रही थी और थोड़ी घबराहट भी थी। वह कमरे तक पहुंचती है, दरवाजा खोलकर अंदर देखती है उसे एक व्यक्ति खिड़की की ओर मुंह किए खड़ा नजर आता है। वह खुद को नॉर्मल करने का प्रयास करती है और एक गहरी सांस लेकर कमरे के अंदर चली जाती है। उसके कमरे में आने और दरवाजा बंद होने की आवाज होने के बाद भी खिड़की के पास खड़ा व्यक्ति पलटकर नहीं देखता है। पारूल उसे हैलो कहती है, पर इसके बाद भी वह उसे पलटकर नहीं देखता है। पारूल कहती है वह एक डॉक्टर है और उससे बात करने के लिए यहां आई है। इस बार वह व्यक्ति एक बार उसे पलटकर देखता है और फिर से उसी मुद्रा में खड़ा हो जाता है।
पारूल फिर अपनी बात आगे बढ़ाती है और कहती है कि लगता है कि आप किसी बात से बहुत ज्यादा नाराज है। यहां सभी कह रहे थे कि आप यहां तीन साल है और इन तीन सालों में आपने किसी से कोई बात नहीं की? इस पर भी वह व्यक्ति पहले की तरह ही खड़ा रहता है। उसकी ओर से कोई पतिक्रिया न देखकर पारूल एक बार फिर उसे कहती है कि यदि आपकी कोई नाराजगी है तो मुझे बताए, हो सकता है कि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं? इस बात एक बार फिर वह व्यक्ति उसकी ओर पलटकर देखता है। इस बार पारूल की नजर उससे मिलती है और वह एकदम अवाक सी रह जाती है। वह बिना कुछ बोले वहां से चली जाती है। अस्पताल से वह सीधे मिहिर के पास जाती है और उससे कहती है कि वह इस केस पर काम नहीं कर सकती। हालांकि मिहिर उसे साफ मना कर देता है और वह केस पारूल के पास ही रहता है। अगले दिन पारूल फिर अस्पताल जाती है औ कमरे में जाकर उस व्यक्ति से कहती है कि अब ना मैं कुछ कहूंगी ना ही शायद आप, पर आप जब तक कुछ नहीं कहेंगे मैं यहां रोज आउंगी और बैठी रहूंगी। देखती हूं कि आप कब तक कुछ नहीं बोलते। इतना कहने के बाद पारूल वहीं बैठ जाती है और वह व्यक्ति पूरे समय खिड़की ओर मुंह करके खड़ा रहता है।
अब हर रोज पारूल वहां आती और आकर बैठ जाती और वह शख्स रोज की तरह खिड़की की ओर देखता रहता। ऐसे ही करीब 15 दिन बीत जाते हैं, पर वह व्यक्ति कोई बात नहीं करता। आखिर 16वें दिन पारूल उससे एक बार फिर कहती है कि 15 दिन हो गए हैं, मैं रोज आती हूं और सोचती हूं कि आप आज कुछ बोलेंगे, पर आप कुछ कहते ही नहीं है। आखिर ऐसी कौन सी बात है जो आपके होंठों पर इतनी गहरी खामोशी को छोड़ दिया है। डॉक्टर न सही अपनी एक दोस्त समझकर ही मुझे कुछ बताएं। वह व्यक्ति एक बार फिर उसे पलटकर देखता है, पर इस बार भी वह कुछ नहीं कहता। पारूल फिर चुप हो जाती है। ऐसे ही 15 दिन और बीत जाते हैं। एक दिन पारूल ऐसे ही उस कमरे में बैठी थी और वह शख्स हमेशा की तरह खिड़की की ओर देख रहा था। तब पारूल उससे कहती है कि हो सकता है कि अब मैं यहां न आउं। क्योंकि एक महीना हो गया है, आप कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है और मेरा पहला केस ही मुझे सफलता नहीं दिला सका है। अब मेरा कैरियर भी खत्म हो जाएगा। इसलिए कल मैं आपकी फाइल फिर से अपने सीनियर को देकर चली जाउंगी। मुझे नहीं पता कि आप किस बात पर नाराज है, पर मुझे ये पता है कि आपके कारण मेरा एक सपना हमेशा के लिए टूट जाएगा। पारूल की यह बात