कौन है मेरे अंर्त में... 


शोर कितना भी हो, 

फिर भी एक आवाज बड़े जोर से आती है।

मेरे अंदर की आवाज, 

अक्सर मेरे कान तक पहुंच जाती है।।


कभी दिल, कभी मन, कभी अंर्त मन होता है, 

कभी गुम, तो कभी आसपास रहता है।

कौन है जो मेरे अंदर ही रहता है,

कभी खामोश कभी बहुत कुछ मुझसे कहता है।।



उसकी कही गई बातें, 

कभी सही तो कभी गलत लगती है।

कभी वो कुछ ऐसा कहता है, 

कि अक्सर चुभन सी लगती है।।


आज फिर शायद उस दिल ने, 

मुझे एक ताना मारा है।

पूछ रहा है कहां है मेरे अपने, 

तू तो कहता था ये जहां तेरा सारा है।।


आज पूछ रहा है वो मुझसे, 

क्या हासिल मेरी मिल्कियत है।

अश्कों से भरी आंखे,

और कुछ उदासी मेरी तबीयत है।।


ले जाकर मुझे यादों के गहरे समंदर में, 

वो अक्सर मुझसे मेरी ही बातें करता है।

करके कुछ सवाल मुझसे अजब से, 

अक्सर मेरी रातें जागती करता है।।


करना चाहता हूं उसे जितना खामोश, 

वह उतना ही मेरे अंदर शोर करता है।

कभी रोता है, कभी हंसता है, 

और कभी कभी मुझ पर ही जोर करता है।।


कभी बदतमीज, कभी तहजीबदार होता है, 

कभी चंचल भी जैसे कई रूप अख्तियार करता है।

मेरे अपनों के असली चेहरे दिखाकर, 

वो मुझे अक्सर तैयार करता है।।


जो मैं अकेला हूं तो बात उससे हो जाती है, 

अब रोज ही उससे मेरी मुलाकात हो जाती है।

कभी मेरी तो कभी अपनों की बातें वो करता है, 

ये शायद मैं ही हूं अंर्त में, जो खुद से बातें करता हैं।।


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