अपने-पराये
जिंदगी में हमें कई लोग मिलते हैं। कुछ ऐसे में भी होते हैं, जो हमेशा के लिए याद रह जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो मिलने के बाद भी याद नहीं रह पाते हैं। जिंदगी की रफ्तार में कई अपने बिछड़ जाते हैं और कई पराये अपने भी हो जाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे में होते हैं, जो वक्त के अनुसार अपने और पराये तय कर लेते हैं। वैसे मेरी कहानी का शीर्षक अपने पराए अपने आप में ही तीन अर्थ रखता है। पहला- अपने और पराये, दूसरा- कभी जो अपने थे, वो अब पराये हो गए और तीसरा- अपने हो गए, जो कभी पराये थे। कहानी में हो सकता है आपको तीनों अर्थ नजर आए, पर मैं यह आप पर छोड़ता हूं कि आप कहानी में कौन सा अर्थ समझते हैं।
शहर के बीचों बीच एक मोहल्ले में बड़ा आलीशान से मकान बना हुआ था। इस मकान की एक खिड़की सड़क की ओर खुलती थी और एक बड़ा सा गेट था, जिसके बाहर डोर बेल भी लगी थी। मोहल्ले के कुछ शरारती बच्चे अक्सर इस डोर बेल को बजाकर भाग जाया करते थे और फिर घर के अंदर से अक्सर गालियों की बौछार हुआ करती थी। आवाज से लगता था कि यह किसी बुजुर्ग की आवाज है, जो इन शरारती बच्चों की हरकत से काफी परेशान है। बच्चे भी कम नहीं थे, अक्सर वे डोर बेल बजाकर या तो वहीं खड़े रहते थे या भाग जाया करते थे और अंदर से वे बुजुर्ग अक्सर उन बच्चों को अपशब्द कहते थे। ये कहानी लगभग रोज की ही थी।
मई-जून की गर्मी का समय था और घड़ी भी समय करीब 2 बजे का बता रही थी। गर्मी अधिक होने के कारण मोहल्ला लगभग सुनसान था। एक या दो व्यक्ति ही सड़क पर घूमते नजर आ रहे थे। मोहल्ले की अधिकतर घर के दरवाजे बंद थे। ऐसे में एक करीब 22 सवाल का नौजवान कंधे पर एक थैला लटकाए कुछ घरों के बाहर रूकता उनका खत वहां डाल देता। कभी किसी घर के सामने वह आवाज भी लगाता, परंतु कोई जवाब न मिलने पर निराश होकर आगे बढ़ जाता था। गर्मी अधिक होने के कारण उसे काफी प्यास लगी थी और वह कुछ घरों में आवाज लगाकर पानी पीने के लिए मांगना चाह रहा था, परंतु अंदर से कोई जवाब न मिलने पर वह आगे बढ़ जाता था। वह उम्मीद कर रहा था कि शायद किसी घर से तो उसे पीने के लिए पानी मिल ही जाएगा। जब वह बेहाल होने लगा तो उसने एक घर की डोर बेल बजा दी। यह वहीं घर था। इस बार भी डोर बेल बजते ही अंदर से अपशब्द सुनाई पड़े। वह नौजवान कुछ डर गया, पर फिर उसे दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह वहीं रूक गया। हालांकि दरवाजा उस खिड़की का खुला था, जो सड़क की ओर खुलती थी। खिड़की खुली और एक 70 वर्षीय बुजुर्ग ने आवाज लगाई कौन है, घंटी बजाकर भाग जाते हो, परेशान कर रखा है। अपने घरों की घंटी क्यों नहीं बजाते हो? वो नौजवाल कुछ आगे बढ़कर खिड़की के पास आया और बुजुर्ग से बोला माफ कीजिएगा बाबाजी, बहुत प्यास लगी थी, इस कारण घंटी बजा दी। अब तक कई घरों में आवाज दी, परंतु कोई बाहर निकलकर नहीं आया। ये बड़ा घर देखा तो घंटी बजा दी। बहुत प्यास लगी है यदि थोड़ा पानी मिल जाता तो आपका उपकार होता।
उन बुजुर्ग ने कुछ देर नौजवान को यूं ही देखा और फिर पूछा तू है कौन?
