मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : आखिरी पार्ट 


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श्लोक जो तीन साल से कुछ नहीं बोला हैं। कई मनोचिकित्सक उसका इलाज करने या उससे बात करने के लिए जा चुके हैं, परंतु कई प्रयास के बाद भी वे उससे एक शब्द नहीं बुलवा सके हैं। इसके बाद पारूल, जो कि खुद एक मनोचिकित्सक है उसे यह केस सौंपा जाता है। पारूल के भी एक माह तक लगातार प्रयास करने के बाद आखिरकार श्लोक उससे बात करता है। मरीचिका, लोग, रिश्ते ऐसे ही कई बातें उन दोनों के बीच होती है। इन बातों के दौरान ही पता चलता है कि दोनों एक-दूसरे बहुत अच्छे जानते हैं। दोनों एक समय एक-दूसरे से प्यार भी किया करते थे, परंतु एक दिन पारूल में आए बदलाव के कारण दोनों का रिश्ता टूट जाता है। अब आगे...

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पारूल की बेरूखी ने श्लोक को अंदर से तोड़कर रख दिया था। उसके मन में कई सवाल थे, जो वह पारूल से पूछना चाहता था, परंतु पारूल उसके किसी सवाल का जवाब नहीं देती थी। उन दोनों के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही थी। श्लोक अपने सवाल के साथ चुप था और पारूल कुछ न कहने के लिए खामोश। श्लोक की चुप्पी उस पर इस कदर हावी हुई वह खुद को अंदर से टूटा महसूस करने लगा और फिर उसकी नौकरी भी चली गई और वह अपने परिवार से भी दूर हो गया। श्लोक ने बहुत ही शिद्दत से पारूल को प्यार किया था, परंतु पारूल में अचानक आए इस बदलाव के कारण वह पूरी तरह से बिखर गया था। कहते ही डूबते को तिनका सहारा ही बहुत होता है, परंतु श्लोक को ऐसा कोई सहारा नहीं मिला। शायद वह संभल जाता यदि पारूल उससे एक बार बात करती। अगर उसकी कोई मजबूरी थी, श्लोक की कोई बात उसे बुरी लगी थी, श्लोक में अचानक कोई कमी नजर आने लगी थी, पर पारूल की खामोशी ने उसे और भी खामोश कर दिया। ऐसे ही फिर श्लोक इस अस्पताल में आ पहुंचा और फिर एक दिन उसका आमना-सामना पारूल से हो गया। हालांकि वह पारूल से भी बात नहीं करना चाहता था, पर फिर उसने सोचा कि शायद यह उसके पास आखिरी मौका है, जब वह अपनी बात पारूल तक पहुंचा सकता है। दूसरी ओर पारूल भी अपने पिछले दिनों को याद कर रही थी। वह भी सोच रही थी कि श्लोक की इस खामोशी का राज क्या उसके अतीत में ही है, पर उसे भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। अब उसने तय कर लिया था कि अगली बार जब वह श्लोक से मिलेगी तो सीधे खामोशी पर ही बात करेगी, उसे बाकि किसी बात को करने का मौका नहीं देगी। अगले दिन फिर पारूल श्लोक से मिलने के लिए पहुंच जाती है। 

इधर श्लोक भी आज कुछ अलग ही अंदाज में उससे मिला था। आज श्लोक ने हाथ बढ़ाकर पारूल का स्वागत किया। पारूल ने भी उससे हाथ मिलाया। फिर श्लोक मुस्कुराते हुए उसके सामने बैठ गया। फिर एक हंसी के साथ उसने अपनी बात कही कि शायद आप कल रात सोई नहीं है, शायद कुछ सोच रही थी। पारूल जवाब दिया, जी, हां सही कहा आपने। पर मैं आपकी खामोशी का राज खोजने का प्रयास कर रही थी। तो मिला आपको जवाब? आपने अब तक बताया ही नहीं है। हां, उसका जवाब तो मैंने आपको अब तक नहीं दिया है। पारूल ने फिर कहा अब आप कोई और बात करें उससे पहले मैं आपको कह दूं कि मेरे लिए आप सिर्फ एक केस हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं। अतीत में जो हुआ था, वह हो चुका है। हम आज में है और आज में आप मेरे लिए एक केस हैं। आप अपनी खामोशी तो तोड़ ही चुके हैं, अब उस तीन साल की खामोशी की बात भी बता दीजिए। ताकि मैं यहां से चैन से जा सकूं और यदि आपको कोई प्रॉब्लम है तो उसका इलाज किया जा सके। 

