किस हक से...
अपनी इस बेबसी को मैं क्या अल्फाज दूं,
मेरी खामोश जुबां से मैं कैसे आवाज दूं।
पूछ भी नहीं सकता अब मैं हाल उसका,
वो ही ना पूछ ले, पूछ रहे हो किस हक से।।
दिन-रात उसका ख्याल, उसका तसब्बुर रहता है,
दिल में बैचेनी और मन में उसका ख्याल रहता है।
उसकी ही फिकर है, जो मुझे रातों को जगाती है,
वो ही न पूछ ले, कर रहे हो फिकर किस हक से।।
उसकी नाराजगी को अब मैं और सह नहीं सकता,
अब भी क्या है मेरे दिल में, मैं उसे कह नहीं सकता।
उसे फिर से मना लेने की कोशिश कर नहीं सकता,
वो ही न पूछ ले, मना रहे हो आखिर किस हक से।।
उसकी खता है कोई, या कोई मेरी खता है,
हमारी दुरियां क्या कोई वक्त की सजा है।
सोचता हूं हर खता को अब दरकिनार करते हैं,
वो ही न पूछ ले, कर रहे हो खता आखिर किस हक से।।
मेरे प्यार को जानकर भी मुझसे बहुत दूर है,
जानती है, वो ही मेरी कविता, वो ही मेरा सुर है।
कैसे बताउं कि मैं उसके पास ही रहना चाहता हूं,
वो ही न पूछ ले, पास आ रहे हो आखिर किस हक से।।
कैसे कुछ ही वक्त में हम फिर अजनबी से हो गए,
बन गए अंजाने और कैसे हमारे रास्ते अलग हो गए।
काश ऐसा हो कि हमारी एक अनभूली पहचान बन जाए,
वो ही न पूछ ले, पहचान कर रहे हो आखिर किस हक से।।
उससे ही है घर मेरा, और मेरी खुशियां आबाद है,
वो ही मेरी पहली हंसी है, बाकि उसके बाद है।
जाने कितने ही गैरों में एक वो ही तो अपना खास है,
फिर भी वो ही ना पूछ ले, अपने बन रहे हो आखिर किस हक से।।
कुछ तो हुआ है, आखिर क्या हुआ है हमारे दरमियां,
शायद रास्तों के फासलें हैं, दिलों में तो है नजदिकियां।
काश कुछ कदम तुम चलो, कुछ कदम हम चलते है,
पर फिर वो ही न पूछ ले, साथ चल रहे हो आखिर किस हक से।।
उसकी बेरूखी में भी मुझे मेरा कुछ ख्याल सा लगता है,
मन में उसके भी वक्त से एक बड़ा सा सवाल लगता है।
थोड़ा तुम थोड़ा मैं समझता हूं और सवाल दूर करते हैं,
फिर वो ही न पूछ ले जवाब दे रहे हो आखिर किस हक से।।
उसका ही हाल, उसकी ही फिकर, उसका ही ख्याल है,
उसका रूठना, उसको मनाना, ये दुरियां मेरे पास है।
फिर भी ना जाने दिल में कैसा एक हुआ सवाल है,
गर वो पूछे हाल मेरा, जवाब मैं भी दूं तो आखिर किस हक से।।










Wow good
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