सुनने के बाद वह शख्स फिर उसे पलटकर देखता है। पारूल की उसकी नजरों में देखती है, पर उस शख्स पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह फिर खिड़की की ओर देखने लगता है। अगले दिन पारूल मिहिर के पास जाती है और पूरी बात उसे बताती है। पर मिहिर केस को छोड़ने से मना कर देता है। पारूल फिर अगले दिन वहां पहुंच जाती है। इस बा रवह उस शख्स के लिए फूल लेकर भी जाती है, पर इस बात का भी उस शख्स पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह रोज की ही तरह व्यवहार करता है। इधर पारूल का धैर्य अब जवाब देने लगता है। वह उस शख्स पर चिल्लाती है कि आखिर आप अपने आप को समझते क्या हो? एक महीने से ज्यादा समय हो गया है मुझे यहां आते हुए। मैं यहां रोज आपसे बात करने के लिए आती हूं। आप है कि बस खिड़की की ओर देखते रहते हैं, आखिर है क्या उस खिड़की में जो आपको दिखता है मुझे या किसी ओर को नहीं। आखिर किस बात का अहंकार है आपको कि आप किसी से कोई बात नहीं करते। आखिर ऐसी कौन सी बात है जो आपको इतने लंबे समय से खामोश रखे हुए हैं। आप खुद से ही नाराज है या किसी और से नाराज है। आखिर आप कब तक नहीं बोलेंगे। कभी तो आपको बोलना ही होगा, और अगर बोला ही है तो फिर आ ही क्यों नहीं। प्लीज कुछ बोलिए।
कुछ देर के लिए रूम में खामोशी छा जाती है। वह शख्स एक बार फिर पलटता है और पारूल को देखता है। इस बार वह पारूल को कुछ देर तक देखता रहता है और फिर उसकी ओर बढ़ता है। पारूल की नजर भी उस पर ठहर जाती है। वह पारूल के पास आता है और उसके सामने रखी कुर्सी पर बैठ जाता है। अपने हाथ से उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा करता है। पारूल भी कुर्सी पर बैठ जाती है। कुछ देर तक ऐसे ही बैठे रहने के बाद वह शख्स जो पिछले तीन सालों से एक शब्द नहीं बोला था तीन साल बाद पहला शब्द बोला मरीचिका....। पारूल एकटक उसे देखती रहती है। फिर वह उसका शब्द दोहराती है मरीचिका? ये क्या है? वह शख्स बोला एक भ्रम, एक माया, एक धोखा। मरीचिका सिर्फ रेगिस्तान में ही नहीं दिखती है यह आपकी, मेरी, हम सभी की जिंदगी में शामिल है। कुछ लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं और कुछ लोग इसके जाल में फंस जाते हैं। जो लोग इसके जाल में फंस जाते हैं वे फिर कभी इससे बाहर नहीं आ पाते, क्योंकि फिर उन्हें इस धोखे के साथ जीने में ही मजा आता है। हंसते हैं, रोते हैं, तड़पते हैं, पर इस मरीचिका में उलझे रहते हैं। जिंदगी की मरीचिका को देखने और समझने के लिए जिंदगी को एक नए नजरिए से देखने की जरूरत होती है, जो हर कोई नहीं देख पाता। देखता भी है तो उसे स्वीकार नहीं कर पाता। कुछ अगर उसे स्वीकार भी कर ले तो भी उस भ्रम से बाहर निकलना नहीं चाहते हैं। कभी कभी ये मरीचिका आपको खामोश कर देती है और कभी आपको इतने लोगों के बीच ले जाकर खड़ा कर देती है, जहां आप अपनी ही आवाज को सुन नहीं पाते हैं। पारूल एकटक उसे देखते हुए उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। हालांकि यह भी तय था कि वह शख्स क्या कह रहा है उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर फिर भी वह उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। मरीचिका, मरीचिका, मरीचिका। इतना कहने के बाद वह शख्स एक बार फिर से खामोश हो जाता है। कुछ देर चुप रहने के बाद पारूल उससे कहती है कि आपकी खामोशी का राज ये मरीचिका है? आपका नाम क्या है?, आप कहां से है? आपके परिवार में कौन है और कहां है? पारूल के इन सवालों जवाब में एक बार फिर वह शख्स खड़ा होता है और फिर उसी खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता है। वह बाहर को देखता है और पारूल से पूछता है कि क्या आप मरीचिका का मतलब जानती है? अगर हां तो ही आप मेरी बात को समझ सकती है और यदि नहीं तो पहले आप मरीचिका का मतलब समझकर आना उसके बाद हम बात करेंगे। इतना कहने के बाद वह शख्स एक बार फिर खिड़की की ओर देखने लगता है। इसके बाद पारूल वहां से अपना बैग, किताबें और फाइल लेकर वहां से चली जाती है।
गर्मी के दिनों में रेगिस्तान में लोगों को पानी होने का भ्रम होता है, जिसे मरीचिका कहते हैं। ये भ्रम ऐसा होता है कि रेगिस्तान में खड़ा व्यक्ति स्वतः ही उस भ्रमित झील की ओर चल पड़ता है, परंतु ज बवह उस स्थान पर पहुंचता है तो उसे वहां रेत के सिवाय कुछ नहीं मिलता। मिलता है तो एक और भ्रम। फिर कुछ दूरी पर उसे पानी होने का आभास होता है और वह इस भ्रम में ही रह जाता है कि रेगिस्तान में उसे पानी मिलेगा, पर वो इस भ्रम से निकल नहीं पाता है। ऐसा ही भ्रम मेरी इस कहानी में भी है, जिसमें कई लोग फंसे है और निकल नहीं पाते। इस कहानी में मेरे कुछ तर्क ऐसे भी है जो आप सभी पाठकों को विरोधाभासी लगे, परंतु कहानी के पात्रों के कारण मैं उन तर्कों का प्रयोग कहानी में कर रहा हूं, परंतु मेरा उद्देश्य उन तर्कों को उचित ठहराना या जिन विषयों पर वो तर्क कर रहा हूं उनका विरोध करना बिल्कुल भी नहीं है। इस कहानी में मैं एक नया प्रयोग करने जा रहा हूं, जो संभवतः आपको पसंद आए यह कहानी में वर्तमान से फ्लैश बैक में प्रस्तुत करूंगा। तो आइए शुरू करते है कहानी मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर।
पारूल के कपड़ों पर खून ही खून ही लगा था। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा रूकने का नाम नहीं ले रही थी। वह उस अस्पताल के एक कोने में बैठी बस एकटक एक कमरे को देखकर रोए जा रही थी। उसे इतना भी आभास नहीं था कि अस्पताल परिसर में इस समय हडकंप सा मचा हुआ है। पुलिस से लेकर अस्पताल के कर्मचारी डॉक्टर इधर-उधर दौड़ रहे हैं। अस्पताल में मौजूद अन्य मरीज शोर कर रहे हैं। मीडिया के लोग अपना काम कर रहे हैं। इन सबके बीच भी पारूल जैसे शून्य में थी और उसकी नजरें उस अस्पताल के उस खास कमरे पर ही टिकी हुई थी। अस्पताल के कुछ कर्मचारी एक स्ट्रेचर लेकर उस कमरे से बाहर निकले उस पर एक लाश थी, जो कि एक सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। उस चादर का एक हिस्सा खून से लाल हो चुका था। जैसे वे कर्मचारी उस लाश को स्ट्रेचर पर लेकर बाहर निकले, कोने में बैठी पारूल जो से चीख पड़ी। अस्पताल की कुछ नर्सों ने उसे पकड़ा और संभालने की कोशिश की। वहीं पुलिस की कुछ महिलाकर्मियों ने भी उसे संभालने का प्रयास