कुछ देर तक रूम में खामोशी छा जाती है। फिर श्लोक कहना शुरू करता है। मैं आपके लिए एक केस हूं मैं मान लेता हूं। आप मेरे लिए डॉक्टर है मैं यह नहीं मानूंगा। मैं तीन साल तक खामोश क्यों था, यह तो मैं आपको नहीं बता सकता। पर कुछ है जो आपको बताना चाहता हूं। पारूल ने सवाल किया है क्या ? श्लोक ने फिर आपी बात को कहना शुरू किया। मुझे नहीं पता कि चार साल पहले ऐसा अचानक क्या हो गया था कि आपने मुझे छोड़ दिया। मेरा प्यार आपकी नजर में क्या था, मुझे वह भी नहीं पता, मेरी शख्सियत आपकी नजर में क्या थी मुझे यह भी नहीं पता। आपने अचानक ही मेरा साथ छोड़ दिया, मैं अंदर तक टूट गया था। खुद को संभालने की मैंने काफी कोशिश की, परंतु खुद को संभाल नहीं सका। मेरे पास कई सवाल थे, आपके लिए, पर आपने न तो मेरे सवाल सुने, न उनका जवाब दिया और न ही कभी मुझे समझने की कोशिश की। पिछले कुछ दिनों में हमारे बीच हुई बातें आपके लिए फालतु हो सकती है, पर मेरे लिए वह मेरे तीन साल थे। मरीचिका का क्या होती है, शायद आपको अभी समझ नहीं आएगा। मेरे कई सवाल और आपका एक सवाल हमेशा निरूत्तर रहेगा। हां, पर मेरा दावा है कि आप मरीचिका को बहुत अच्छै से समझ सकेगी। पारूल एक बार श्लोक को आश्चर्य भरी निगाह से देखती है। हम अपने आसपास खुद एक मरीचिका मनाकर रहते हैं। हम जो कहना चाहते हैं, करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाते। कभी हमारा अहम बीच में आता है, कभी परिवार, कभी लोग, कभी कुछ तो कभी कुछ। हम खुद अपनी खुशियों को उस मरीचिका के कारण तौलने लगते हैं, हम अपनी छोटी-छोटी खुशियों की तुलना दूसरों की खुशियों से करने लगते हैं। हमारे अपने परिवार में कोई परेशानी हो तो हम मिलकर उसका सामना करते हैं, परिस्थितियों से समझौता करते हैं, पर बात जब दूसरों की हो तो उनमें खामियां निकालने लगते हैं। परेशानियों, परिस्थितियों के लिए उन्हें जज करने लगते हैं। हम यह नहीं सोच पाते कि इन परिस्थितियों, परेशानियों से हमें भी कभी गुजरना पड़ सकता है या हम गुजर चुके हैं। हम हमेशा दूसरों को दोष देने लग जाते हैं। 

