उसे मुझसे भी...
एक उसकी मोहब्बत थी, एक मेरी मोहब्बत थी,
मुझे थी उसकी आरजू और उसे मेरी जरूरत थी।
उसकी और मेरी मोहब्बत में इतना ही तो फर्क था,
मुझे सिर्फ उससे और उसे मुझसे भी मोहब्बत थी।।
मेरे लिए उसका नाम जैसे खुदा का नाम होता था,
नाम मेरा उसके लिए तो जैसे एक इल्जाम होता था।
मेरे लिए मैं गुल और वो मेरी गुलिस्तां होती थी,
बस इतनी सी मेरे इश्क की हकीकत होती थी।।
मैं जागता तो रात भर था पर सिर्फ उसके ही लिए,
वो भी जागती थी क्योंकि उसे नींद नहीं आती थी।
बस उसके ही ख्यालों से रातें सुबह बन जाती थी,
बस इतनी सी मेरे इश्क की तबीयत होती थी।।
उसके रूठने से दिल मेरा अक्सर बैठ जाता था,
मैं जो रूठा तो कहती थी मुझे मनाना नहीं आता।
ये अदा थी उसकी या यही उसकी सीरत थी,
इस बात पर मोहब्बत मेरी अक्सर हंसती थी।।
उसकी शिकन से मैं अक्सर बैचेन हो उठता था,
और मेरी बैचेनी भी उसे मजाक लगती थी।
कहती थी रोने नहीं देंगे और बहुत सताती थी,
उसकी यही बात मेरी मोहब्बत को तड़पाती थी।।
उसकी आरजू, उसकी जूफ्तजू, सब उसकी जरूरत थी,
वो ही मंजिल थी मेरी और मेरी राहें भी मुकर्रर थी।
जाने कब और कैसे उसने मेरी राहें ही बदल दी थी,
फिर भी मेरी नजरें मंजिल को ही भटकती थी।।
मेरी कसमें, मेरे वादे बदस्तुर आज भी कायम है,
उसकी कसमें उसके वादे क्या फरेब के कायल थे।
कसम को भी कसम की ही कसम थी शायद,
इसलिए ही तो उसकी हर कसम टूटती रहती है।।
मुझे मोहब्बत में ऐसे ही नाकाम ना समझ लेना,
गर रहना हो तन्हा तो तुम भी इश्क कर लेना।
मोहब्बत मेरी भी किसी मोहब्बत से कम नही थी,
क्या हुआ जो एक तरफा ही सही पर मोहब्बत तो थी।।









kya baat he bahut shandar...
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