एक दिन अचानक
पार्ट 2
इन सभी बातों से विशाखा अंजान थी। उसे नहीं पता था कि जिस गांव का नाम उसने सपने में सुना था, उसका एक भयानक इतिहास भी था। हालांकि इंटरनेट के जरिए उसे गांव के होने का तो पता चल गया था, परंतु उसे अभी यह नहीं पता था कि ये गांव एक समय अपने आप में यमराज की भूमि के नाम से जाना जाता था। लोग कहते थे कि स्वयं यमराज के दूत यहां इंसानों के भेष में हथियारों के साथ घूमते हैं। वे किसी की हत्या के पहले बिल्कुल नहीं सोचते थे कि इसका अंजाम क्या होगा? न ही ये सोचते थे कि जिसकी वे हत्या कर रहे हैं, उसके परिवार पर क्या गुजरेगी? उन्हें सिर्फ हत्या से काम था। सिर्फ मुखबिरी का शक या किसी दूसरे गैंग से संबंध होने की अफवाह भी उन्हें मिल जाए तो वे उस व्यक्ति की मुलाकात सीधे यमराज से करा देते थे। एक ओर जहां विशाखा इस बात से अंजान थी, वहीं दूसरी ओर प्रभात इस गांव का इतिहास निकालने और विशाखा के सपने का इस गांव से कोई संबंध होने की संभावना को तलाशने में लग गया था।
इस दौरान उसे पता चलता है कि 70-80 के दशक में कसाना गांव में चार गैंग का यहां काफी खौफ हुआ करता था। इनमें एक गैंग का प्रमुख हुआ करता था दिलावर शेख। यह अपने नाम की तरह ही बेखौफ था और निर्दयता इसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। बच्चा, बूढ़ा, जवान, औरत इसके लिए कोई मायने नहीं रखते थे यह किसी पर भी बेरहमी से टूट पड़ता था। दूसरी गैंग का सरगना था अनवर हुसैन। यह भी दिलावर से कम नहीं था। अपना वर्चस्व बनाने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकता था। वहीं तीसरी गैंग थी रणबहादूर उर्फ राणा की। इसका मकसद बाकि तीन गैंग का खात्मा करना था, परंतु दूसरी गैंग से संबंध रखने वाले या इसकी मुखबिरी करने वालों के लिए यह किसी जल्लाद से कम नहीं था। वहीं चौथी गैंग जो कसाना में सक्रिय थी वह थी अनुज पांडे की, यह गांव में पंडित के नाम से जाना जाता था। यह हालांकि अभी युवा ही था और यह काफी दिलेर भी था। यह अक्सर गलत के खिलाफ आवाज उठाता था और इसका मकसद इन तीन गैंग को खत्म कर गांव में शांति बनाना था। इसके लिए यह तीनों गैंग से दुश्मनी मोल ले चुका था। इसने अपनी गैंग भी सिर्फ इन तीन गैंग के खात्मे के लिए ही तैयार की थी। इसकी गैंग के द्वारा अक्सर बाकि तीन गैंग के लोगों का ही खात्मा होता था। बाकि गांव में इसकी काफी इज्जत थी। वक्त बीतता गया और इन चारों गैंग की गैंगवार में कोई कमी नहीं आ रही थी। हर गैंग का सदस्य दूसरी गैंग के सदस्य के खात्में के लिए खून का प्यासा सा घूमता था। कई बार पंडित की गैंग और बाकि तीन गैंग के बीच गैंगवार इसलिए भी हुई कि पंडित की गैंग ने उन्हें गलत करने से रोकना चाहा। इसके लिए तीनों ही गैंग अब हर संभव तरीके से पंडित को अपने रास्तें से हटाना चाह रही थी। चारों गैंग के बीच होने वाली गैंगवार को पुलिस भी रोकने में असमर्थ थी। हालांकि गैंग के सभी लोग जानते थे कि इस गैंगवार से उनका काफी नुकसान होता है, आदमी मारे जाते हैं, फिर कानून का डर कुछ तो बना ही रहता है, वहीं राजनेता भी, जिनके हाथ इन गैंग के सिर पर होते थे, वे भी लताड़ लगा दिया करते थे। इसके बाद भी अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इन गैंग की आपस में गैंगवार हुआ करती थी।