नौजवान ने उत्तर दिया, बाबूजी आपके क्षेत्र का डाकिया हूं। कुछ दिन से ही आ रहा हूं।ठीक है बड़ा दरवाजा खोलकर अंदर आ जा। ला रहा हूं तेरे लिए पानी। नौजवान भी दरवाजा खोलकर अंदर चला जाता है और बाबूजी का इंतजार करता है। मन नही मन सोच रहा था कि कैसे हे ये मोहल्ले वाले एक गिलास पानी भी नहीं पिला सके। और एक ये बुजुर्ग है, जो पानी लेने के लिए खुद चले गए। घर में कितने ही नौकर होंगे, चाहते तो किसी को भी आवाज लगा देते तो वो ही पानी दे जाता। नौजवान बड़ा घर देखकर घर में कई लोगों के होने और घर में नौकर होने का अंदाजा लगा रहा था।
नौजवान बस सोच ही रहा था कि अंदर कुछ गिरने की आवाज आई। इसके बाद शायद उन बुजुर्ग के कराहने की आवाज आ रही थी। घर के दरवाजे के बाहर खड़ा नौजवान कुछ देर के विचलित हो गया। परंतु काफी देर तक वे बुजुर्ग कराहते रहे और घर से किसी शोर की आवाज नहीं आई तो वह नौजवान हिम्मत कर दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। जैसे ही वह अंदर पहुंचा तो देखा वह बुजुर्ग वहां गिरे पड़े हैं और वहां पानी भी फैला है और गिलास लुढ़ककर एक टेबल के नीचे चला गया है।
नौजवान ने अपना डाक का थैला एक ओर रखा और सहारा देकर बुजुर्ग को उठाने का प्रयास किया। पर बुजुर्ग उठने में असमर्थ थे और दर्द के कारण काफी करार रहे थे। नौजवान ने उन्हें गोद में उठाया और उनके एक एकमरे में बिस्तर पर जाकर लेटा दिया। फिर वह भागकर बाहर आया और पास ही एक डॉक्टर को बुलाकर घर ले आया। डॉक्टर ने पहले तो घर आने से मना कर दिया, परंतु नौजवान के बार-बार कहने पर डॉक्टर भी घर आ गया। डॉक्टर ने बुजुर्ग को देखकर बताया कि पैर की हड्डी टूट गई है इन्हें हॉस्पिटल में भर्ती करना होगा। नौजवान ने हां कहा और कुछ ही देर बाद वह बुजुर्ग को लेकर अस्पताल आ गया। डॉक्टर ने अपना इलाज प्रारंभ किया। कुछ देर बाद बुजुर्ग को वार्ड में शिफ्ट भी कर दिया गया। नौजवान अब इस बात की चिंता कर रहा था कि अब वह हॉस्पिटल का बिल कैसे देगा? उसकी जेब में तो कुछ ही रूप्ए पड़े हैं। उस डॉक्टर ने भी नौजवान से बिल को लेकर कोई बात नहीं की। परंतु यह जरूर कहा कि इनका बहुत ध्यान रखना, उम्र अधिक होने के कारण हड्डी को जुड़ने में समय लग सकता है। नौजवान ने हामी भरी और फिर बुजुर्ग के पास आ गया।
नौजवान ने बुजुर्ग से कहा मुझे माफ करिएगा बाबूजी, मेरे कारण आपको यह सब सहना पड़ रहा है। ना मैं आपसे पानी मांगता और ना ही आप ऐसे गिरते। मुझे माफ करना बाबूजी।
बुजुर्ग ने कहा अरे कोई बात नहीं। शायद मेरी किस्मत में ही लिखा था गिरना, सो गिर गया। तू नहीं आता तो कोई आकर परेशान करता है और मैं उसके पीछे भागता और शायद गिर जाता। नौजवान ने कहा अच्छा बाबूजी अभी तो मैं जाता हूं, कुछ और खत बाकि रह गए हैं, वो बांटकर शाम को आता हूं। आप यहां आराम करें, मैं रोज सुबह और शाम को यहां आकर आपका ध्यान रखूंगा। बुजुर्ग ने भी बस हां में सिर हिलाया और नौजवान वहां से चला गया।
शाम को ठीक 6 बजे नौजवान हॉस्पिटल आ गया। इस बार वह बुजुर्ग के लिए कुछ फल साथ लेकर आया था। आते ही उसने वो फल उन बुजुर्ग को खिलाए। वह बुजुर्ग फल खाने के बाद नौजवान से बोले। पहले तुझे कभी इस मोहल्ले में देखा नहीं, कौन है तू?
बाबूजी हमारा नाम सुधीर है, पास के ही गांव में रहते हैं। हमारे बापू पहले यहां डाकिया थे, अचानक वे चल बसे तो उनकी जगह हमें यह नौकरी मिल गई है। अभी चार ही दिन हुए हैं नौकरी पर आए। अच्छा-अच्छा, बुजुर्ग ने कहा। चल अब तू घर जा और आराम कर। यहां रोज-रोज आने की जरूरत नहीं है। यहां का डॉक्टर मेरा परिचित है वो मेरा ध्यान रख लेगा।
नहीं, बाबूजी हम तो आएंगे। आप चाहे मना करें। हमारी वजह से आपको चोट लगी है तो हम आपका ध्यान रखेंगे। इतना कहकर सुधीर वहां से चला जाता है। रास्ते में ही उसे डॉक्टर मिलते हैं, और वे सुधीर से कहते हैं कि पांच दिन बाद हम इनकी छुट्टी कर देंगे बस इतना ध्यान रखना कि ये घर पर पूरी तरह से आराम करें। सुधीर डॉक्टर की बात सुनकर थोड़ा परेशान हो गया, फिर मन ही मन कुछ तय कर मुस्कुरा दिया। उसने डॉक्टर से पूछा कि आप इन्हें जानते है? डॉक्टर ने कहा अरे, भाई तुम शहर में नए हो क्या? इन्हें कौन नहीं जानता। ये अपने जमाने के बहुत बड़े डॉक्टर है, इनका नाम है डॉ. समर्थ अग्निहोत्री। आज भी नए डॉक्टर कहीं फंस जाते हैं तो इन्हीं से सलाह लेते हैं। बस वक्त ने इनके साथ बहुत बुरा किया है। पत्नी इन्हें छोड़कर चल बसी और एक बेटा है जो अमेरिका जाकर बस और 10 साल हो गए अपने पिता की कभी खबर भी नहीं ली। इतना कहकर डॉक्टर वहां से चला गया।
