उलझन

जब भी बैठता हूं अकेला, हजारों शब्द अंर्तमन में उठते है, 
जुबां तक आते-आते अक्सर लफ्ज विद्रोह कर उठते हैं।
खामोश मन को चीर डालती है शब्दों की यह वेदना, 
एक गूंज से पहले ही शब्द खो देते हैं अपनी चेतना।।

कहूंगा तो बहुत शोर हो जाएगा बाहर और अंर्त में, 
ना कहूंगा तो गिर जाउंगा और भी अपने ही गर्त में।
तोड़ दूं खामोशी तो साथ टूटता एक वादा है, 
चुप रहूं कैसे इन शब्दों को बोझ कुछ ज्यादा है।। 

शायद अब भी उसे यकीं है मैं वादा निभाउंगा, 
जो कहा था कभी उससे, वो करके दिखाउंगा।
शायद इसलिए ही तो वो मुझसे बेखबर है, 
वे क्या जाने बेजां शब्दों का हुआ क्या असर है।।

चूभती खामोशी में यूं तो कोई कमी ना है, 
लफ्ज की हुंकार के साथ कैसे जीना है।
इक पल खामोशी, एक पल शोर होता है, 
कभी कभी मेरे अंदर कोई और होता है।। 

ये सुबह, दिन, शाम और ये रात होती है, 
वो सुबह, दिन, शाम वो रात कहां होती है। 
लगता है मर गए है शब्द अब दफनाना होगा, 
बीता वक्त अब इस उलझन को सुलझाना होगा।।

फिर उसका कोई ख्याल मुझे यूं ही बांध जाता है, 
एक सुनहरा ख्वाब मेरे पास यूं ही छोड़ जाता है। 
मार दिए शब्द, जा तुझे मैं माफ करता हूं, 
डरता नहीं हूं, बस तुझसे प्यार करता हूं।। 

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