बस जिद है तुम्हारी
तुम जिद कर रहे हो घर आने की, तो चलो इजाजत देता हूं,
दरवाजे खोल कर घर के तुम्हारा स्वागत करता हूं।।
गर आओ घर मेरे, तो कदम संभाल कर रखना,
फर्श पर अक्सर मेरे कुछ गम बिखरे होते हैं।।
नजर भर देखना मेरे घर की दरो दिवारों को,
और नजर फेर देना, देखकर मेरे जख्मों के निशानों को।।
तकल्लुफ न करना बस आराम से बैठ जाना,
कुछ अपनों ने ही कुरेद दिया है मेरे घर का सोफा।।
अलमारी में रखी है किताबें, बस उन्हें ऐसे ही रहने देना,
जिल्द में छिपी है कुछ तकलीफें, उन्हें वही रहने देना।।
दूर से आए हो लो थोड़ा सा पानी ही पी लो,
हो सकता है लगे कुछ खारा, शायद मेरा कोई आंसू गिर गया होगा।।
देख रहा हूं, तुम्हें घर कुछ बिखरा सा लग रहा है,
हां, इस घर में ना जाने कितनों के मुखोटे टूटे हैं।।
घर में आ भी रही होगी तुम्हें कुछ अजीब सी गंध,
हां, लंबे समय से घर में परिस्थितियों की कुछ सीलन है।।
लगता है घर में खोज रहे हो तुम कोई आईना,
तोड़ दिया मैंने उसे अक्सर मेरी मजबूरी पर हंसता था।।
आए घर तो अब समय की परवाह मत करना,
यहां इंसान बदलते हैं, वक्त नहीं बदलता।।
तुम्हें खाने को क्या दूं कुछ समझ ही नहीं आता,
तानें, बातें और मेरे अश्कों से मेरा गुजारा हो जाता है।।
बस तुम्हारी ही जिद थी मेरे घर तक चले आने की,
वरना कोई कमी नहीं थी इसके श्मसान बन जाने की।।
देखो किसी से न कहना कि तुम मेरे घर आए थे,
फिर तुम्हें ही कोशिश करना होगी, लोगों को बहकाने की।।











Kya bat he... Good
ReplyDeleteBahut khub
ReplyDeleteवाह से आह तक का सफर👌
ReplyDelete