पांच दिन बाद डॉक्टर ने डॉ. अग्निहोत्री को छुट्टी दे दी और सुधीर में डॉक्टर अग्निहोत्री को उनके घर ले आया। यहां बैड पर लिटाकर उसने कहा बाबूजी आप चिंता मत करिए आप बस आराम कीजिए। मैं रोज सुबह और शाम को आ जाया करूंगा और आपको नहलाना, नाश्ता कराना, खाना खिलाना, घर का झाडू-पोंछा सब कर दिया करूंगा। इस पर डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा झल्लाकर कहा, तू क्यों करेगा। अरे बाबूजी आप कितना भी गुस्सा हो जाए, मैंने आपसे कहा है ना कि मेरे कारण आपको दर्द हुआ है तो मैं ही आपका ध्यान रखूंगा। इसके बाद सुधीर डॉ. अग्निहोत्री के लिए कुछ फल लेकर आ जाता है और उन्हें काटकर देता है। इसके बाद कमरे में झाडू-पोंछा करि बाबूजी के लिए खाना बना देता है। उन्हें खाना खिलाने के बाद सुधीर ने कहा कि अब आप सो जाइए बाबूजी, मैं सुबह आता हूं, फिर गरमा-गरम नाश्ता करा दूंगा। ये दवा और पानी पास में ही रखी है, करीब एक घंटे बाद ये दवा ले लेना। रात को नींद न आए तो ये दवा लेकर सो जाना। अब मैं सुबह आउंगा। इतना कहकर सुधीर चला जाता है। डॉ. अग्निहोत्री भी कुछ देर बाद दवा लेकर सो जाते हैं।
अगले दिन फिर सुबह सुधीर आता है, घर की साफ-सफाई के बाद बाबूजी को भी तैयार कर उन्हें नाश्ता कराकर अपने काम पर चला जाता है। दिन में एक बार फिर वह आता है और डॉक्टर अग्निहोत्री को खाना खिलाकर चला जाता है। इसी तरह कई दिन बीत जाते हैं और डॉक्टर अग्निहोत्री की भी हालत में सुधार आने लगता है। अब वे धीरे-धीरे सुधीर के सहारे से चलने का प्रयास भी करने लगते हैं। इन कुछ दिनों में डॉक्टर अग्निहोत्री और सुधीर के बीच बातचीत भी शुरू हो जाती है।
ऐसे ही एक दिन सुधीर की छुट्टी थी तो वह दिन भर डॉक्टर अग्निहोत्री के पास ही था। इस दौरान डॉक्टर ने उससे कहा कि तू बहुत अच्छा है रे। इतना ध्यान तो शायद मेरा बेटा भी नहीं रखता है। इस पर सुधीर ने कहा कि मुझे अपना बेटा ही समझ लिजिए बाबूजी। बड़े भईया नहीं है तो क्या? आपका ये बेटा है ना आपका ध्यान रखने के लिए। आप तो बस जल्दी से अच्छे हो जाइए। क्यों थक गया क्या मेरी सेवा करते हुए? बाबूजी ने मजाकिया अंदाज में कहा। सुधीर ने थोड़ा रूठते हुए कहा कि अरे, बाबूजी आपकी सेवा से हम थक गए आपको ऐसा लगता है? हम तो जिंदगी भर आपकी सेवा कर सकते है। और अब ऐसी बात मत करिएगा। एक तो हमारी वजह से आपको चोट आ गई और इस नौकरी के कारण हम आपकी सेवा भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। अरे, और कितनी सेवा करेगा। अच्छा ये बता कि तेरे घर-घर में कौन-कौन है? अब कहां कोई बचा बाबूजी, हम तो इस दुनियां में अकेले हैं। 8 साल पहले मां गुजर गई और करीब 2 माह पहले बापू भी। बापू की नौकरी हमें मिल गई, बस उसी से गुजर-बसर कर रहे हैं।
बाबूजी अगर बुरा ना माने तो हम भी एक बात पूछे। हां, हां पूछ? अब तेरी किसी बात का बुरा नहीं लगता। इतना बड़ा घर है, हम तो सोचे थे, बहुत सारे लोग रहते होंगे और घर में नौकर-चाकर होंगे, पर आप तो यहां अकेले रहते हैं। डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा उदासी भरे स्वर में कहा- तेरे और मेरे हालात में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। 12 साल पहले तेरी अम्माजी हमें छोड़कर चली गई और एक बेटा था वो भी 11 साल पहले अमेरिका गया था, सो अब तक नहीं लौटा। पहले एक साल तो बहुत फोन आते थे, उसके बाद फोन भी बंद हो गए हैं। पिछले 10 साल से यहां अकेला रह रहा हूं और मौत का इंतजार कर रहा हूं। अरे, मरे आपके दुश्मन बाबूजी। अब हम आ गए हैं ना, अब आप अकेले नहीं रहेंगे। सुधीर ने बड़े ही जोश के साथ कहा। वक्त लगातार बीत रहा था। डॉक्टर अग्निहोत्री भी अब पूरी तरह से ठीक हो गए थे। इसके बाद भी सुधीर प्रतिदिन घर पर आता और पहले की तरह रोज झाडू-पोंछा कर नाश्ता और खाना बनाता। डॉक्टर अग्निहोत्री के कहने से अब वो भी यही खाना खाता था। कभी भी कुछ सामान की जरूरत होती तो डॉक्टर अग्निहोत्री सुधीर को रूपए देते और वह सामान लेकर आ जाता था।
एक दिन सुधीर दोपहर के समय घर पहुंचा। डॉक्टर अग्निहोत्री ने कहा अरे, तू इस समय यहां कैसे आ गया। आज नौकरी नहीं करना है क्या?
सुधीर ने कहा- बाबूजी नौकरी ही तो कर रहा हूं। आपके नाम का एक खत आया था, वहीं देने आया हूं। आपकी सेवा के लिए तो शाम को आउंगा।
डॉक्टर अग्निहोत्री ने खत लिया और पढ़ने लगे। खत पढ़कर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बाबूजी को रोता देख सुधीर ने कहा कि क्या हुआ बाबूजी, किसका खत है और आप रो क्यों रहे हैं?