किया। अस्पताल के लोगों ने उस स्ट्रेचर को लाश के साथ ही वहां खउ़ी एक एबूंलेंस में रख दिया और फिर वह एबूंलेस वहां से रवाना हो गई। करीब एक घंटे के बाद अस्पताल में एकदम शांति छा गई थी। पारूल अब भी उसी कोने में बैठी उस कमरे को लगातार देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर आंसूओं के दाम साफ देखे जा सकते थे। तभी कंधे पर रखे एक हाथ ने उसे शून्य से फिर से वर्तमान में खींच लिया था। कंधे पर रखा हाथ एक 7 साल की बच्ची का था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने पारूल को देखा और कहा आंटी, आप क्यों रो रही हो, क्या आपको भी चोट लगी है? आप रो मत मैं भगवान जी से कहूंगी कि वो आपकी चोट भी जल्दी ठीक कर दें। इतना कहकर वो लड़की एक बार फिर मुस्कुराई और पारूल के गालों पर आंसूओं की कुछ बुंदे थी उन्हें अपने नन्हें से हाथों से पोछते हुए वहां से चली गई। पारूल उस लड़की को जाते हुए देख रही थी, वो छोटी लड़की भी पारूल को जाते-जाते देख रही थी और मुस्कुरा रही थी। पारूल के कंधे में उस नन्हें हाथ के स्पर्श ने उसे संभलने का मौका दिया और फिर पारूल अपना बैग, कुछ किताबें, अपना मोबाइल समेटकर खड़ी हुई भारी कदमों से उस अस्पताल से बाहर आ गई।
कुछ ही देर में पारूल अपने घर पर आ गई थी। वह अब भी मायूस थी अपना सामान एक टेबल पर रखने के बाद वह अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसके चेहरे पर उदासी साफ नजर आ रही थी। कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद पारूल उठी और बाथरूम में चली गई और नहाकर फिर बाहर आ गई। अब पारूल कुछ हद तक संभल चुकी थी। फिर उसने पानी पिया और फिर से उसकी कुर्सी पर आकर बैठ गई। ऐसे ही बैठे बैठे पारूल अपने बीते दिनों की यादों में खो गई थी, जो कि आज से करीब चार साल पहले शुरू हुई थी। तब पारूल एक छोटे शहर से साइकलॉजी का कोर्स खत्म कर आई थी और करीब छह महीने से एक डॉक्टर मिहिर रस्तोगी के साथ काम कर रही थी। एक दिन मिहिर ने पारूल को अपने केबिन में बुलाया और पारूल कुछ ही देर में उनके केबिन में पहुंच गई थी। पारूल के केबिन में पहुंचने के बाद डॉक्टर मिहिर ने अपनी बात कहना शुरू की। पारूल आज मैं तुम्हें एक केस देना चाहता हूं। इस केस में हो सकता है तुम्हें काफी मेहनत करना पड़े और यह भी हो सकता है कि तुम बहुत ही जल्दी इस केस को सॉल्व भी कर दो। वैसे ये केस हम दोनों के लिए एक चैलेंज है। पारूल ने कहा कि ऐसा क्या केस है सर, कि जो हमारे लिए चैलेंज है? मिहिर ने पारूल से कहा कि चैलेंज इसलिए कह रहा हूं पारूल क्योंकि हमसे पहले करीब पांच डॉक्टर इस केस पर काम कर चुके हैं, पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है। अब यह केस हमारे पास आया है और मैं चाहता हूं कि तुम इस केस को अकेले हैंडल करो। इससे तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा और साथ ही तुम्हें एक नया अनुभव भी मिलेगा। अगर देखा जाए तो साइकलॉजी के क्षेत्र में यह केस अपने अपने आप में एक अनुठा केस है, जहां देश के पांच बड़े साइकलॉजिस्ट इस केस में सफल नहीं हो सके हैं और अब यह केस हमारे पास है, यानि कि छठवे डॉक्टर