लड़कों को एक ऐसी लड़की चाहिए, जो उसे प्यार करें, उसका घर संभाले, उसके प्रति ईमानदार रहे, पर वह खुद इन जिम्मेदारियों को कितना उठाता है। वहीं लड़कियों की ख्वाहिश एक अच्छा घर, अच्छा परिवार चाहिए, चाहे फिर उसके खुद अपने घर के हालात कितने ही बुरे क्यों न हो। अपने घर में समझौता कर सकती है तो दूसरे घर में जाने के लिए शर्ते लागू क्यों होती है। हमें दोस्त ऐसा चाहिए जो हर मुश्किल घड़ी में हमारे साथ खड़ा हो, वहीं दोस्त अगर मुश्किल में आ जाए तो हमें अपनी ही परेशानी से मुक्ति नहीं मिलती है। रिश्तेदार ऐसे हो जो सुख-दुख में साथ दे, मदद के लिए आगे रहे, उन्ही रिश्तेदारों को अगर मदद की जरूरत पड़ जाए तो कहा जाता है कि अभी तो हम खुद ही परेशान चल रहे हैं। हम खुद में ही कितने खुदगर्ज हो जाते हैं कि हम दूसरों को देख भी नहीं पाते। दूसरों के दुख तकलीफ हमें महसूस नहीं होती, शायद जिसका कारण हम खुद भी हो सकते हैं। हम ऐसे क्यों हो जाते हैं। क्यों हम दूसरा का फायदा उठाने के बारे सोचते रहते हैं। क्यों दूसरी की भावनाएं हमारे मतलब के आगे मर जाती है?  ऐसा क्यो, दूसरों को हमेशा जज करने या दोष देने की इस मरीचिका का भ्रम हम आखिर कब तोड़ेगें। रेगिस्तान की मरीचिका तो आंखों का एक धोखा है, परंतु हमारी असल जिंदगी में जो ये मरीचिका है, यह आंखों का धोखा नहीं यह खुद के साथ, दूसरों के साथ धोखा है। हमें इस मरीचिका को तोड़ना होगा। सच से सामना करना होगा। तभी हम इस मरीचिका के भ्रम से बाहर आ सकेंगे और खुद को एक बेहतर इंसान बना सकेंगे और एक बेहतर इंसान की पहचान भी कर सकेंगे। इतना कहने के बार श्लोक एक बार फिर खामोश हो गया। कुछ देर रूम में खामोशी रही, जिसे पारूल ने तोड़ा और फिर कहा कि आप अपनी खामोशी के बारे में बताइए। 


पारूल के शब्द सुनने के बाद श्लोक कुर्सी से खड़ा हुआ। उसी खिड़की के पास पहुंच गया। कुछ देर तक वहीं खड़े रहने के बाद वह फिर पारूल से बोला आपको सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहिए? पारूल ने हां कहा। अगर आपकी तरह ही आपके सवाल का जवाब खामोशी हो तो आप क्या करेगी। पारूल ने कहा कि कुछ भी हो जाए मैं आपकी उस खामोशी के राज को जानकर रहूंगी, उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े मैं करूंगी। अच्छा क्या कर सकती है आप? श्लोक ने पारूल से पूछा। वक्त के साथ आपको सब पता चल जाएगा। श्लोक ने फिर पारूल से पूछा क्या आप मेरे चार साल पहले के कुछ सवालों का जवाब दे सकती है। पारूल इस पर कुछ नहीं कहती। श्लोक जोर से हंसते हुए खामोशी, खामोशी, खामोशी......। पारूल उठकर कमरे से जाने लगती है, तब तक दोनों ही आपस में कोई बात नहीं करते हैं, पारूल ने रूम का दरवाजा खोला ही था कि एक आवाज उसके कदमों को वहीं रोक देती है। वह पलटकर देखती है कि श्लोक वहीं खिड़की के पास गिरा हुआ है, उसके सिर से खून बह रहा है और वह लगभग अचेत हो चुका है। वह पास जाकर देखती है तो उसके चेहरे पर एक मुसकान उसे नजर आती है, जैसे श्लोक आखिरी बार कह रहा हो कि तुम्हारी खामोशी की मरीचिका ने मुझे तीन साल तक खामोश रखा था, मेरी यह कभी न टूटने वाली खामोशी की मरीचिका अब तुम्हें हमेशा एक भ्रम में ही रखेगी। 

बहते हुए खून और अचेत पड़े श्लोक को देखकर पारूल को भी कुछ होश नहीं रहा था। उसकी आंखों से बस आंसू निकल रहे थे, वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी। गोली चलने की आवाज सुनकर अस्पताल के कुछ लोग उस कमरे में आ गए थे। कुछ ने पारूल को संभाला और कुछ उस स्थिति को संभालने की कोशिश में लग गए थे। फिर पुलिस, अस्पताल में भागदौड़ सब होता रहा, पर पारूल उस पल के बाद ही खामोश हो गई थी। उसके कानों में श्लोक की वो आखिरी हंसी और उसके कहे शब्द ही गूंज रहे थे, खामोशी, खामोशी, खामोशी......। वह अब भी श्लोक के मरीचिका शब्द का अर्थ खोजने का प्रयास कर रही थी। 


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