डॉक्टर अग्निहोत्री ने सुधीर को देखा और कहा कि मेरा बेटा आ रहा है। अपनी पत्नी और मेरे पोते के साथ। 10 साल बाद उसे देखूंगा। मुझे तो यकी नही नहीं हो रहा है।
अरे, वाह से तो बहुत बड़ी खुशखबरी है बाबूजी। भईयो और भौजी आ रहे हैं, साथ में उनका लल्ला भी आ रहे हैं। वहां बाबूजी, हम तो कह रहे हैं इस बार आप भी उनके साथ चले जाइए। आपको भी अच्छा लगेगा। सुधीर ने भी डॉ. अग्निहोत्री की खुशी में शामिल होते हुए कहा।
अरे, पहले उसे आ तो जाने दे। एक काम कर शाम को आते हुए कुछ अच्छा सा लेकर आना। पैसे ले जा। आज बहुत दिन बाद कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है। बाबूजी ने कहा।
सुधीर ने जी बाबूजी कहा और फिर बोला, अच्छा बाबूजी अभी तो हम जाते है, शाम को आते है। ठीक है- बाबूजी ने कहा।
शाम को जब सुधीर घर पहुंचा तो डॉक्टर अग्निहोत्री अपनी पुरानी यादों में खोए उसे अपनी हर बात बताने लगे। इस तरह रात का काफी समय हो चला था। इसके बाद सुधीर ने उन्हें सुला दिया। बाबूजी के कहने पर वो आज अपने घर नहीं गया और बाहर के हॉल में ही सो गया। इस तरह सुधीर अब रोज ही बाबूजी के घर आता और उनकी सेवा करता रहता।
एक दिन सुधीर बहुत ही गुमसुम सा घर पर आकर बैठ गया। डॉक्टर अग्निहोत्री ने उससे पूछा अरे क्या हुआ सुधीर आज तू इतना चुप क्यों है? सुधीर ने अब भी कुछ नहीं कहा। बाबूजी ने उसे लताड़ते हुए कहा कि अरे, बताता है या बजाउं ये लाठी। इस पर सुधीर ने कहा कि बाबूजी हम ये नौकरी छोड़ रहे हैं। डॉक्टर अग्निहोत्री ने आश्चर्य के साथ पूछा अरे, क्यों ऐसा क्या हो गया? बाबूजी बड़े साहब ने हमारी बदली कर दी है और कह रहे हैं कि पास के शहर में जाओ।
अरे, ये तो अच्छी बात है ना, इसमें नौकरी छोड़ने की बात कहां से आ गई?
बाबूजी हम कह रहे हैं, हम आपको छोड़कर नहीं जाएंगे बस। सुधीर ने जिद भरे लहजे में कहा।
बाबूजी न उसे कई बार समझाने का प्रयास किया परंतु सुधीर मानने का तैयार नहीं था। इस पर डॉ. अग्निहोत्री भड़क जाते हैं और उसे कहते है- अरे, तू कौन सा मेरा सगा है रे, जो पूरी जिंदगी यही रहेगा। यहां फ्री में खाने को मिल रहा है, इसलिए रहना चाहता है। चल जा यहां से। इतना कहकर बाबूजी अपने कमरे में चले जाते हैं। इधर सुधीर को डॉक्टर अग्निहोत्री की यह बात सुनकर बड़ा झटका लगता है और फिर वह भी अपने कमरे की ओर चला जाता है।
अगले दिन सुबह सुधीर फिर घर आता है और बाबूजी से कहता है हमें फ्री में खाने का शौक नहीं है बाबूजी हम तो बस आपकी सेवा करना चाहते थे। आप गुस्सा न हो, अब हम जा रहे हैं। बाबूजी भी उसे जाने के लिए कह देते हैं।
सुधीर पास के शहर में जाकर अपना काम शुरू कर देता है। परंतु वह अपने बाबूजी की चिंता में लगा रहता है। इस तरह से करीब 8 महीने बीत जाते हैं। इस दौरान सुधीर ने कई बार बाबूजी के पास जाने का सोचा, परंतु काम के कारण वह कभी छुट्टी नहीं ले सका। एक दिन वह ऑफिस में ही था कि उसके नाम का एक बड़ा सा लिफाफा आता है। वह उसे अपने घर ले जाकर खोलने का सोचता है और फिर काम में लग जाता है।
घर पहुंचकर वह लिफाफा खोलता है, तो देखता है उसमें कुछ कागजात है और एक खत भी है। पहले तो वह समझ नहीं पाता कि उसे इतना बड़ा लिफाफा किसने भेज दिया। वह खत पढ़ना शुरू करता है।
प्यारे बेटा सुधीर,
तू नए शहर जाकर अपने बाबूजी को भूल ही गया। पर तू मुझे रोज याद आता था। वैसे बेटा मुझे माफ करना, मैंने तुझे उस दिन खाने वाली बात कही। पर ये तू भी जानता है कि अगर मैं ऐसा नहीं कहता तो तू नए शहर में नहीं जाता। वहां तेरी तरक्की जल्दी से हो सकती है, इसलिए मैंने तुझे वहां भेजा था। उम्मीद करता हूं तू अब खुश होगा, मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है। वैसे तुझे याद है तू एक खत लेकर आया था, जिसमें मेरे बेटे के आने की सूचना थी। मुझे पता है कि वो खत तुने लिखा था। ताकि मैं खुश हो सकूं। क्योंकि मैं जानता हूं पिछले 10 सालों में जिसने एक फोन नहीं किया, वो खत क्या लिखेगा और क्या अपने पिता से मिलने के लिए आएगा। वैसे तेरे उस झूठ की खुशी का मौल तो मैं नहीं चुका सकता, पर तेरा बाबूजी होने के नाते मेरा जो कुछ भी है वो आज से तेरा हो गया है। तुझे अपने आशीर्वाद के रूप में फिलहाल मेरे पास देने के लिए यही है, पर जो तूने दिया है, उसके बदले तो मैं तुझे कुछ नहीं दे रहा हूं। वो खुशी भले ही झूठी थी, पर 10 सालों बाद तेरे झूठ ने मुझे हंसने का मौका दिया था, जो तेरा एक कर्ज है मेरे पर, बस वहीं चुकाने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूं। हो सके तो अपने बाबूजी को माफ कर देना और ये छोटी से भेंट अपने बाबूजी का प्यार समझ कर स्वीकार कर लेना। तुझे ये खत मिले तब तक शायद मैं इस दुनियां में ना रहूं, तो ये समझ ले कि यहीं तेरे बाबूजी की आखिरी इच्छा भी है, जिसे तुझे पूरा करना है।
