मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर : पार्ट 1



गर्मी के दिनों में रेगिस्तान में लोगों को पानी होने का भ्रम होता है, जिसे मरीचिका कहते हैं। ये भ्रम ऐसा होता है कि रेगिस्तान में खड़ा व्यक्ति स्वतः ही उस भ्रमित झील की ओर चल पड़ता है, परंतु ज बवह उस स्थान पर पहुंचता है तो उसे वहां रेत के सिवाय कुछ नहीं मिलता। मिलता है तो एक और भ्रम। फिर कुछ दूरी पर उसे पानी होने का आभास होता है और वह इस भ्रम में ही रह जाता है कि रेगिस्तान में उसे पानी मिलेगा, पर वो इस भ्रम से निकल नहीं पाता है। ऐसा ही भ्रम मेरी इस कहानी में भी है, जिसमें कई लोग फंसे है और निकल नहीं पाते। इस कहानी में मेरे कुछ तर्क ऐसे भी है जो आप सभी पाठकों को विरोधाभासी लगे, परंतु कहानी के पात्रों के कारण मैं उन तर्कों का प्रयोग कहानी में कर रहा हूं, परंतु मेरा उद्देश्य उन तर्कों को उचित ठहराना या जिन विषयों पर वो तर्क कर रहा हूं उनका विरोध करना बिल्कुल भी नहीं है। इस कहानी में मैं एक नया प्रयोग करने जा रहा हूं, जो संभवतः आपको पसंद आए यह कहानी में वर्तमान से फ्लैश बैक में प्रस्तुत करूंगा। तो आइए शुरू करते है कहानी मरीचिका : कहानी जो कर देगी आपको सोचने पर मजबूर। 


पारूल के कपड़ों पर खून ही खून ही लगा था। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा रूकने का नाम नहीं ले रही थी। वह उस अस्पताल के एक कोने में बैठी बस एकटक एक कमरे को देखकर रोए जा रही थी। उसे इतना भी आभास नहीं था कि अस्पताल परिसर में इस समय हडकंप सा मचा हुआ है। पुलिस से लेकर अस्पताल के कर्मचारी डॉक्टर इधर-उधर दौड़ रहे हैं। अस्पताल में मौजूद अन्य मरीज शोर कर रहे हैं। मीडिया के लोग अपना काम कर रहे हैं। इन सबके बीच भी पारूल जैसे शून्य में थी और उसकी नजरें उस अस्पताल के उस खास कमरे पर ही टिकी हुई थी। अस्पताल के कुछ कर्मचारी एक स्ट्रेचर लेकर उस कमरे से बाहर निकले उस पर एक लाश थी, जो कि एक सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। उस चादर का एक हिस्सा खून से लाल हो चुका था। जैसे वे कर्मचारी उस लाश को स्ट्रेचर पर लेकर बाहर निकले, कोने में बैठी पारूल जो से चीख पड़ी। अस्पताल की कुछ नर्सों ने उसे पकड़ा और संभालने की कोशिश की। वहीं पुलिस की कुछ महिलाकर्मियों ने भी उसे संभालने का प्रयास किया। अस्पताल के लोगों ने उस स्ट्रेचर को लाश के साथ ही वहां खउ़ी एक एबूंलेंस में रख दिया और फिर वह एबूंलेस वहां से रवाना हो गई। करीब एक घंटे के बाद अस्पताल में एकदम शांति छा गई थी। पारूल अब भी उसी कोने में बैठी उस कमरे को लगातार देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर आंसूओं के दाम साफ देखे जा सकते थे। तभी कंधे पर रखे एक हाथ ने उसे शून्य से फिर से वर्तमान में खींच लिया था। कंधे पर रखा हाथ एक 7 साल की बच्ची का था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने पारूल को देखा और कहा आंटी, आप क्यों रो रही हो, क्या आपको भी चोट लगी है? आप रो मत मैं भगवान जी से कहूंगी कि वो आपकी चोट भी जल्दी ठीक कर दें। इतना कहकर वो लड़की एक बार फिर मुस्कुराई और पारूल के गालों पर आंसूओं की कुछ बुंदे थी उन्हें अपने नन्हें से हाथों से पोछते हुए वहां से चली गई। पारूल उस लड़की को जाते हुए देख रही थी, वो छोटी लड़की भी पारूल को जाते-जाते देख रही थी और मुस्कुरा रही थी। पारूल के कंधे में उस नन्हें हाथ के स्पर्श ने उसे संभलने का मौका दिया और फिर पारूल अपना बैग, कुछ किताबें, अपना मोबाइल समेटकर खड़ी हुई भारी कदमों से उस अस्पताल से बाहर आ गई। 


