मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 3


वहां से पारूल सीधे अपने घर पहुंचती है। उसके दिमाग में अब भी उस शख्स की बातें घूम रही थी। वह तय नहीं कर पा रही थी कि आखिर उस शख्स की बातों का मतलब वह क्या निकाले, पर फिर वह उन बातों के बारे में ही सोच रही थी। अगले दिन एक बार फिर पारूल उस शख्स के सामने खड़ी होती है। वह शख्स पारूल को देखता है और उसके सामने कुर्सी पर आकर बैठ जाता है। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुसकान आती है और फिर वह पारूल को देखकर कहता है कि लगता है आपने मरीचिका के बारे में पता कर लिया है। पारूल कहती है कि मुझे मरीचिका का मतलब कल भी पता था। पर शायद आपका कल और बात करने का मन नहीं था, इस कारण मैं चली गई थी। वह शख्स एक बार फिर पारूल को देखकर मुस्कुरा देता है। पारूल अपनी बात जारी रखते हुए उससे कहती है कि आप जो कह रहे हैं उन बातों के बहुत अर्थ हो सकते हैं। मरीचिका जीवन में हो या रेगिस्तान में हो वह हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती ही है। उसमें फंसने या छूट जाने का मतलब नहीं निकलता है। यह सिर्फ व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है कि मरीचिका के बारे में क्या सोच रहा है। वैसे मैं सबसे पहले आपका नाम जानना चाहूंगी और आपके बारे में भी कुछ जानकारी चाहती हूं। श्लोक, श्लोक नाम है मेरा। एक छोटे शहर से वास्ता रखता हूं। अब इस दुनियां में अकेला हूं। पारूल फिर उससे एक सवाल करती है तो आपकी तीन साल की इस चुप्पी का कारण ? मुझसे पहले पांच लोग आपसे मिलने आ चुके हैं, परंतु आपने उनसे कुछ नहीं कहा कि परंतु मेरे सामने न सिर्फ आप बता कर रहे हैं, बल्कि अपने बारे में भी बता रहे हैं, तो मैं जानना चाहती हूं कि आपने ऐसा क्यों किया। पारूल के इन सवालों के जवाब में श्लोक एक बार हंसता है और फिर कहता है कि जब चुप था तब भी कई सवाल आज बोल रहा हूं तब भी कई सवाल है। ये सवाल ही तो है जो मनुष्य को भ्रम में ले जाते हैं। 



पारूल जी चलिए मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा, पर क्या आप अपने उन सवालों के जवाबों पर यकीन करेंगी? पारूल एक बार उसे अचरज भरी निगाह से देखती है, फिर कहती है पहले आप जवाब तो दीजिए। मेरी चुप्पी के कारण थे वो चार कत्ल, जो मैंने किए थे। पारूल श्लोक की बात को सुनकर एकदम चौंक जाती है और फिर कुछ संभलते हुए सवाल करती है कि पर क्यों और किन लोगों के कत्ल। मेरे ही परिवार के लोग थे, उनके कत्ल कर मैंने उन्हें अपने ही घर में दफन कर दिया और फिर भाग गया। भागते हुए यहां आ गया। कत्ल के बाद से मेरे होंठों पर चुप्पी थी, जो आपके कारण टूट गई। पर आपने अपने ही परिवार का ही कत्ल क्यों किया? श्लोक ने कहा कि मैं आपके इस सवाल का जवाब भी दूंगा, पर क्या आपने मेरी बात पर यकीन कर लिया? पारूल उसे एकबार फिर असमंजस भरी नजरों से देखती है। इस पर श्लोक कहता है कि इसलिए मैंने आपसे पहले सवाल किया था कि क्या आप मेरे जवाबों पर यकीन करेंगी। मैं सच कह रहा हूं या झूठ यह कौन और कैसे तय करेगा। मैंने कहा कत्ल किए और एक मिनट के लिए ही सही पर आपने उसे सच मान लिया। पारूल जी यही बातें है जो मनुष्य को एक मरीचिका का भ्रम देती है। हालांकि मरीचिका खुद एक भ्रम पर मनुष्य एक भ्रम के भी भ्रम में फंस जाता है। 