तेरा बाबूजी।
खत को पढ़ने के बाद सुधीर स्तब्ध भी था, कि बाबूजी अब इस दुनियां में नहीं रहे। खत को सीने से लगाए सुधीर की आंखों से बस आंसू बह रहे थे और उसके मुंह से बस बाबूजी, बाबूजी ही निकल रहा था।
शहर के बीचों बीच एक मोहल्ले में बड़ा आलीशान से मकान बना हुआ था। इस मकान की एक खिड़की सड़क की ओर खुलती थी और एक बड़ा सा गेट था, जिसके बाहर डोर बेल भी लगी थी। मोहल्ले के कुछ शरारती बच्चे अक्सर इस डोर बेल को बजाकर भाग जाया करते थे और फिर घर के अंदर से अक्सर गालियों की बौछार हुआ करती थी। आवाज से लगता था कि यह किसी बुजुर्ग की आवाज है, जो इन शरारती बच्चों की हरकत से काफी परेशान है। बच्चे भी कम नहीं थे, अक्सर वे डोर बेल बजाकर या तो वहीं खड़े रहते थे या भाग जाया करते थे और अंदर से वे बुजुर्ग अक्सर उन बच्चों को अपशब्द कहते थे। ये कहानी लगभग रोज की ही थी।
मई-जून की गर्मी का समय था और घड़ी भी समय करीब 2 बजे का बता रही थी। गर्मी अधिक होने के कारण मोहल्ला लगभग सुनसान था। एक या दो व्यक्ति ही सड़क पर घूमते नजर आ रहे थे। मोहल्ले की अधिकतर घर के दरवाजे बंद थे। ऐसे में एक करीब 22 सवाल का नौजवान कंधे पर एक थैला लटकाए कुछ घरों के बाहर रूकता उनका खत वहां डाल देता। कभी किसी घर के सामने वह आवाज भी लगाता, परंतु कोई जवाब न मिलने पर निराश होकर आगे बढ़ जाता था। गर्मी अधिक होने के कारण उसे काफी प्यास लगी थी और वह कुछ घरों में आवाज लगाकर पानी पीने के लिए मांगना चाह रहा था, परंतु अंदर से कोई जवाब न मिलने पर वह आगे बढ़ जाता था। वह उम्मीद कर रहा था कि शायद किसी घर से तो उसे पीने के लिए पानी मिल ही जाएगा। जब वह बेहाल होने लगा तो उसने एक घर की डोर बेल बजा दी। यह वहीं घर था। इस बार भी डोर बेल बजते ही अंदर से अपशब्द सुनाई पड़े। वह नौजवान कुछ डर गया, पर फिर उसे दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह वहीं रूक गया। हालांकि दरवाजा उस खिड़की का खुला था, जो सड़क की ओर खुलती थी। खिड़की खुली और एक 70 वर्षीय बुजुर्ग ने आवाज लगाई कौन है, घंटी बजाकर भाग जाते हो, परेशान कर रखा है। अपने घरों की घंटी क्यों नहीं बजाते हो? वो नौजवाल कुछ आगे बढ़कर खिड़की के पास आया और बुजुर्ग से बोला माफ कीजिएगा बाबाजी, बहुत प्यास लगी थी, इस कारण घंटी बजा दी। अब तक कई घरों में आवाज दी, परंतु कोई बाहर निकलकर नहीं आया। ये बड़ा घर देखा तो घंटी बजा दी। बहुत प्यास लगी है यदि थोड़ा पानी मिल जाता तो आपका उपकार होता।
उन बुजुर्ग ने कुछ देर नौजवान को यूं ही देखा और फिर पूछा तू है कौन?
नौजवान ने उत्तर दिया, बाबूजी आपके क्षेत्र का डाकिया हूं। कुछ दिन से ही आ रहा हूं।ठीक है बड़ा दरवाजा खोलकर अंदर आ जा। ला रहा हूं तेरे लिए पानी। नौजवान भी दरवाजा खोलकर अंदर चला जाता है और बाबूजी का इंतजार करता है। मन नही मन सोच रहा था कि कैसे हे ये मोहल्ले वाले एक गिलास पानी भी नहीं पिला सके। और एक ये बुजुर्ग है, जो पानी लेने के लिए खुद चले गए। घर में कितने ही नौकर होंगे, चाहते तो किसी को भी आवाज लगा देते तो वो ही पानी दे जाता। नौजवान बड़ा घर देखकर घर में कई लोगों के होने और घर में नौकर होने का अंदाजा लगा रहा था।
नौजवान बस सोच ही रहा था कि अंदर कुछ गिरने की आवाज आई। इसके बाद शायद उन बुजुर्ग के कराहने की आवाज आ रही थी। घर के दरवाजे के बाहर खड़ा नौजवान कुछ देर के विचलित हो गया। परंतु काफी देर तक वे बुजुर्ग कराहते रहे और घर से किसी शोर की आवाज नहीं आई तो वह नौजवान हिम्मत कर दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। जैसे ही वह अंदर पहुंचा तो देखा वह बुजुर्ग वहां गिरे पड़े हैं और वहां पानी भी फैला है और गिलास लुढ़ककर एक टेबल के नीचे चला गया है।