के पास। मैं चाहता हूं कि अब इस केस में कोई सातवां डॉक्टर न आए और तुम इस केस को सॉल्व करो। पारूल ने कहा कि जी, सर मैं पूरी कोशिश करूंगी। इसके बाद डॉक्टर मिहिर ने पारूल को एक फाइल दी और कहा कि ये केस की पूरी जानकारी है। इसके साथ ही उन पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट भी जो तुमसे पहले इस केस पर काम कर चुके हैं। इसे बहुत ध्यान से पढ़ना, इससे तुम्हें केस में मदद मिल सकती है। अगर कोई परेशानी आती है तो मैं तो हूं कि, पर फिर भी यह केस सिर्फ तुम्हारा है। तुम्हें यह केस हर हाल में सॉल्व करना है। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा यकीन है कि तुम इसमें जरूर सफल रहोगी। पारूल ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए कहा कि जी, सर मैं हर संभव कोशिश करूंगी कि आपको मैं निराश न करूं। ओके तो अब तुम जा सकती हो पारूल। तुम फाइन की स्टडी करने के बाद मुझे बता देना कि तुम कब से इस केस पर काम शुरू करोगी तो मैं बाकि अरजमेंट कर दूंगा। जी, सर। इतना कहकर पारूल वह फाइल लेकर मिहिर के केबिन से चली गई।
घर पहुंचकर पारूल ने वह फाइल खोली और उसे पढ़ना शुरू किया। फाइल में जो लिखा था उसके अनुसार एक लड़का 32 या 34 साल का था। पिछले तीन सालों से वह एक मनोरोगी चिकित्सालय में रह रहा था। उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं मिली थी। पुलिस ने अपनी ओर से कई प्रयास किए थे कि उसका कोई परिचित, कोई रिश्तेदार, परिवार के संबंध में कोई जानकारी मिले, परंतु वह भी हासिल नहीं हो सकी थी। फाइल में इस बात का खास तौर पर उल्लेख किया गया था कि जबसे वह हॉस्पिटल में आया है, तब से उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला है। वह हमेशा ही चुप रहता है। हमेशा शांत बना रहता है, अन्य मरीजों के तरह वह कभी भी हाईपर नहीं हुआ है। हॉस्पिटल स्टॉफ द्वारा उससे जो कहा जाता है वह उसे कर देता है। उसका दिमाग स्थिर है, परंतु जिस तरह से वह रहता था वह लोगों को परेशान करता था। तीन साल तक उसके मुंह से किसी ने कोई शब्द नहीं सुना था। फाइल में जो पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट थी उसमें भी यही एक बात विशेष तौर पर लिखी थी कि उसका इलाज तब ही संभव हो सकता है कि जब वह कुछ बोले और अपने बारे में बताए। किसी बात का अंदाजा लगाने भर से उसका इलाज किया जाना असंभव है। जब तक उसकी परेशानी या मानसिक स्थिति के बारे में कुछ पता नहीं चलेगा तो उसका इलाज कैसे किया जा सकता है। किसी डॉक्टर ने छह माह, किसी ने एक साल तक उससे बात कर उससे कुछ बोलने के लिए मेहनत की परंतु उसके मुंह से कभी कुछ नहीं निकला। पारूल उस फाइल को पढ़ते हुए थोड़ा अचरज में थी कि कैसे कोई व्यक्ति 3 साल से चुप है? पारूल की उस व्यक्ति से मिलने की इच्छा तीव्र हो रही थी। हालांकि उसने फाइल को एक बार फिर ध्यान से पढ़ा, परंतु इस बार भी उसे कुछ खास जानकारी नहीं मिली थी। अब पारूल ने तय कर लिया था कि वह उस व्यक्ति से मिलने के बाद ही उसके इलाज के बारे में तय करेगी कि क्या और कैसे करना है।
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