क्या आप मुझे बता सकती है कि दुनियां में सच क्या है और झूठ क्या है? दुनियां में कई सच है और कई झूठ है। पारूल ने कहा। जी, मैं भी तो वहीं जानना चाहता हूं कि आखिर सच क्या है और झूठ क्या। क्या झूठ कभी सच था, या सच कभी झूठ हो सकता है। सच आखिर है क्या। जो परखा गया हो? जो मान्य हो? या जिस पर यकीन हो जाए बस वही सच है? जी, नहीं सच को कभी परखने की जरूरत नहीं होती है, पारूल ने कहा। यदि सच को परखने की जरूरत नहीं होती है तो माता सीता को अग्नि परीक्षा क्यों देना पड़ी थी। वहां भी तो सच की परख हुई थी। श्लोक की इस बात पर पारूल लगभग निरूत्तर हो जाती है, वह बस उसे एकटक देखती रहती है। पारूल अगर मैं कहूं कि झूठ कि बुनियाद ही सच की परख है तो क्या आप मानेंगी। पारूल ने कहा कि श्लोक सच और झूठ के अपने अपने पैमाने हैं। यह निर्भर करता है कि बोला क्या जा रहा है सच या झूठ फिर उस पर निर्णय लिया जाता है कि सच क्या है और झूठ क्या है? जो आप कह रहे हैं वह भी सही है, परंतु यह कैसे कह सकते हैं कि झूठ की बुनियाद सच की परख है। श्लोक ने पारूल की बात के जवाब में कहा कि जब बार बार सच को परखा जाएगा तो कभी तो उसके बदले कोई ऐसी बात आएगी ही जो सच को छुपा दे और सच की परख करने वाले को सच की परख ही न करने दे। यानि कि सच को परख से बचाने के लिए उस सच के बदले एक झूठ। हर बार ही सच की परख नहीं होती हैं, पारूल ने कहा। पर हर बात सच हो ये भी तो जरूरी नहीं है ना? कोई बात सच है या झूठ उसे कैसे तय किया जा सकता है। मतलब साफ है कि अगर बात सच है तो उसे भी और अगर बात गलत है या झूठ है तो उसे भी परखा तो जाएगा ही। अगर झूठ है और फिर उसे परखा गया और वह झूठ झूठ साबित हुआ तो कोई बात नहीं परंतु यदि वह बात सच है और फिर भी उसे परखा गया तो फिर बात वहीं आ जाती है कि सच को हमेशा परखा ही जाता है। श्लोक की इन बातों से पारूल को उलझन में डाल दिया था। वह कहती है कि मतलब यह कि आपने अभी झूठ कहा था कि आपने अपने परिवार का कत्ल किया है? तो फिर आपकी वह खामोशी ? श्लोक ने फिर कहा कि मैंने अपने पूछा था कि क्या आप मेरी बात पर यकीन करेंगी? मैंने अपनी एक बात कही थी, वह सच है या झूठ यह तो आपके मानने पर निर्भर करता है। मैंने कहा कि मैंने अपने परिवार का कत्ल किया और आपने मान लिया। अब आप उसे झूठ मान रही है। तो फिर आप ही बताए कि मेरी बात सच है या झूठ। खैर रही बात मेरी खामोशी की तो अब तो मेरी खामोशी रही ही नहीं तो उस पर सवाल क्यों? मैं खामोशी पर कुछ कहूं भी तो फिर वही बात कि क्या आप उस पर यकीन करेंगी? इस बार आप और भी ज्यादा संशय में रहेगी कि मेरी बात सच है या झूठ। फिर आप उसे या तो सच मानेगी या फिर झूठ। अगर सच मान लिया तो फिर आपका कोई सवाल नहीं होगा, पर झूठ माना तो फिर एक अगला सवाल। पारूल जी जिस मरीचिका की बात मैं कर रहा था वह यही तो है। आप, मैं और हमारे जैसे न जाने कितने ही लोग इस मरीचिका में उलझे हैं और सच और झूठ के इसी भ्रम में जी रहे हैं। हमें असलियत में पता ही नहीं है कि आखिर सच क्या और झूठ क्या है? कुछ लोग कहते है कि हम अपनी आंखों देखी पर यकीन करते हैं और वह सच होता है पर रेगिस्तान में दूर एक पानी की झील भी तो आप ही देखते हैं और जब वहां पहुंचते हैं तो वहां कुछ नहीं होता। तब क्या सच होता है और क्या झूठ होता है। 


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