पंडित, जिसकी गांव में काफी इज्जत थी, उसका घर गांव के बीचों-बीच था। वह यहां अपनी मां, अपने छोटे भाई और बहन के साथ रहता था। गांव में ही उसकी एक प्रेमिका भी थी, जिसका नाम प्रिया था। दोनों जल्द ही शादी करना चाह रहे थे। दोनों परिवारों के बीच शादी को लेकर रजामंदी भी बन गई थी। पंडित के पिता बाकि अनवर औद दिलावर की गैंग के बीच चल रही गोलीबारी में मारे गए थे। ऐसा अक्सर होता था कि गैंग के बीच होने वाली लड़ाई में कोई ना कोई गांव का व्यक्ति ऐसे ही मारा जाता था। ऐसा ही पंडित के पिता के साथ भी हुआ था। इसी कारण उसने बाकितीन गैंग के सफाए का प्लान का तैयार किया और उनका मुकाबला करने के लिए मैदान में उतर आया था। इसकी जानकारी अन्य राजनेताओं और पुलिस को भी थी। पुलिस कइ्र्र बार चोरी छिपे पंडित को सपोर्ट भी किया करती थी। वहीं कुछ राजनेता जहां उसके साथ थे, वहीं कुछ उसे रास्ते से हटाने के लिए बाकि गैंग को मदद करते थे। दो से तीन बार पंडित पर हमला भी हुआ था, परंतु वह हर बार बच गया था।
वहीं दूसरी ओर दिलावर के पांच भाई और थे, जो कि उसकी गैंग में हमेशा उसके साथ खड़े रहा करते थे। इन छह भाईयों के एक साथ होने के कारण यह गैंग काफी खतरनाक थी। वहीं अनवर हुसैन दूसरे शहर से तड़ीपार होने के बाद इस गांव में आया था। यहां बसने के बाद उसने अपने वहीं के साथियों को यहां लाकर अपनी गैंग फिर से खड़ी कर ली थी। एक समय दिलावर और अनवर की गैंग ही वर्चस्व की लड़ाई लड़ा करती थी। परंतु बाद में राणा भी इनको टक्कर देने के लिए मैदान में उतर आया था। राणा भी अपने परिवार के साथ रहता था और गांव का काफी अमीर आदमी भी था। उसने अपने पैसों के बल पर ही अपनी गैंग को खड़ा किया था। इस प्रकार यहां चलने वाली चारों गैंग में सिर्फ पंडित ही एक मकसद के साथ लड़ रहा था, बाकि अपना वर्चस्व बनाने और बचाने के लिए आपस में लड़ रहे थे और उनके इस खेल में कई गांव वाले अपनी जान से हाथ धो बैठते थे।
एक बार पंडित अपने गांव से बाहर किसी काम से गया हुआ था। तब दिलावर की गैंग के एक आदमी ने पंडित के घर के बाहर बम फेंक दिया था। हालांकि बम से घर को कुछ नुकसान हुआ, परंतु पंडित के भाई-बहन और उसकी मां इस हमले में बच गए। बम के फटने के बाद गांव के बाकि लोगों ने मदद की थी। बम की सूचना मिलते ही पंडित अपने घर आ गया था। वह तुरंत ही दिलावर की पूरी गैंग का सफाया करना चाह रहा था, पर गांव के कुछ बुजुर्गों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इसके बाद उसने अपने परिवार के लोगों को पास के दूसरे गांव में अपने एक दोस्त के घर भिजवा दिया, ताकि इस गैंगवार में उसके परिवार के लोगों को कुछ हो ना जाए, पर शाख्द अनवर की गैंग के लोगों को इस बात की जानकारी मिल गई थी।
इस दौरान उसे पता चलता है कि 70-80 के दशक में कसाना गांव में चार गैंग का यहां काफी खौफ हुआ करता था। इनमें एक गैंग का प्रमुख हुआ करता था दिलावर शेख। यह अपने नाम की तरह ही बेखौफ था और निर्दयता इसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। बच्चा, बूढ़ा, जवान, औरत इसके लिए कोई मायने नहीं रखते थे यह किसी पर भी बेरहमी से टूट पड़ता था। दूसरी गैंग का सरगना था अनवर हुसैन। यह भी दिलावर से कम नहीं था। अपना वर्चस्व बनाने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकता था। वहीं तीसरी गैंग थी रणबहादूर उर्फ राणा की। इसका मकसद बाकि तीन गैंग का खात्मा करना था, परंतु दूसरी गैंग से संबंध रखने वाले या इसकी मुखबिरी करने वालों के लिए यह किसी जल्लाद से कम नहीं था। वहीं चौथी गैंग जो कसाना में सक्रिय थी वह थी अनुज पांडे की, यह गांव में पंडित के नाम से जाना जाता था। यह हालांकि अभी युवा ही था और यह काफी दिलेर भी था। यह अक्सर गलत के खिलाफ आवाज उठाता था और इसका मकसद इन तीन गैंग को खत्म कर गांव में शांति बनाना था। इसके लिए यह तीनों गैंग से दुश्मनी मोल ले चुका था। इसने अपनी गैंग भी सिर्फ इन तीन गैंग के खात्मे के लिए ही तैयार की थी। इसकी गैंग के द्वारा अक्सर बाकि तीन गैंग के लोगों का ही खात्मा होता था। बाकि गांव में इसकी काफी इज्जत थी। वक्त बीतता गया और इन चारों गैंग की गैंगवार में कोई कमी नहीं आ रही थी। हर गैंग का सदस्य दूसरी गैंग के सदस्य के खात्में के लिए खून का प्यासा सा