मेरे अल्फाजों पर कभी गौर तो करो

दिल से निकले मेरे अल्फाजों पर कभी गौर तो करो, 
इनमें छिपा है तुम्हारे लिए कहीं प्यार, महसूस तो करो।
एक सूरत एक मूरत भी है कहीं इन शब्दों के आगोश में, 
तुम पहचान लो उसे गौर से और फिर मेरे हवाले करो।।

तुम्हें देखकर अक्सर लरज जाते हैं अल्फाज मेरे, 
इनको छू लो तुम बस एक बार, इन्हें बिंदास करो।
ये लफ्ज कभी कविता कभी गीत भी बन जाते हैं, 
तुम भी तो कभी इन गीतों को गुनगुनाया तो करो।।

तेरे छूने के ही अहसास से ये कैसे मचल जाते हैं, 
तेरे ना होने के ख्याल से ही इनके मायने बदल जाते हैं।
कब से खामोश दफन है लफ्ज कागजों की पहलू में, 
तुम आओ एक बार और इनकी आवाज बन जाया करो।।

मेरे छिपे अहसासों और अरमानों की एक मूरत है ये,
मेरे दिल में कहीं छिपे हुए प्यार की एक सूरत है ये।
यूं तो बंद अलफाजों में प्यार की एक ठंडी सी बयार, 
तुम आकर उसे एक बार इश्क का तूफान कर जाया करो।।

यूं तो लिखा हुआ हर शब्द अपना एक मुकाम रखता है,
गर निकालों मतलब तो हर शब्द एक जहान रखता है।
यूं तो बसी हुई है लिखे हुए लफ्ज में कोई एक कहानी, 
तुम आओ और इन्हें पढ़कर कहानी की एक किताब करो।।

कभी बन जाते हैं ये गुल तो कभी गुलदान है शब्द मेरे,
कभी मौसिकी तो कभी खुश्बू की पहचान है शब्द मेरे।
कभी सलोने रंग है तो कभी बहारों की फरमाईश है ये, 
तुम बन जाओ तितली और फिर इन्हें गुलिस्तान करो।।

कभी शबनमी अहसास, कभी ठहरी हुई सुगंध है ये, 
कभी रजनीगंधा है तो कभी कोई मुकुंद है लफ्ज मेरे।
कभी धूप की तपन तो कभी चांदनी का अहसास है,
तुम पढ़कर मेरे शब्दों को इनको एक सुहानी शाम करो।।

अभी तो बोल भी रहे है शब्द, मेरे अहसासों की कहानी, 
बयां हो रहा है इश्क मेरा, मेरे ही इन शब्दों की जुबानी।
कहीं हो ना जाए ये बेजां और ये सिसककर दम तोड़ दे, 
इनको बोलकर तुम इनकी जिंदगी इनके नाम करो।।

अभी तो बिखरे पड़े है ये कभी सिमट जाने की चाहत में, 
टूटते भी है ये हर रोज, एक बार फिर से जुड़ जाने को।
कहीं कतरा तो कहीं शीशे से बिखर ना जाए अल्फाज मेरे, 
इनसे जुड़कर तुम इनको अपनी सी एक सूरत करो।।

मेरे शब्दों की जुबां, मेरे लफ्जों में भी एक संगीत है, 
इनकी भी है इक आरजू, इनका भी तो कोई मीत है।
लिखता तो कागज पर हूं, पर ये दिल से निकलते है, 
इनको महसूस कर तुम इनको मेरी मोहब्बत करो।।

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