नौजवान ने अपना डाक का थैला एक ओर रखा और सहारा देकर बुजुर्ग को उठाने का प्रयास किया। पर बुजुर्ग उठने में असमर्थ थे और दर्द के कारण काफी करार रहे थे। नौजवान ने उन्हें गोद में उठाया और उनके एक एकमरे में बिस्तर पर जाकर लेटा दिया। फिर वह भागकर बाहर आया और पास ही एक डॉक्टर को बुलाकर घर ले आया। डॉक्टर ने पहले तो घर आने से मना कर दिया, परंतु नौजवान के बार-बार कहने पर डॉक्टर भी घर आ गया। डॉक्टर ने बुजुर्ग को देखकर बताया कि पैर की हड्डी टूट गई है इन्हें हॉस्पिटल में भर्ती करना होगा। नौजवान ने हां कहा और कुछ ही देर बाद वह बुजुर्ग को लेकर अस्पताल आ गया। डॉक्टर ने अपना इलाज प्रारंभ किया। कुछ देर बाद बुजुर्ग को वार्ड में शिफ्ट भी कर दिया गया। नौजवान अब इस बात की चिंता कर रहा था कि अब वह हॉस्पिटल का बिल कैसे देगा? उसकी जेब में तो कुछ ही रूप्ए पड़े हैं। उस डॉक्टर ने भी नौजवान से बिल को लेकर कोई बात नहीं की। परंतु यह जरूर कहा कि इनका बहुत ध्यान रखना, उम्र अधिक होने के कारण हड्डी को जुड़ने में समय लग सकता है। नौजवान ने हामी भरी और फिर बुजुर्ग के पास आ गया।
नौजवान ने बुजुर्ग से कहा मुझे माफ करिएगा बाबूजी, मेरे कारण आपको यह सब सहना पड़ रहा है। ना मैं आपसे पानी मांगता और ना ही आप ऐसे गिरते। मुझे माफ करना बाबूजी।
बुजुर्ग ने कहा अरे कोई बात नहीं। शायद मेरी किस्मत में ही लिखा था गिरना, सो गिर गया। तू नहीं आता तो कोई आकर परेशान करता है और मैं उसके पीछे भागता और शायद गिर जाता। नौजवान ने कहा अच्छा बाबूजी अभी तो मैं जाता हूं, कुछ और खत बाकि रह गए हैं, वो बांटकर शाम को आता हूं। आप यहां आराम करें, मैं रोज सुबह और शाम को यहां आकर आपका ध्यान रखूंगा। बुजुर्ग ने भी बस हां में सिर हिलाया और नौजवान वहां से चला गया।
शाम को ठीक 6 बजे नौजवान हॉस्पिटल आ गया। इस बार वह बुजुर्ग के लिए कुछ फल साथ लेकर आया था। आते ही उसने वो फल उन बुजुर्ग को खिलाए। वह बुजुर्ग फल खाने के बाद नौजवान से बोले। पहले तुझे कभी इस मोहल्ले में देखा नहीं, कौन है तू?
बाबूजी हमारा नाम सुधीर है, पास के ही गांव में रहते हैं। हमारे बापू पहले यहां डाकिया थे, अचानक वे चल बसे तो उनकी जगह हमें यह नौकरी मिल गई है। अभी चार ही दिन हुए हैं नौकरी पर आए। अच्छा-अच्छा, बुजुर्ग ने कहा। चल अब तू घर जा और आराम कर। यहां रोज-रोज आने की जरूरत नहीं है। यहां का डॉक्टर मेरा परिचित है वो मेरा ध्यान रख लेगा।
नहीं, बाबूजी हम तो आएंगे। आप चाहे मना करें। हमारी वजह से आपको चोट लगी है तो हम आपका ध्यान रखेंगे। इतना कहकर सुधीर वहां से चला जाता है। रास्ते में ही उसे डॉक्टर मिलते हैं, और वे सुधीर से कहते हैं कि पांच दिन बाद हम इनकी छुट्टी कर देंगे बस इतना ध्यान रखना कि ये घर पर पूरी तरह से आराम करें। सुधीर डॉक्टर की बात सुनकर थोड़ा परेशान हो गया, फिर मन ही मन कुछ तय कर मुस्कुरा दिया। उसने डॉक्टर से पूछा कि आप इन्हें जानते है? डॉक्टर ने कहा अरे, भाई तुम शहर में नए हो क्या? इन्हें कौन नहीं जानता। ये अपने जमाने के बहुत बड़े डॉक्टर है, इनका नाम है डॉ. समर्थ अग्निहोत्री। आज भी नए डॉक्टर कहीं फंस जाते हैं तो इन्हीं से सलाह लेते हैं। बस वक्त ने इनके साथ बहुत बुरा किया है। पत्नी इन्हें छोड़कर चल बसी और एक बेटा है जो अमेरिका जाकर बस और 10 साल हो गए अपने पिता की कभी खबर भी नहीं ली। इतना कहकर डॉक्टर वहां से चला गया।
पांच दिन बाद डॉक्टर ने डॉ. अग्निहोत्री को छुट्टी दे दी और सुधीर में डॉक्टर अग्निहोत्री को उनके घर ले आया। यहां बैड पर लिटाकर उसने कहा बाबूजी आप चिंता मत करिए आप बस आराम कीजिए। मैं रोज सुबह और शाम को आ जाया करूंगा और आपको नहलाना, नाश्ता कराना, खाना खिलाना, घर का झाडू-पोंछा सब कर दिया करूंगा। इस पर डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा झल्लाकर कहा, तू क्यों करेगा। अरे बाबूजी आप कितना भी गुस्सा हो जाए, मैंने आपसे कहा है ना कि मेरे कारण आपको दर्द हुआ है तो मैं ही आपका ध्यान रखूंगा। इसके बाद सुधीर डॉ. अग्निहोत्री के लिए कुछ फल लेकर आ जाता है और उन्हें काटकर देता है। इसके बाद कमरे में झाडू-पोंछा करि बाबूजी के लिए खाना बना देता है। उन्हें खाना खिलाने के बाद सुधीर ने कहा कि अब आप सो जाइए बाबूजी, मैं सुबह आता हूं, फिर गरमा-गरम नाश्ता करा दूंगा। ये दवा और पानी पास में ही रखी है, करीब एक घंटे बाद ये दवा ले लेना। रात को नींद न आए तो ये दवा लेकर सो जाना। अब मैं सुबह आउंगा। इतना कहकर सुधीर चला जाता है। डॉ. अग्निहोत्री भी कुछ देर बाद दवा लेकर सो जाते हैं।
अगले दिन फिर सुबह सुधीर आता है, घर की साफ-सफाई के बाद बाबूजी को भी तैयार कर उन्हें नाश्ता कराकर अपने काम पर चला जाता है। दिन में एक बार फिर वह आता है और डॉक्टर अग्निहोत्री को खाना खिलाकर चला जाता है। इसी तरह कई दिन बीत जाते हैं और डॉक्टर अग्निहोत्री की भी हालत में सुधार आने लगता है। अब वे धीरे-धीरे सुधीर के सहारे से चलने का प्रयास भी करने लगते हैं। इन कुछ दिनों में डॉक्टर अग्निहोत्री और सुधीर के बीच बातचीत भी शुरू हो जाती है।
