ये भी क्या शौक है जनाब 

जो उनके जुल्म सहे तो हम मजलूम नहीं, 
एक आवाज क्या कर बैठे, हम बागी हो गए।
उनके सितम की इंतहा तो किसी ने नहीं देखी,
मेरे कुछ कहने से पहले सब उनसे राजी हो गए।।

उन्हें गुरूर जरूर रहा होगा उनके रूतबे का, 
और गुमान भी होगा उन्हें हमारे पुतले होने का।
अब ये जरूर वक्त ने कोई साजिश ही की है, 
ये भी पल आ गया है अब किरदार बदलने का।।

आज भी उनके रहनुमाओं की कोई कमी नहीं है,
नहीं रखता कोई हिसाब कभी हमारे जख्मों का।
बस वो सही और हम गलत करार दिए गए हैं, 
कभी तुम भी तो करो अहसास मेरे उन लम्हों का।।

मेरी तबीयत से कब उन्हें कभी कोई ताल्लुक हुआ है, 
दिल खाली उनका हाथ भी उस ही वक्त पीछे हुआ है।
खता किसी पर सजा अक्सर मुकर्रर हुआ करती थी, 
जब भी घूमती थी नजर मुझ पर ही रूका करती थी।।

क्या थे वो अल्फाज जिन्होंने मुझे खलनायक बना दिया, 
सितमगर होकर उन्होंने सबको अपना कायल बना लिया।
कभी कितना बेअसर हुआ करता था किरदार मेरा भी, 
आज उन्हें मतलब पड़ा तो कोई अपना सा याद आ गया।।

ये भी क्या शौक है जनाब अपनी शख्सियत बदलने का, 
ये भी क्या किस्सा है अपनों को अपनों से दूर करने का।
गर आप भी रखते थे हमारी आरजू तो अब तक कहां थे
वक्त बीता है, हम तो अब भी वहीं है पहले भी जहां थे।।

तुम कभी तो ताल्लुक रखते मेरे अंदर के किरदार से 
अतरंगी, मनमौजी, बोलती जुबां के खामोश अरमान से।
कभी तो मिलते, कभी बात करते मेरे अंदर के इंसान से,
कभी तो तुम भी बाहर आ जाते अपने ही अभिमान से।।

तुम्हें तो लगता है मुझे देखकर कि मुस्कुरा रहा हूं मैं, 
खोखली हंसी से अपने ही अश्कों को छिपा रहा हूं मैं।
गलत नहीं हूं फिर भी उजाले डरा देते हैं अक्सर मुझको, 
अंधेरे से अंधेरे में ही अपनी मोहब्बत निभा रहा हूं मैं।।

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