घूमता था। कई बार पंडित की गैंग और बाकि तीन गैंग के बीच गैंगवार इसलिए भी हुई कि पंडित की गैंग ने उन्हें गलत करने से रोकना चाहा। इसके लिए तीनों ही गैंग अब हर संभव तरीके से पंडित को अपने रास्तें से हटाना चाह रही थी। चारों गैंग के बीच होने वाली गैंगवार को पुलिस भी रोकने में असमर्थ थी। हालांकि गैंग के सभी लोग जानते थे कि इस गैंगवार से उनका काफी नुकसान होता है, आदमी मारे जाते हैं, फिर कानून का डर कुछ तो बना ही रहता है, वहीं राजनेता भी, जिनके हाथ इन गैंग के सिर पर होते थे, वे भी लताड़ लगा दिया करते थे। इसके बाद भी अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इन गैंग की आपस में गैंगवार हुआ करती थी।
पंडित, जिसकी गांव में काफी इज्जत थी, उसका घर गांव के बीचों-बीच था। वह यहां अपनी मां, अपने छोटे भाई और बहन के साथ रहता था। गांव में ही उसकी एक प्रेमिका भी थी, जिसका नाम प्रिया था। दोनों जल्द ही शादी करना चाह रहे थे। दोनों परिवारों के बीच शादी को लेकर रजामंदी भी बन गई थी। पंडित के पिता बाकि अनवर औद दिलावर की गैंग के बीच चल रही गोलीबारी में मारे गए थे। ऐसा अक्सर होता था कि गैंग के बीच होने वाली लड़ाई में कोई ना कोई गांव का व्यक्ति ऐसे ही मारा जाता था। ऐसा ही पंडित के पिता के साथ भी हुआ था। इसी कारण उसने बाकितीन गैंग के सफाए का प्लान का तैयार किया और उनका मुकाबला करने के लिए मैदान में उतर आया था। इसकी जानकारी अन्य राजनेताओं और पुलिस को भी थी। पुलिस कइ्र्र बार चोरी छिपे पंडित को सपोर्ट भी किया करती थी। वहीं कुछ राजनेता जहां उसके साथ थे, वहीं कुछ उसे रास्ते से हटाने के लिए बाकि गैंग को मदद करते थे। दो से तीन बार पंडित पर हमला भी हुआ था, परंतु वह हर बार बच गया था।
वहीं दूसरी ओर दिलावर के पांच भाई और थे, जो कि उसकी गैंग में हमेशा उसके साथ खड़े रहा करते थे। इन छह भाईयों के एक साथ होने के कारण यह गैंग काफी खतरनाक थी। वहीं अनवर हुसैन दूसरे शहर से तड़ीपार होने के बाद इस गांव में आया था। यहां बसने के बाद उसने अपने वहीं के साथियों को यहां लाकर अपनी गैंग फिर से खड़ी कर ली थी। एक समय दिलावर और अनवर की गैंग ही वर्चस्व की लड़ाई लड़ा करती थी। परंतु बाद में राणा भी इनको टक्कर देने के लिए मैदान में उतर आया था। राणा भी अपने परिवार के साथ रहता था और गांव का काफी अमीर आदमी भी था। उसने अपने पैसों के बल पर ही अपनी गैंग को खड़ा किया था। इस प्रकार यहां चलने वाली चारों गैंग में सिर्फ पंडित ही एक मकसद के साथ लड़ रहा था, बाकि अपना वर्चस्व बनाने और बचाने के लिए आपस में लड़ रहे थे और उनके इस खेल में कई गांव वाले अपनी जान से हाथ धो बैठते थे।
एक बार पंडित अपने गांव से बाहर किसी काम से गया हुआ था। तब दिलावर की गैंग के एक आदमी ने पंडित के घर के बाहर बम फेंक दिया था। हालांकि बम से घर को कुछ नुकसान हुआ, परंतु पंडित के भाई-बहन और उसकी मां इस हमले में बच गए। बम के फटने के बाद गांव के बाकि लोगों ने मदद की थी। बम की सूचना मिलते ही पंडित अपने घर आ गया था। वह तुरंत ही दिलावर की पूरी गैंग का सफाया करना चाह रहा था, पर गांव के कुछ बुजुर्गों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इसके बाद उसने अपने परिवार के लोगों को पास के दूसरे गांव में अपने एक दोस्त के घर भिजवा दिया, ताकि इस गैंगवार में उसके परिवार के लोगों को कुछ हो ना जाए, पर शाख्द अनवर की गैंग के लोगों को इस बात की जानकारी मिल गई थी।








अच्छी लगी तीसरा पार्ट कब डालोगे
ReplyDeleteलेखन शैली अच्छी हैं,,कहानी का सजीव चित्रण करती हैं ।।
ReplyDeleteNice story
ReplyDeletegud one
ReplyDeleteFeel like real story...good going
ReplyDeleteNice sotry
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