पहली मुलाकात का वो रूमानी सा पल


पहली मुलाकात का वो रूमानी सा पल, 
बरसों बाद भी लगता है ना बीता हो कल।
वो ठंडी बयार, फिर वो मौसम की फुहार, 
फिर लगता था जैसे मुझे हो रहा है प्यार।।

बस एक शिकायत हो रही थी दिल से, 
थम क्यों नहीं जाता ये वक्त धीरे से।
बस जीना चाहता उस वक्त को हर पल में, 
एक सुनहरा लम्हा है वो मेरे बीते कल में।।

कुछ डरी, कुछ सहमी खड़ी भीग रही थी वो, 
आज शायद मेरा ही इंतजार कर रही थी वो।
भीगते बालों से लगातार वो गिरते छोटे से मोती, 
काश कि समेट लेता गर उसकी इजाजत होती।।

दिल से तो जानती थी, पर थी कुछ अंजान सी, 
आंखों में हया और दिल की गली सुनसान थी।
वो चुप, मैं भी खामोश, फिर भी कितना शोर था, 
उस पर से मौसम भी कितना बेईमान और था।।

हाय रे मेरी मजबूरी भी मुझ पर क्या सितम ढाती है, 
शब्द भी लिखता हूं तो आंखों में तस्वीर रह जाती है।
उस पल को फिर जीने को मरना मुझे गवारा है,
कोई नहीं छिनेगा हमसे, वो पल बस हमारा है।।

उस लम्हें को कैद कर एक तस्वीर बनाना चाहता हूं,
गर जीना है मुझको, उस पल में ही जीना चाहता हूं।
उस खामोशी की बातों को फिर से सुनना चाहता हूं, 
फिर बरसे ये मौसम, मैं फिर से भीगना चाहता हूं।।

फिर तेरा हाथ पकड़ कर राहों में चलना चाहता हूं, 
तेरे लिए बस तेरे लिए रातों को जीना चाहता हूं।
तेरे बातों में जिक्र हो जिसका वो रिश्ता बनना चाहता हूं, 
उसे लम्हें के हर लम्हें का, मैं वो लम्हा बनना चाहता हूं।।

फिर मन करता है ले जाउं तुम्हें एक नई दुनिया में, 
चलो हम खो जाए फिर से एक प्यार की दुनिया में।
ना कोई गम ना कोई लम्हा ना कोई तुम्हें परेशान करें, 
आओ खो जाए हम, फिर बस एक दूजे को प्यार करें।।

Comments/disqusion
3 comments