ऐसे ही एक दिन सुधीर की छुट्टी थी तो वह दिन भर डॉक्टर अग्निहोत्री के पास ही था। इस दौरान डॉक्टर ने उससे कहा कि तू बहुत अच्छा है रे। इतना ध्यान तो शायद मेरा बेटा भी नहीं रखता है। इस पर सुधीर ने कहा कि मुझे अपना बेटा ही समझ लिजिए बाबूजी। बड़े भईया नहीं है तो क्या? आपका ये बेटा है ना आपका ध्यान रखने के लिए। आप तो बस जल्दी से अच्छे हो जाइए। क्यों थक गया क्या मेरी सेवा करते हुए? बाबूजी ने मजाकिया अंदाज में कहा। सुधीर ने थोड़ा रूठते हुए कहा कि अरे, बाबूजी आपकी सेवा से हम थक गए आपको ऐसा लगता है? हम तो जिंदगी भर आपकी सेवा कर सकते है। और अब ऐसी बात मत करिएगा। एक तो हमारी वजह से आपको चोट आ गई और इस नौकरी के कारण हम आपकी सेवा भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। अरे, और कितनी सेवा करेगा। अच्छा ये बता कि तेरे घर-घर में कौन-कौन है? अब कहां कोई बचा बाबूजी, हम तो इस दुनियां में अकेले हैं। 8 साल पहले मां गुजर गई और करीब 2 माह पहले बापू भी। बापू की नौकरी हमें मिल गई, बस उसी से गुजर-बसर कर रहे हैं।
बाबूजी अगर बुरा ना माने तो हम भी एक बात पूछे। हां, हां पूछ? अब तेरी किसी बात का बुरा नहीं लगता। इतना बड़ा घर है, हम तो सोचे थे, बहुत सारे लोग रहते होंगे और घर में नौकर-चाकर होंगे, पर आप तो यहां अकेले रहते हैं। डॉ. अग्निहोत्री ने थोड़ा उदासी भरे स्वर में कहा- तेरे और मेरे हालात में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। 12 साल पहले तेरी अम्माजी हमें छोड़कर चली गई और एक बेटा था वो भी 11 साल पहले अमेरिका गया था, सो अब तक नहीं लौटा। पहले एक साल तो बहुत फोन आते थे, उसके बाद फोन भी बंद हो गए हैं। पिछले 10 साल से यहां अकेला रह रहा हूं और मौत का इंतजार कर रहा हूं। अरे, मरे आपके दुश्मन बाबूजी। अब हम आ गए हैं ना, अब आप अकेले नहीं रहेंगे। सुधीर ने बड़े ही जोश के साथ कहा। वक्त लगातार बीत रहा था। डॉक्टर अग्निहोत्री भी अब पूरी तरह से ठीक हो गए थे। इसके बाद भी सुधीर प्रतिदिन घर पर आता और पहले की तरह रोज झाडू-पोंछा कर नाश्ता और खाना बनाता। डॉक्टर अग्निहोत्री के कहने से अब वो भी यही खाना खाता था। कभी भी कुछ सामान की जरूरत होती तो डॉक्टर अग्निहोत्री सुधीर को रूपए देते और वह सामान लेकर आ जाता था।
एक दिन सुधीर दोपहर के समय घर पहुंचा। डॉक्टर अग्निहोत्री ने कहा अरे, तू इस समय यहां कैसे आ गया। आज नौकरी नहीं करना है क्या?
सुधीर ने कहा- बाबूजी नौकरी ही तो कर रहा हूं। आपके नाम का एक खत आया था, वहीं देने आया हूं। आपकी सेवा के लिए तो शाम को आउंगा।
डॉक्टर अग्निहोत्री ने खत लिया और पढ़ने लगे। खत पढ़कर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बाबूजी को रोता देख सुधीर ने कहा कि क्या हुआ बाबूजी, किसका खत है और आप रो क्यों रहे हैं?
डॉक्टर अग्निहोत्री ने सुधीर को देखा और कहा कि मेरा बेटा आ रहा है। अपनी पत्नी और मेरे पोते के साथ। 10 साल बाद उसे देखूंगा। मुझे तो यकी नही नहीं हो रहा है।
अरे, वाह से तो बहुत बड़ी खुशखबरी है बाबूजी। भईयो और भौजी आ रहे हैं, साथ में उनका लल्ला भी आ रहे हैं। वहां बाबूजी, हम तो कह रहे हैं इस बार आप भी उनके साथ चले जाइए। आपको भी अच्छा लगेगा। सुधीर ने भी डॉ. अग्निहोत्री की खुशी में शामिल होते हुए कहा।
अरे, पहले उसे आ तो जाने दे। एक काम कर शाम को आते हुए कुछ अच्छा सा लेकर आना। पैसे ले जा। आज बहुत दिन बाद कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है। बाबूजी ने कहा।
सुधीर ने जी बाबूजी कहा और फिर बोला, अच्छा बाबूजी अभी तो हम जाते है, शाम को आते है। ठीक है- बाबूजी ने कहा।
शाम को जब सुधीर घर पहुंचा तो डॉक्टर अग्निहोत्री अपनी पुरानी यादों में खोए उसे अपनी हर बात बताने लगे। इस तरह रात का काफी समय हो चला था। इसके बाद सुधीर ने उन्हें सुला दिया। बाबूजी के कहने पर वो आज अपने घर नहीं गया और बाहर के हॉल में ही सो गया। इस तरह सुधीर अब रोज ही बाबूजी के घर आता और उनकी सेवा करता रहता।
एक दिन सुधीर बहुत ही गुमसुम सा घर पर आकर बैठ गया। डॉक्टर अग्निहोत्री ने उससे पूछा अरे क्या हुआ सुधीर आज तू इतना चुप क्यों है? सुधीर ने अब भी कुछ नहीं कहा। बाबूजी ने उसे लताड़ते हुए कहा कि अरे, बताता है या बजाउं ये लाठी। इस पर सुधीर ने कहा कि बाबूजी हम ये नौकरी छोड़ रहे हैं। डॉक्टर अग्निहोत्री ने आश्चर्य के साथ पूछा अरे, क्यों ऐसा क्या हो गया? बाबूजी बड़े साहब ने हमारी बदली कर दी है और कह रहे हैं कि पास के शहर में जाओ।
अरे, ये तो अच्छी बात है ना, इसमें नौकरी छोड़ने की बात कहां से आ गई?
