अपनों की शिकायत कैसे लिखूं

कभी गलती तो कभी कई गिला भी होती है, 
कभी-कभी शिकवा अपनों से भी होती है। 
दिल से लिखूं, दिमाग से या हाथों से लिखूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।। 

जब कभी बैठा हूं कलम हाथों में लेकर, 
कई ख्याल आ आते है मन में रहकर।
शिकायत भी अपने से और शिकवा भी करूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं ।।

कर भी दूं गिला, कुछ लिख भी दूं, 
पर क्या वो फिर वापस आ जाएंगे।
गलतियां उनकी कहां से शुरू करूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।।

चलो मान भी लेता हूं मैं गलतियां अपनी
क्या वो फिर मुझे माफ कर पाएंगे।
सोच रहा हूं अब अपनों से दूर कैसे रहूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।।

आज एक दिन कभी खास था उनके लिए, 
आज भी वो बहुत खास है मेरे लिए।
ये ख्याल कैसे उनके दिल में रख दूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।।

शब्द कम और मेरे ख्याल कुछ ज्यादा है, 
खुशी क्या रूठी, मन कुछ आधा है।
बहते है अश्क, हंसी का भी क्या तोहफा दूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।।

तुम भूल जाओ, चलो ये शिकवा नहीं करूंगा,
तुम्हारे लौट आने तक तुम्हारा इंतजार करूंगा।
बिता लेते चंद पल तो मिल जाता दिल को सुकूं, 
मैं अपनों की शिकायत कैसे लिखूं।। 

Comments/disqusion
1 comment

  1. गद्य औऱ पद्य दोनों में आपकी शैली शानदार हैं

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