कुछ ही देर में पारूल अपने घर पर आ गई थी। वह अब भी मायूस थी अपना सामान एक टेबल पर रखने के बाद वह अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसके चेहरे पर उदासी साफ नजर आ रही थी। कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद पारूल उठी और बाथरूम में चली गई और नहाकर फिर बाहर आ गई। अब पारूल कुछ हद तक संभल चुकी थी। फिर उसने पानी पिया और फिर से उसकी कुर्सी पर आकर बैठ गई। ऐसे ही बैठे बैठे पारूल अपने बीते दिनों की यादों में खो गई थी, जो कि आज से करीब चार साल पहले शुरू हुई थी। तब पारूल एक छोटे शहर से साइकलॉजी का कोर्स खत्म कर आई थी और करीब छह महीने से एक डॉक्टर मिहिर रस्तोगी के साथ काम कर रही थी। एक दिन मिहिर ने पारूल को अपने केबिन में बुलाया और पारूल कुछ ही देर में उनके केबिन में पहुंच गई थी। पारूल के केबिन में पहुंचने के बाद डॉक्टर मिहिर ने अपनी बात कहना शुरू की। पारूल आज मैं तुम्हें एक केस देना चाहता हूं। इस केस में हो सकता है तुम्हें काफी मेहनत करना पड़े और यह भी हो सकता है कि तुम बहुत ही जल्दी इस केस को सॉल्व भी कर दो। वैसे ये केस हम दोनों के लिए एक चैलेंज है। पारूल ने कहा कि ऐसा क्या केस है सर, कि जो हमारे लिए चैलेंज है? मिहिर ने पारूल से कहा कि चैलेंज इसलिए कह रहा हूं पारूल क्योंकि हमसे पहले करीब पांच डॉक्टर इस केस पर काम कर चुके हैं, पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है। अब यह केस हमारे पास आया है और मैं चाहता हूं कि तुम इस केस को अकेले हैंडल करो। इससे तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा और साथ ही तुम्हें एक नया अनुभव भी मिलेगा। अगर देखा जाए तो साइकलॉजी के क्षेत्र में यह केस अपने अपने आप में एक अनुठा केस है, जहां देश के पांच बड़े साइकलॉजिस्ट इस केस में सफल नहीं हो सके हैं और अब यह केस हमारे पास है, यानि कि छठवे डॉक्टर के पास। मैं चाहता हूं कि अब इस केस में कोई सातवां डॉक्टर न आए और तुम इस केस को सॉल्व करो। पारूल ने कहा कि जी, सर मैं पूरी कोशिश करूंगी। इसके बाद डॉक्टर मिहिर ने पारूल को एक फाइल दी और कहा कि ये केस की पूरी जानकारी है। इसके साथ ही उन पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट भी जो तुमसे पहले इस केस पर काम कर चुके हैं। इसे बहुत ध्यान से पढ़ना, इससे तुम्हें केस में मदद मिल सकती है। अगर कोई परेशानी आती है तो मैं तो हूं कि, पर फिर भी यह केस सिर्फ तुम्हारा है। तुम्हें यह केस हर हाल में सॉल्व करना है। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा यकीन है कि तुम इसमें जरूर सफल रहोगी। पारूल ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए कहा कि जी, सर मैं हर संभव कोशिश करूंगी कि आपको मैं निराश न करूं। ओके तो अब तुम जा सकती हो पारूल। तुम फाइन की स्टडी करने के बाद मुझे बता देना कि तुम कब से इस केस पर काम शुरू करोगी तो मैं बाकि अरजमेंट कर दूंगा। जी, सर। इतना कहकर पारूल वह फाइल लेकर मिहिर के केबिन से चली गई। 


घर पहुंचकर पारूल ने वह फाइल खोली और उसे पढ़ना शुरू किया। फाइल में जो लिखा था उसके अनुसार एक लड़का 32 या 34 साल का था। पिछले तीन सालों से वह एक मनोरोगी चिकित्सालय में रह रहा था। उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं मिली थी। पुलिस ने अपनी ओर से कई प्रयास किए थे कि उसका कोई परिचित, कोई रिश्तेदार, परिवार के संबंध में कोई जानकारी मिले, परंतु वह भी हासिल नहीं हो सकी थी। फाइल में इस बात का खास तौर पर उल्लेख किया गया था कि जबसे वह हॉस्पिटल में आया है, तब से उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला है। वह हमेशा ही चुप रहता है। हमेशा शांत बना रहता है, अन्य मरीजों के तरह वह कभी भी हाईपर नहीं हुआ है। हॉस्पिटल स्टॉफ द्वारा उससे जो कहा जाता है वह उसे कर देता है। उसका दिमाग स्थिर है, परंतु जिस तरह से वह रहता था वह लोगों को परेशान करता था। तीन साल तक उसके मुंह से किसी ने कोई शब्द नहीं सुना था। फाइल में जो पांच डॉक्टर्स की रिपोर्ट थी उसमें भी यही एक बात विशेष तौर पर लिखी थी कि उसका इलाज तब ही संभव हो सकता है कि जब वह कुछ बोले और अपने बारे में बताए। किसी बात का अंदाजा लगाने भर से उसका इलाज किया जाना असंभव है। जब तक उसकी परेशानी या मानसिक स्थिति के बारे में कुछ पता नहीं चलेगा तो उसका इलाज कैसे किया जा सकता है। किसी डॉक्टर ने छह माह, किसी ने एक साल तक उससे बात कर उससे कुछ बोलने के लिए मेहनत की परंतु उसके मुंह से कभी कुछ नहीं निकला। पारूल उस फाइल को पढ़ते हुए थोड़ा अचरज में थी कि कैसे कोई व्यक्ति 3 साल से चुप है? पारूल की उस व्यक्ति से मिलने की इच्छा तीव्र हो रही थी। हालांकि उसने फाइल को एक बार फिर ध्यान से पढ़ा, परंतु इस बार भी उसे कुछ खास जानकारी नहीं मिली थी। अब पारूल ने तय कर लिया था कि वह उस व्यक्ति से मिलने के बाद ही उसके इलाज के बारे में तय करेगी कि क्या और कैसे करना है। 


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