बाबूजी हम कह रहे हैं, हम आपको छोड़कर नहीं जाएंगे बस। सुधीर ने जिद भरे लहजे में कहा।
बाबूजी न उसे कई बार समझाने का प्रयास किया परंतु सुधीर मानने का तैयार नहीं था। इस पर डॉ. अग्निहोत्री भड़क जाते हैं और उसे कहते है- अरे, तू कौन सा मेरा सगा है रे, जो पूरी जिंदगी यही रहेगा। यहां फ्री में खाने को मिल रहा है, इसलिए रहना चाहता है। चल जा यहां से। इतना कहकर बाबूजी अपने कमरे में चले जाते हैं। इधर सुधीर को डॉक्टर अग्निहोत्री की यह बात सुनकर बड़ा झटका लगता है और फिर वह भी अपने कमरे की ओर चला जाता है।
अगले दिन सुबह सुधीर फिर घर आता है और बाबूजी से कहता है हमें फ्री में खाने का शौक नहीं है बाबूजी हम तो बस आपकी सेवा करना चाहते थे। आप गुस्सा न हो, अब हम जा रहे हैं। बाबूजी भी उसे जाने के लिए कह देते हैं।
सुधीर पास के शहर में जाकर अपना काम शुरू कर देता है। परंतु वह अपने बाबूजी की चिंता में लगा रहता है। इस तरह से करीब 8 महीने बीत जाते हैं। इस दौरान सुधीर ने कई बार बाबूजी के पास जाने का सोचा, परंतु काम के कारण वह कभी छुट्टी नहीं ले सका। एक दिन वह ऑफिस में ही था कि उसके नाम का एक बड़ा सा लिफाफा आता है। वह उसे अपने घर ले जाकर खोलने का सोचता है और फिर काम में लग जाता है।
घर पहुंचकर वह लिफाफा खोलता है, तो देखता है उसमें कुछ कागजात है और एक खत भी है। पहले तो वह समझ नहीं पाता कि उसे इतना बड़ा लिफाफा किसने भेज दिया। वह खत पढ़ना शुरू करता है।
प्यारे बेटा सुधीर,
तू नए शहर जाकर अपने बाबूजी को भूल ही गया। पर तू मुझे रोज याद आता था। वैसे बेटा मुझे माफ करना, मैंने तुझे उस दिन खाने वाली बात कही। पर ये तू भी जानता है कि अगर मैं ऐसा नहीं कहता तो तू नए शहर में नहीं जाता। वहां तेरी तरक्की जल्दी से हो सकती है, इसलिए मैंने तुझे वहां भेजा था। उम्मीद करता हूं तू अब खुश होगा, मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है। वैसे तुझे याद है तू एक खत लेकर आया था, जिसमें मेरे बेटे के आने की सूचना थी। मुझे पता है कि वो खत तुने लिखा था। ताकि मैं खुश हो सकूं। क्योंकि मैं जानता हूं पिछले 10 सालों में जिसने एक फोन नहीं किया, वो खत क्या लिखेगा और क्या अपने पिता से मिलने के लिए आएगा। वैसे तेरे उस झूठ की खुशी का मौल तो मैं नहीं चुका सकता, पर तेरा बाबूजी होने के नाते मेरा जो कुछ भी है वो आज से तेरा हो गया है। तुझे अपने आशीर्वाद के रूप में फिलहाल मेरे पास देने के लिए यही है, पर जो तूने दिया है, उसके बदले तो मैं तुझे कुछ नहीं दे रहा हूं। वो खुशी भले ही झूठी थी, पर 10 सालों बाद तेरे झूठ ने मुझे हंसने का मौका दिया था, जो तेरा एक कर्ज है मेरे पर, बस वहीं चुकाने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूं। हो सके तो अपने बाबूजी को माफ कर देना और ये छोटी से भेंट अपने बाबूजी का प्यार समझ कर स्वीकार कर लेना। तुझे ये खत मिले तब तक शायद मैं इस दुनियां में ना रहूं, तो ये समझ ले कि यहीं तेरे बाबूजी की आखिरी इच्छा भी है, जिसे तुझे पूरा करना है।
तेरा बाबूजी।
खत को पढ़ने के बाद सुधीर स्तब्ध भी था, कि बाबूजी अब इस दुनियां में नहीं रहे। खत को सीने से लगाए सुधीर की आंखों से बस आंसू बह रहे थे और उसके मुंह से बस बाबूजी, बाबूजी ही निकल रहा था।









बहुत अच्छी कहानी है। पढ़कर कुछ देर के लिए आंखें नम हो गईं और गला भी भर आया।
ReplyDeleteGood story. .dil ko choo gai
ReplyDelete